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इलेक्ट्रिक वाहन का समय आ गया

mukul shrivastavaमुकुल श्रीवास्तव Updated Tue, 18 Jun 2019 05:59 PM IST
मुकुल श्रीवास्तव
मुकुल श्रीवास्तव - फोटो : a
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने प्रदूषण पर अपनी ताजा ग्लोबल रिपोर्ट में चेताया है कि दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों में से चौदह भारत में हैं। भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है, जहां हर साल बीस लाख से ज्यादा लोग प्रदूषित हवा की वजह से मरते हैं। पर्यावरण के मामले में भारत दुनिया के बेहद असुरक्षित देशों में है। अधिकांश उद्योग पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी से चल रहे हैं। देश की आबोहवा लगातार खराब होती जा रही है। शोध अध्ययन से यह पता चला है कि कम गति पर चलने वाले यातायात में विशेष रूप से जाम के दौरान जला हुआ पेट्रोल/डीजल चार से आठ गुना अधिक वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है, क्योंकि डीजल और पेट्रोल से निकले धुएं में 40 से अधिक प्रकार के प्रदूषक होते हैं।
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भारत ने 2013 में नेशनल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन प्लान (एनईएमएमपी) 2020 का निर्माण भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रदूषण की स्थिति से निपटने के लिए किया था, जिसका मकसद राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा, वाहन-प्रदूषण और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं के विकास जैसे मुद्दों का समाधान करना था। इसके तहत पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए, भारत सरकार ने 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहन (इवी) में एक बड़ा बदलाव लाने की योजना बनाई है। जिसमें प्रमुख है, अगले दो दशकों में इलेक्ट्रिक कारों का प्रचलन बढ़ाने के लिए ई-कॉमर्स कंपनियां, रेवा इलेक्ट्रिक कार कंपनी (आरईसीसी) जैसी भारतीय कार निर्माता, और ओला जैसी भारतीय ऐप-आधारित परिवहन नेटवर्क कंपनियां काम कर रही हैं। भारत की सबसे बड़ी घरेलू कैब कंपनी ओला का मानना है कि देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के चलने से ग्राहकों को कहीं ज्यादा आर्थिक लाभ होगा और उन्हें मौजूदा दर का एक तिहाई से भी कम भुगतान करना पड़ेगा। फिलहाल ईवी के परिचालन की कुल लागत का 30 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा के खर्च के रूप में होता है। लेकिन परिवहन प्रदूषण से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए क्या देश तैयार है? भारत में ऊर्जा क्षेत्र अभी तक इस बदलाव के लिए तैयार नहीं हो सका है। ईवी उद्योग को उपयुक्त क्षमता प्रदान करने के लिए भारत को अपने सभी पावर ग्रिड और सब-स्टेशनों में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा। ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष जोर देने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार ने 2022 तक के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं।

लेकिन समस्या का समाधान इतना आसान नहीं है। ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फाइनेंस की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 57,000 पेट्रोल पंपों की तुलना में महज तकरीबन 350 ईवी चार्जर हैं। जबकि चीन के पास 2016 के अंत तक दो लाख से अधिक चार्जिंग प्वाइंट थे। टाटा पावर के अनुसार, साल 2030 तक दिल्ली जैसे शहर में इस मान्यता के साथ कि शहर में दस लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) हों, तो तीन लाख से अधिक फास्ट चार्जर की जरूरत पड़ेगी। इससे विद्युत व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो कि पहले से ही कृषि क्षेत्रों में अत्यधिक सब्सिडी, ऊंची दर और बिजली चोरी जैसी समस्याओं से जूझ रही है।

सेंटर फॉर साइंस ऐंड रिसर्च के अनुसार, यदि भारत में 80 प्रतिशत लोग ईवी को अपनाते हैं, तो 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा मांग में पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। पहले ही बिजली की कमी झेल रहे देश के लिए ये एक बड़ी चुनौती होगी। देश वास्तव में परिवहन प्रदूषण से निपटना चाहता है, तो ईवी के प्रयोग को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देना ही होगा। दूसरी ओर ईवी को स्वच्छ माना जा सकता है, लेकिन यदि बिजली पैदा करने के लिए कोयले का ही इस्तेमाल किया जाएगा, तो इससे प्रदूषण बढ़ेगा ही। इसलिए इलेक्ट्रिक वाहन के लिए गैर परंपरागत स्रोत से बिजली पैदा करने के बारे में सोचना होगा।
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