फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   kailash vajpayee on sahir ludhiyanvi

मौत सलीब पर उम्र बनवास में

Sat, 01 Jun 2013 08:56 PM IST
कैलाश वाजपेयी
कैलाश वाजपेयी Updated Sat, 01 Jun 2013 08:56 PM IST
विज्ञापन
kailash vajpayee on sahir ludhiyanvi

चार दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद हम जब अपने कार्यालय पहुंचे तब श्री रतनलाल जोशी द्वारा ज्ञात हुआ कि आने वाले शनिवार की शाम स्थानीय रुइया कॉलेज में एक कवि गोष्ठी आयोजित है।

विज्ञापन


इसमें भाग लेने के लिए कई स्थानीय कवियों के अतिरिक्त साहिर लुधियानवी भी आएंगे। साहिर का नाम आते ही हमें उनकी लिखी एक पंक्ति दिमाग में कौंधी-‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।’
विज्ञापन


पहली बार उस शाम साहिर के साथ मंच साझा कर उनकी शायरी सुनने को मिली। कार्यक्रम क्योंकि विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित था, इसलिए शुरू में ही किसी ने उन्हीं का लिखा गीत गाकर पढ़ा, ‘ तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।’
विज्ञापन
विज्ञापन


इस पर किसी दूसरी बालिका ने मंच पर आकर साहिर की एक रचना ‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाजार दिया’ इतनी व्यथित और भर्राई आवाज में पढ़ी कि हम सभी की आंखें नम हो आईं।

साहिर को हमारी रचनाएं जरूर अच्छी लगी होंगी। तभी उन्होंने कहा-साहबजादे, दर्द का यह समंदर लिए आप जो यहां आन मिले हैं तो अच्छा लगेगा अगर चर्चगेट के सामने वाले कहवाघर में मिल-बैठकर कुछ बातें की जाएं।

अगले दिन ग्यारह बजे हम मिले। उन्होंने हमसे लखनऊ के बारे में पूछा। हमने हजरतगंज की शामों के बारे में बताया। वहां के कॉफी हाउस, कुंवर नारायण, यशपाल, सज्जाद, जहीर और मजाज साहब के बारे में बताया।

साहिर उम्र में हमसे कोई पंद्रह वर्ष बड़े तो रहे ही होंगे। फिर भी हिम्मत करके हमने उनसे मुंबई आ पहुंचने के विषय में पूछ ही लिया। साहिर ने कहा, ‘मेरी पैदाइश तो लायलपुर की है।

मगर वक्त की फितरत से हम लोग लुधियाना में आ बसे। घर में सब मुझे अब्दुल हई कहकर बुलाते थे। मेरी मां जब अब्बू को छोड़कर चली गई तब मैं सिर्फ तेरह साल का था।

उनके चले जाने का सदमा मेरी जिंदगी का पहला सदमा था। आगे के बरसों में लुधियाना के कॉलेज प्रिंसिपल, प्रीतम सिंह की दुख्तर (बेटी) अमृता को मेरी शायरी की वजह से मुहब्बत हो गई।’

अमृता प्रीतम से हुए अपने प्रेम संबंध का ब्यौरा बयान करते हुए साहिर की आंखें नम हो गईं। पहला प्रेम, वह भी असफल, बर्फ के चाकू की तरह होता है, जो भीतर घावकर भीतर ही भीतर पिघल जाता है।

साहिर बोलते जा रहे थे। कैसे उन्हें कॉलेज से निकाला गया और कैसे उन्होंने उर्दू के शास्त्रीय शायरों से बचकर जनता का शायर होना पसंद किया।

फिर गालिब का शेर याद करते हुए साहिर ने कहा,“इश्क को दिल में जगह दे गालिब/ इल्म से शायरी नहीं आती।”

लंच पर साहिर को कहीं पहुंचना था, इसलिए अगले शनिवार को अपने जुहू स्थित आवास पर रात के खाने की दावत देकर साहिर उठ खड़े हुए।

अगले शनिवार की शाम को हमें वरसोवा में साहिर के आवास परछाइयां पहुंचने में कोई कठिनाई नहीं हुई। हमारे वहां पहुंचने से पहले ही साहिर पीना शुरू कर चुके थे।

तीन पैग पी चुकने के बाद साहिर मूड में आए। छोड़कर चली गई मां (सरदार अख्तर बेगम) से शुरू कर, अपने प्रथम प्रेम, फिर दूसरे प्रेम का भी जिक्र किया।

खाना खत्म होने तक साढ़े बारह बज रहे थे। इसके बाद बड़ी रोबीली आवाज में साहिर ने कहा,  ‘साहबजादे अब आप जाएं नहीं। मेहमानों वाले कमरे में जाएं।

वहीं खादी का कुर्ता और पाजामा रखा मिलेगा। जाकर आराम फरमाएं।’  साहिर को गए अर्सा हुआ। हमें आज भी लगता है सिवा इंतजार हुसेन के अन्य किसी ने उन्हें पूरी तरह समझा नहीं।


वे एक साथ रूमानी और प्रगतिपरक किस्म के बड़े शायर थे, तभी तो लिख सके,“जिंदगी का नसीब क्या कहिए/ एक सीता थी जो सताई गई/ हम न अवतार थे न पैगम्बर/ क्यों ये अज्मत हमें दिलाई गई/ मौत पाई सलीब पर हमने/ उम्र बनवास में बिताई गई।”

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed