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प्रदर्शनी की वस्तु नहीं हैं जारवा आदिवासी

Wed, 23 Jul 2014 07:29 PM IST
सुभाष गाताडे
सुभाष गाताडे Updated Wed, 23 Jul 2014 07:29 PM IST
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Jarwa tribal is not the object of the exhibition

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2002 में लगाई गई पाबंदी के बावजूद क्या अंडमान की जारवा जनजाति के लिए संरक्षित इलाकों में जारवा पर्यटन को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है? अगर अंडमान ग्रैंड ट्रंक रोड पर वाहनों की बढ़ती कतारें देखें, तो कुछ ऐसा ही समझ में आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही जारवा आदिम जनजाति के इलाकों में पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही को देखते हुए वर्ष 2002 में ही सुप्रीम कोर्ट ने वहां से गुजर रही सड़क को बंद करने का आदेश दिया था। लेकिन बंद करना तो दूर, पिछले दिनों सत्ताधारी पार्टी से जुड़े स्थानीय सांसद द्वारा इस संबंध में किए गए ऐलान के बाद कि आदिवासी इलाकों से गुजर रहे इस मार्ग पर निवेश किया जाएगा, जारवा पर्यटन के बढ़ने का खतरा बढ़-सा गया दिखता है।

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मानववंशविज्ञानियों के मुताबिक, जारवा जनजाति अफ्रीका महाद्वीप से आए आदिमानव के वंशज हैं, जो बहुत सरल जिंदगी जीते हैं। वर्ष 1998 से वे जंगल के बाहर निकलने लगे हैं, और बाहरी संस्कृति से संपर्क में आने के बाद दुखद रूप से कई अपरिचित रोगों का शिकार भी बने। आज उनकी संख्या कुछ सौ तक रह गई है। स्वाभाविक है कि अगर उनके संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अन्य जनजातियों की तरह इसके भी खत्म हो जाने का खतरा है। लेकिन जारवा इलाकों में आयोजित मानव सफारियों को देखते हुए लगता है, आदिवासियों को नुमाइश की चीज के तौर पर देखने का 'फैशन' बढ़ने लगा है।
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हर इंसाफपसंद व्यक्ति यही कहेगा कि नुमाइश की वस्तु बनाने के इस सिलसिले की जितनी निंदा की जाए, कम है। भारत में आबादी का लगभग 8.2 हिस्सा आदिवासियों का है, जो संविधान की धारा 342 के अंतर्गत अनुसूचित हैं। दुखद है कि अपने देश में एक तरफ आदिवासियों के क्षेत्रों में ‘मानवीय सफारी’ को बढ़ावा दिया जाता है, तो दूसरी तरफ उनकी वास्तविक जीवन की अत्यधिक दुर्दशा को लेकर बेरुखी दिखाई जाती है।
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आखिर आदिवासी बहुल इलाकों में देशी-विदेशी कंपनियों को जिस किस्म की छूट मिली हुई है, खनिज पदार्थों के दोहन के नाम पर जिस बड़े पैमाने पर आदिवासी समुदायों को विस्थापित किया जा रहा है, वह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। हालांकि आदिवासियों की जीवनशैली को बेहद सभ्य अंदाज में भी परोसा जा सकता है। भोपाल के चर्चित आदिम जाति संग्रहालय में ऐसे ही कई आदिवासी समुदायों के लोग तैनात किए गए हैं, जो झोपड़ों, कृषि औजारों आदि के जरिये प्रदर्शित होती आदिवासी संस्कृति को अधिक ‘वास्तविक’ चेहरा प्रदान करते दिखते हैं।


बहरहाल, अभी यह नहीं कहा जा सकता कि जारवा आदिवासियों के इलाके से गुजर रहे ग्रैंड ट्रंक रोड को चौड़ा करने की प्रक्रिया रुक जाएगी या नहीं, मगर इस तथ्य को मद्देनजर रखते हुए कि जारवा पर्यटन टूर ऑपरेटर्स, पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन जैसी तिकड़ी के बीच फायदे का सौदा है, इसकी संभावना कम दिखती है कि रोड का विस्तार रुक जाएगा। क्या सर्वोच्च न्यायालय खुद ही इस मामले का संज्ञान लेकर जारवा समुदाय के हितों की रक्षा करेगा?

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