सामयिक: विशेषाधिकारों के अंत का शोकगीत और सुविधाजीवी नेताओं का सियासी संकट
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विस्तार
राजोरी की आतंकी घटना के बाद फारूक अब्दुल्ला का दुर्भाग्यपूर्ण बयान आया-'दोस्त बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं...अगर बातचीत से यह सुलझाया नहीं गया, तो हमारा हाल वही होगा, जो गाजा फलस्तीन का हो रहा है।' अब कौन-सी वार्ता होनी है? पाकिस्तान की तो शर्त है कि अनुच्छेद 370 की बहाली तक बात नहीं होगी। यह बहाल होना नहीं है, तो स्पष्ट है कि वार्ता भी नहीं होनी है। चाहे महबूबा मुफ्ती हों या फारूक अब्दुल्ला, ये सब पाकिस्तान से वार्ताओं के बड़े पैरोकार हैं। फर्ज करें कि वार्ताएं हुईं भी, तो पाकिस्तान 370 की बहाली के बाद कश्मीर घाटी का इलाका तो अवश्य चाहेगा। लेकिन अब कश्मीर घाटी वार्ता की मेज पर है ही नहीं। वहां तो हमारा एकमात्र मुद्दा पीओके है। इसलिए अब पुराने मुद्दों की दृष्टि से वार्ताओं की कोई साझा भूमि बची ही नहीं है।
दरअसल भारत-पाकिस्तान में विवाद की स्थितियां अब तक शेख अब्दुल्ला परिवार की सत्ता संभावनाएं बनाए रखती रही हैं। मुफ्ती मोहम्मद सईद भी बाद में इसी पाकपरस्त क्लब में शामिल हो गए। शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा एक आजाद खुदमुख्तार कश्मीर की थी। पाकिस्तान के साथ जाना उनके सपने का ही नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक अस्तित्व का भी अंत कर देता। इसलिए वह नेहरू-गांधी के अहिंसक सेक्यूलर भारत के साथ खड़े हो गए। पाकिस्तानी कबाइलियों का पीछा करती भारतीय सेना को अचानक उरी में रोक दिए जाने का उन्हें यह लाभ मिला कि शेख का राजनीतिक विरोधी, पंजाबी डोगरी भाषा-भाषी इलाका भारत से बाहर रह गया और पीओके के रूप में अस्तित्व में आया। यदि वह क्षेत्र भारत में शामिल करा लिया जाता, तो शेख अब्दुल्ला को चुनौतियां मिलने लगतीं।
इसलिए शेख के कश्मीर की सत्ता में बने रहने के लिए आवश्यक था कि सेना वहां से आगे न बढ़े। दूसरा, अनुच्छेद 370 जैसा विशेषाधिकार कश्मीर को दे दिया जाए। चूंकि माउंटबेटन ने नेहरू से जनमत संग्रह की घोषणा करा दी थी, तो शेख अब्दुल्ला की बातों को मानने की मजबूरी हो गई थी, जिसके चलते अनुच्छेद 370 का जन्म हुआ। हालांकि संविधान सभा में इसका विरोध भी हुआ। कश्मीर की पहचान व विशेषाधिकार के प्रतीक के रूप में अनुच्छेद 370 वह आधार बना, जिसने वहां अलगाववादी सोच को एक राजनीतिक आधार दे दिया। अब्दुल्ला परिवार व अलगाववादियों, दोनों के लिए इस विशेषाधिकार की रक्षा करना लक्ष्य हो गया।
इसीलिए 370 के निष्प्रभावी हो जाने का दर्द इन नेताओं को आज भी बहुत सालता है। बहरहाल, विशेषाधिकार तो चला ही गया, लद्दाख के अलग केंद्र शासित प्रदेश बन जाने से मानचित्र पर दिख रहा वह विस्तार भी गायब हो गया है। जम्मू प्रसन्न है, सत्ता की आहटें सुन रहा है। इसलिए कश्मीर की शांति, विकास व रिकॉर्ड तोड़ पर्यटन की खुशहाली उन नेताओं से बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। वे यहां गाजा की कल्पना करके उसमें भूत देख रहे हैं।
दूसरी ओर, पीओके में पाकिस्तान विरोधी आंदोलन परवान चढ़ रहा है। अलगाववादी सोच के लिए दूसरी बड़ी समस्या पीओके की वापसी की संभावनाएं भी हैं। यदि ऐसा संभव हुआ, तो कश्मीर की राजनीति में कश्मीर घाटी के वर्चस्व का सूरज स्थायी रूप से डूब जाएगा। यह एक बड़ी चिंता शेख अब्दुल्ला व मुफ्ती मोहम्मद सईद की सोच व उनके वारिसों की है।
पंचायत चुनावों के बाद कश्मीर में स्थानीय जमीनी नेतृत्व की नई पौध विकसित हो रही है। उनके पास आज वे विकल्प हैं, जो पहले कभी नहीं थे। संपूर्ण भारत आज एक विशाल संभावना है। तो विशेषाधिकारों के पुराने सुविधाजीवी, अलगावपरस्त माहौल में पली-बढ़ी वह राजनीतिक पीढ़ी आज संकट में है। बीत रहे वर्ष 2023 के साथ उनके ये निराशावादी उद्गार व पाकिस्तान से वार्ताओं का पुराना राग एक शोकगीत से अधिक और कुछ नहीं है।