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वर्जनाओं पर बात करने का समय

Fri, 17 Jan 2014 01:58 PM IST
निकोलस क्रिस्टॉफ/ जाने-माने स्तंभकार
निकोलस क्रिस्टॉफ/ जाने-माने स्तंभकार Updated Fri, 17 Jan 2014 01:58 PM IST
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it is time to discussion of

नैरोबी (केन्या) में पिछले दिनों बलात्कार का एक मामला सामने आया। ग्यारह वर्ष की एक लड़की ने अपने दादा पर आरोप लगाया कि जब वह पहली कक्षा में थी, तभी से वह उसके साथ करीब रोजाना बलात्कार कर रहा है। वह लड़की पढ़ाई में अव्वल है, और दुर्व्यवहार तथा डर के साये में जीने के बाद भी अपनी कक्षा में प्रथम या द्वितीय स्थान पर आती रही है। उसका कहना है कि अगर वह अपने दादा की उन धमकियों से, जिसमें उसने कहा था कि यदि वह किसी को इस बलात्कार के बारे में बताएगी, तो उसकी गर्दन काट दी जाएगी, नहीं डरी होती, तो रिजल्ट और भी बेहतर होता। हालांकि अभी तक इस मुद्दे पर न तो उसका परिवार गंभीर हुआ है और न ही समाज। यहां तक कि केन्या पुलिस ने भी इस यौन हिंसा को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई है।

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उस लड़की के साथ बलात्कार का यह सिलसिला तब शुरू हुआ, जब वह आठ वर्ष की थी। परिवार में बात खुलने के बाद इस मसले पर काफी माथा-पच्ची हुई और अंत में यह तय हुआ था कि उस लड़की को ′पवित्र′ बनाए रखने के लिए पारंपरिक औषधियों का सहारा लिया जाएगा। और फिर, परिजनों ने मामले को रफा-दफा कर दिया।
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महिलाओं के खिलाफ घरेलू यौन हिंसा का यह कोई पहला मामला नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि पूरे विश्व में करीब 35 फीसदी महिलाएं घरेलू यौन हिंसा का शिकार होती हैं। नैरोबी के ही कीबेरा झोपड़पट्टी में, जहां यह लड़की रहती है, कई महिलाओं का कहना है कि उनका पहला यौन अनुभव बलात्कार के रूप में ही हुआ है।
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बलात्कार आम तौर पर इसलिए किए जाते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि महिलाएं कमजोर होती हैं और उन पर आसानी से दोष डाला जा सकता है। भारत में ही कुछ वर्ष पहले किए गए एक सर्वेक्षण से यह पाया गया कि 68 प्रतिशत न्यायाधीशों का मानना है कि महिलाओं की ′भड़कीली पोशाक′ बलात्कार की एक वजह है।

लेकिन इन सबके बावजूद उम्मीद की किरण अब भी मौजूद है। दरअसल, बलात्कार इसलिए होते हैं, क्योंकि इसके संदर्भ में हमने अपने आस-पास वर्जनाओं का जाल बुन रखा है, यहां तक कि इस पर चर्चा करना भी असभ्य माना जाता है। लेकिन अब अधिक से अधिक महिला और पुरुष, फिर चाहे वह भारत के हों, या केन्या के या फिर अमेरिका के, इस मुद्दे पर खुलकर बात करने लगे हैं।

नैरोबी में ही लोगों ने तब जमकर विरोध-प्रदर्शन किया था, जब 16 वर्षीय लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के आरोपियों को पुलिस स्टेशन की घास काटने की ′सजा′ दी गई थी। मैं यहां कीबेरा में जमीनी स्तर पर काम करने वाली एक संस्था शाइनिंग होप फॉर कम्युनिटीज का जिक्र करना चाहूंगा, जो महामारी की तरह बढ़ रही इस यौन हिंसा से निपटने की कोशिश कर रही है। इसके पास हर हफ्ते बलात्कार के ढेरों मामले आते हैं, और यह हर मामले में अदालत में अभियोजन पक्ष बनती है।

शाइनिंग होप की इस जंग की एक सिपाही एदीतार अधीआम्बो भी हैं। 25 वर्षीय इस मुखर महिला को पहली बार बलात्कार के रूप में शारीरिक यंत्रणा महज छह वर्ष की उम्र में मिली और दूसरी बार 15 वर्ष की उम्र में। यह एदीतार और शाइनिंग होप के उनके सहयोगी ही थे, जिन्होंने गुप्त सूचना के आधार पर ग्यारह वर्षीय उस लड़की की मदद की थी। उस नन्ही बच्ची को काफी शारीरिक पीड़ा थी, जो बताती थी कि उसके साथ बहुत क्रूरता की गई थी। एक सामाजिक कार्यकर्ता उसे लेकर पुलिस स्टेशन आई, जहां आकर खुलासा हुआ कि जिसने उसके साथ बलात्कार किया है, वह उसका दादा है।

पड़ोसियों ने भी इसकी पुष्टि की कि उन्हें वर्षों से इस मामले की जानकारी थी। लिहाजा पुलिस उस लड़की के दादा को गिरफ्तार करने को तैयार हुई। हालांकि आरोपी यह कहता रहा कि उसने बलात्कार नहीं किया है, लेकिन अदालत ने बाद में उसे 4,700 डॉलर के मुचलके पर जमानत दी, जो नैरोबी में बड़ी रकम मानी जाती है।

मैं यहां चार वर्ष की केन्याई बच्ची ईडा का जिक्र भी करना चाहूंगा, जिसके साथ उसके पड़ोसी ने बलात्कार किया था। ईडा का परिवार किलीमानी पुलिस स्टेशन जाकर बार-बार न्याय की गुहार लगाता रहा, लेकिन पुलिस दस्तावेजों के ′गुम′ होने की बात कहकर आरोपी को गिरफ्तार करने से बचती रही। लेकिन अब अंततः उस ग्यारह वर्ष की लड़की की तरह, इस मामले में भी पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। बेशक मेरी मौजूदगी ने भी पुलिस पर दबाव डाला होगा, लेकिन स्थायी हस्तक्षेप शाइनिंग होप के कार्यकर्ताओं का ही है। जिस युवक को गिरफ्तार किया गया है, उसकी उम्र 12 वर्ष है और उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। बलात्कार के दौरान उस युवक को पकड़ने वाले रोसेमेरी का कहना है कि इस गिरफ्तारी का बड़ा प्रभाव पड़ा है। अभिभावक अब अपने बच्चों को बताने लगे हैं कि वे सावधान रहें।

वास्तव में, यह संदेश अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए है। हमें पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता खत्म करने के साथ ही महिला सशक्तिकरण का निर्माण करने और वर्जनाओं पर खुलकर बात करने की जरूरत है। वैसे इन सबसे ज्यादा जरूरत उस तंत्र को भी बदलने की है, जिसमें बलात्कारी बिना सजा पाए छूट जाता हैै। इस दिशा में अमेरिका का एक कदम कांग्रेस (अमेरिकी संसद) में महिला हिंसा के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अधिनियम को पारित करना हो सकता है, जो रिपब्लिकन के विरोध की वजह से बेवजह लटका हुआ है।

बेशक इस तरह के प्रयास यौन हिंसा की बर्बरता का स्थायी समाधान नहीं हैं, लेकिन यह मुद्दे पर जागरूक करने और जिन मामलों में हमारी जरूरत है, वहां तक मदद पहुंचाने में कारगर हो सकता है। ऐसे में सवाल यही है कि जब पूरी दुनिया में यौन हिंसा महामारी की तरह फैल रही है, क्या कांग्रेस वास्तव में तटस्थ रहना चाहती है।


बलात्कार इसलिए होते हैं, क्योंकि इसके संदर्भ में हमने वर्जनाओं का जाल बुन रखा है, यहां तक कि इस पर चर्चा करना भी असभ्य माना जाता रहा है। लेकिन अब अधिक से अधिक महिला और पुरुष, फिर चाहे वह भारत के हों, या केन्या के या फिर अमेरिका के, इस मुद्दे पर खुलकर बात करने लगे हैं।

निकोलस क्रिस्टॉफ
जाने-माने स्तंभकार
edit@amarujala.com
© 2013 The New York Times news and syndicate

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