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आरोप साबित करो तो जानें
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 13 Dec 2012 11:20 PM IST
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राजनीति में अभी इतनी ईमानदारी तो बची है कि आरोप के कीचड़ से लथपथ नेता यह कभी नहीं कहता कि आरोप अगर साबित हो गया, तो भी कुर्सी नहीं छोड़ूंगा। इधर आरोप आया कि उधर से आवाज आती है कि यदि कोई यह आरोप साबित कर दे, तो राजनीति छोड़ दूंगा। यह केवल गीदड़ भभकी नहीं होती। पूरा यकीन रहता है कि काम इतने सलीके से किए गए हैं कि साबित होने का तो सवाल ही नहीं उठता।
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अफवाह है कि देश जब नया-नया आजाद हुआ था, तब नेता इतने डरपोक होते थे कि आरोप लग जाए, तो जान दे दें। लोग बोलने में डरते थे कि भैया, भरोसा नहीं, किस बात पर इस्तीफा देकर घर बैठ जाएं। यदि पक्के तौर पर मालूम हो जाता था कि नेताजी के रहते गड़बड़ हुई है, तो भी लोग मुंह पर ताला मारकर चाबी गुमा दिया करते थे।
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लेकिन अब तो कुएं में भांग जैसा मामला हो गया। यह मान लिया गया कि राजनीति में हो, तो गड़बड़झाले करने ही पड़ेंगे। फिर भी इस्तीफे की धमकी का असर लंबे समय तक जारी रहा। जब किसी ने कह दिया कि चलो, दे ही दो इस्तीफा, तो जवाब यह आया कि पहले साबित करो। नए-नए थे, तो रंगे हाथ पकड़ भी लिए जाते थे। एक किस्सा है कि पंडित नेहरू को आम सभा में ही मालूम पड़ा कि उनकी पार्टी का उम्मीदवार बेईमान है।
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तब उन्होंने उसी मंच से कहा कि हमारे उम्मीदवार को हरवा दें। ऐसे हादसे बाद में नजर नहीं आए, तो इसका मतलब यह नहीं कि नेता ईमानदार हो गए थे, बल्कि वे कोई सुराग ही नहीं छोड़ते थे। आज भी अगर वे दावे करते हैं, तो उन्हें अपनी ईमानदारी पर नहीं, अपने बचाव कार्य पर भरोसा होता है। मोटी-मोटी तनख्वाह पर कारकून इसीलिए तो रखे हैं। नेताजी के चेहरे पर पुख्ता इंतजाम का ऐसा भाव होता है कि आरोप लगाने वाला भी घनचक्कर हो जाता है कि कहीं आरोप गलत तो नहीं है! अगर आरोप लगाने वाले ईमानदारी से तलाशें, तो सुबूत उन्हें मिल सकते हैं, मगर इसमें वे अपनी ईमानदारी जाया नहीं करते।
सच तो यह है कि आरोप लगाने का मकसद भी यह नहीं होता कि नेता को कुर्सी या राजनीति छोड़नी पड़े। इस तरह से एहसान जताया जाता है कि चाहते, तो साबित कर देते, मगर नहीं कर रहे हैं, तो इसीलिए कि हमारे काम में अड़ंगे मत डालो। हम सत्ता में आए तो आपका खयाल जरूर रखेंगे। इतनी ईमानदार समझ तो अभी राजनीति में बची है।