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समाज: फनी वीडियो इतने भी फनी नहीं; इंटरनेट से लोगों तक पहुंचाना कितना जायज

mukul shrivastava मुकुल श्रीवास्तव
Updated Tue, 14 May 2024 05:49 AM IST
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सार
मजाकिया और प्रैंक वीडियो पर कहकहे लगाइए, लेकिन जब उन्हें इंटरनेट पर डालना हो, तो क्या डाला जाए और क्या नहीं, इस पर जरूर विचार करें। यह फैसला कोई सरकार नहीं करेगी, हमें ही करना है। इसी से तय होगा कि हमारा भविष्य का समाज कैसा होगा।
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It is important to think carefully while posting funny and prank videos on internet
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Istock

विस्तार

फेसबुक, इंस्टाग्राम या यूट्यूब संगीत के बाद सबसे ज्यादा देखे जाने वाले वीडियो में दर्शकों की पसंद फनी (मजाकिया) वीडियो या प्रैंक वीडियो ही हैं। खाली वक्त में जब करने के लिए कुछ खास न हो और हाथ में मोबाइल हो, तो लोग अक्सर इन वीडियो की तलाश में रहते हैं। जब स्क्रॉल करते हुए कुछ रोचक दिख जाता है, वे उसे देखने लगते हैं।



इंसान सदियों से एक-दूसरे के साथ मजाक करता आ रहा है। प्रैंक या मजाक ज्यादातर सांस्कृतिक मानकों द्वारा निर्धारित होते हैं, जिनमें टीवी, रेडियो और इंटरनेट द्वारा स्थापित मानक भी शामिल हैं। लेकिन जब सांस्कृतिक और व्यावसायिक मानक मजाक करते वक्त आपस में टकराते हैं और अगर उन्हें जनमाध्यमों का साथ मिल जाए, तो उसके परिणाम भयानक साबित हो सकते हैं। दिसंबर, 2012 में जैसिंथा सल्दान्हा नामक भारतीय मूल की एक ब्रिटिश नर्स ने एक प्रैंक कॉल के बाद आत्महत्या कर ली थी। उसके बाद पूरी दुनिया में बहस चल पड़ी कि इस तरह का मजाक किसी के साथ करना और फिर उसे रेडियो टीवी या इंटरनेट के माध्यम से लोगों तक पहुंचा देना कितना जायज है?


वर्ष 2012 में इंटरनेट इतने बहुआयामी माध्यमों के साथ हमसे नहीं जुड़ा था, लेकिन आज के हालात एकदम अलग हैं। आज हिट्स और क्लिक से पैसे कमाए जा सकते हैं। ऐसे में यह महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि क्या दिखाया जा रहा है, बस व्यूज मिलने चाहिए। ऐसे में भारत एक खतरनाक स्थिति में पहुंच रहा है, जिसमें प्रैंक वीडियो बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

दुनिया में ऑनलाइन प्रैंक वीडियो की शुरुआत यूटयूब और फेसबुक जैसी साइट्स के आने से बहुत पहले हो गई थी। वर्ष 2002 में इंटरेक्टिव फ्लैश वीडियो स्केयर प्रैंक के नाम से पूरे इंटरनेट पर फैल गया था। थॉमस हॉब्स उन पहले दार्शनिकों में थे, जिन्होंने यह माना कि मजाक के बहुत सारे कार्यों में से एक यह भी है कि लोग अपने स्वार्थ के लिए मजाक का इस्तेमाल सामाजिक शक्ति पदानुक्रम को अस्त-व्यस्त करने के लिए करते हैं। मजाक की श्रेष्ठता के सिद्धांतों को मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के बीच संघर्ष और शक्ति संबंधों के संबंध में समझा जा सकता है। विद्वानों ने माना कि संस्कृतियों में मजाक का इस्तेमाल अक्सर 'हिंसा को सही ठहराने और मजाक के लक्ष्य को अमानवीय बनाने के लिए' किया जाता है। इन चर्चाओं के बीच इंटरनेट पर मजाक का शिकार हुए लोगों की चिंताएं गायब हैं।

सबसे मुख्य बात सही और गलत के बीच का फर्क मिटना है। इंटरनेट जिस गति से देश में पैर पसार रहा है, उस गति से लोगों में डिजिटल साक्षरता नहीं आ रही है, इसीलिए निजता के अधिकार जैसी जरूरी बातें कभी विमर्श का मुद्दा नहीं बनतीं। किसी ने किसी से फोन पर बात की, अपना मजाक उड़वाया, यह मामला यहां तक तो व्यक्तिगत है। लेकिन वही वार्तालाप अगर  इंटरनेट के माध्यम से सार्वजनिक हो जाए, तो जिस कंपनी के सौजन्य से यह सब हुआ, उसे हिट्स, लाइक और पैसे मिले, लेकिन जिस व्यक्ति के कारण यह सब हुआ, उसे क्या मिला? यह सवाल अक्सर पूछा नहीं जाता। ऐसे सैकड़ों ऐप हैं, जिन्हें डाउनलोड करके आप मजाकिया वीडियो देख सकते हैं और ये वीडियो आम लोगों ने ही अचानक बना दिए हैं। कोई व्यक्ति मेन होल में गिर जाता है और उसका मजाकिया  वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो जाता है और फिर अनंतकाल तक के लिए सुरक्षित भी हो जाता है।

हमने उस वीडियो को देखकर खूब हंसते हैं, पर कभी उस परिस्थिति में खुद को रखकर नहीं सोचते। इंटरनेट ने निहायत निजी चीजों को सार्वजनिक कर दिया है। ये निजी चीजें जब चारों ओर बिखरी हों, तो हम उन असामान्य परिस्थिति में घटी घटनाओं को भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा मान लेते हैं, जिससे एक परपीड़क समाज का जन्म होता है। यही कारण है कि कोई दुर्घटना होने पर लोग मदद करने के बजाय वीडियो बनाने में लग जाते हैं। मजाकिया और प्रैंक वीडियो पर कहकहे लगाइए, लेकिन जब उन्हें इंटरनेट पर डालना हो, तो क्या डाला जाए और क्या नहीं, इस पर जरूर विचार करें। यह फैसला कोई सरकार नहीं करेगी, हमें ही करना है। इसी से तय होगा कि हमारा भविष्य का समाज कैसा होगा।

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