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ट्रंप की राह: जो वादा किया है, निभाना पड़ेगा, आसान नहीं है दावों को हकीकत में बदलना
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डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो :
ANI
विस्तार
अमेरिकी चुनाव के नतीजों में डोनाल्ड ट्रंप को मिली स्पष्ट जीत के पीछे महंगाई, बेरोजगारी, अवैध आप्रवासन, व्यापार, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी अशांति को लेकर उनकी स्पष्टवादिता को ही श्रेय दिया जाना चाहिए। वहीं, कमला हैरिस महत्वपूर्ण मौकों पर कई मुद्दों पर अपनी कोई स्पष्ट राय व्यक्त नहीं कर सकीं। वह राष्ट्रपति जो बाइडन की छाया से ही आगे नहीं निकल सकीं। इतना ही नहीं, जो भारतवंशी पहले कमला हैरिस की ओर झुकाव रखते थे, वे भी ट्रंप की ओर हो गए।
कमला के भारतवंशी होने की वजह से अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोग भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ गए थे, लेकिन पिछले चार वर्षों में उपराष्ट्रपति रहते हुए वह कभी भारत नहीं आईं। हैरिस का झुकाव भारतवंशियों के बजाय अफ्रीकी समुदाय के साथ ज्यादा रहा। दूसरी ओर, ट्रंप ने खुलकर हिंदुओं का पक्ष लिया। ट्रंप ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार का भी विरोध किया। इसका नतीजा यह हुआ कि जो भारतवंशी समाज पहले डेमोक्रेट्स के पक्ष में रहता था, वह भी रिपब्लिकन की ओर खिसक गया। डेमोक्रेट्स का झुकाव अवैध प्रवासियों की ओर था, जो उनको वहां की नागरिकता देने के साथ ही वोट देने का अधिकार भी देना चाहते थे। ट्रंप ने इस पर सख्ती करने का वादा किया और जीत के बाद भी इस वादे को पूरा करने की बात भी कही है।
बाइडन अंत तक खुद राष्ट्रपति पद की दौड़ में बने बेशक रहे, लेकिन सच तो यही है कि वह पहली ही बहस में ट्रंप से पिछड़ चुके थे। जी-20 या जी-7 जैसे अहम सम्मेलनों में भी बाइडन के हावभाव ही उनके दुश्मन बन गए थे। तिस पर जब पार्टी ने दबाव बनाया, तब वह पीछे हटे और कमला हैरिस को उम्मीदवार बनाया। कमला को चुनाव प्रचार करने का कम समय मिला और वह अपनी ऐसी कोई छवि नहीं बना सकीं कि वह बाइडन से इतर कुछ नया करेंगी। दूसरी तरफ, ट्रंप अपने रुख पर कायम रहे, जिससे वह मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सके।
अमेरिका के चुनावी नतीजों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत में भी कमला के बजाय ट्रंप को ज्यादा पसंद किया जाना, यही दर्शाता है कि ट्रंप लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल रहे। उम्मीद की जानी चाहिए कि ट्रंप के आने से भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत ही होंगे। उनके हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे रिश्ते हैं। व्यापार टैरिफ को लेकर भले ही ट्रंप ने कहा है कि वह भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाएंगे, लेकिन इस मसले को भारत कूटनीति के जरिये निपटा लेगा। दरअसल, ट्रंप का मुख्य उद्देश्य चीन पर नकेल कसना है। ट्रंप के कार्यकाल के पिछले चार वर्षों को देखा जाए, तो उनके भारत से ताल्लुकात ठीक रहे थे। भारत-चीन संबंधों को अमेरिका के नजरिये से देखें, तो अमेरिका की शुरू से ही चीन को लेकर स्पष्ट नीति रही है, सत्ता में चाहे डेमोक्रेट्स रहें या रिपब्लिकन। अमेरिका चीन को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता है। ट्रंप भी उसे जारी रखना चाहेंगे, लेकिन वह भारत के हितों को महत्व देंगे।
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) प्रोजेक्ट के माध्यम से चीन भारत के पड़ोसी देशों में अपनी पैठ बना रहा है। यह भारत के लिए ठीक नहीं है, इसलिए चीन पर नियंत्रण के लिए भारत के अमेरिका के साथ मजबूत संबंध होना आवश्यक है। अमेरिका भी समझता है कि भारत उसके लिए कितना महत्वपूर्ण साझीदार है। बाइडन के समय भी भारत को तवज्जो मिली थी। प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी संसद में भाषण दिया था, लेकिन बाइडन के कार्यकाल में कुछ ऐसे मुद्दे थे, जो भारत के लिहाज से ठीक नहीं थे। खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का भारत पर आरोप कनाडा ने अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए से मिले स्रोतों के आधार पर लगाया था। उसने खबर भी अमेरिकी अखबार में छपवाई थी। गुरपतवंत सिंह पन्नू के मामले में भी बाइडन सरकार ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की। संभावना है कि ट्रंप के आने के बाद से इस तरह की बातें नहीं होंगी। कनाडा के भारत के प्रति रुख में बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं।
अमेरिका की हर गतिविधि का असर वैश्विक और भू-राजनीतिक संबंधों पर होता है। ट्रंप जब पहली बार राष्ट्रपति चुने गए थे, तो उनके कार्यकाल में दुनिया में कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ, लेकिन बाइडन के रहते रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ। पश्चिमी एशिया में हालात बिगड़ गए। नाटो के अस्तित्व पर भी सवाल उठे। अब ट्रंप के सामने चुनौती यह होगी कि उन्होंने जो वादे किए हैं, उन्हें किस तरह पूरा करेंगे। अमेरिका में महंगाई रोकने के लिए उन्होंने करों में कटौती का वादा किया, जिसे वह पद संभालते ही पूरा कर सकते हैं। वह अवैध आप्रवासन को रोकने के लिए सख्त कदम उठा सकते हैं। चीन समेत अन्य देशों से आयात होने वाले सामान पर भी वह टैरिफ बढ़ा सकते हैं। इस तरह से इन तीन वादों को पूरा करना उनके लिए इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए। लेकिन सबसे मुश्किल चुनौती यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और इस्राइल का गाजा में हमास, लेबनान में हिजबुल्ला तथा ईरान के साथ जो युद्ध चल रहा है, उनको वह किस तरह रुकवाते हैं। पूरे चुनाव अभियान के दौरान यही वादा उनके पक्ष में रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध को तत्काल रुकवा देंगे। पश्चिम एशिया के हालात पर भी नियंत्रण कर लेंगे।
वहीं डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिद्वंद्वी कमला हैरिस और उनकी पार्टी इस मामले में पिछड़ गई थी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव की वजह से मुस्लिम देशों के कई लोग यूरोप पहुंच गए हैं। इसके लिए यूरोप वाले डेमोक्रेट्स और उनकी नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं। भले ही यूरोपीय देश खुलकर कुछ न कहते हों, लेकिन डेमोक्रेट्स की कई नीतियां ऐसी रहीं, जो अमेरिका के साथ ही दुनिया भर में उनके खिलाफ होती चली गईं। इन सबका फायदा अंतत: ट्रंप को ही मिला है।