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जीएम फसलों से सावधानी जरूरी

Fri, 03 Jul 2020 04:22 AM IST
K C Tyagi के. सी. त्यागी
Updated Fri, 03 Jul 2020 04:22 AM IST
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It is important to be careful with GM crops
कृषि - फोटो : पीटीआई

बीती सदी के आठवें दशक में कई किसान आंदोलन शिखर पर थे। उनमें सबसे प्रसिद्ध और असरदार आंदोलन महाराष्ट्र शेतकरी संगठन द्वारा प्याज पर किया गया जन संघर्ष था। प्याज उत्पादकों के शोषण के खिलाफ शरद जोशी ने आवाज बुलंद की थी। उन्होंने ही शेतकरी संगठनों का गठन किया।


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भारत में पहली बार किसान आंदोलनों में नई किस्म के सवाल उठे, जब शेतकरी संगठन ने प्रस्ताव पास कर विश्व बाजार में किसानों का उत्पाद बेचने की आजादी की मांग की। दूसरे प्रस्ताव में उन्होंने जीएम फसलों को बढ़ावा देने की वकालत की और बीटी कॉटन का प्रयोग महाराष्ट्र समेत समूचे देश में लागू किए जाने की मांग की।

तीसरा प्रस्ताव यह कि फसलों के लगात मूल्य का सही से मूल्यांकन और बाजार में उसी दाम पर बेचे जाने का भी कानून बने। महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और आजकल पंजाब भी अधिक कपास उत्पादक क्षेत्र की श्रेणी में आते हैं। शरद जोशी और उनके संगठन का यह आकलन अब गलत साबित हो चुका है कि जीएम फसलों के प्रयोग से गेहूं, कपास, सोया एवं सरसों का बंपर उत्पादन हो सकता है।

शेतकरी संगठन के मौजूदा अध्यक्ष अनिल धानवत आजकल महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में किसानों को जीएम फसलों का महत्व समझा रहे हैं। जबकि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इन प्रयोगों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सर्वाधिक किसान आत्महत्याओं की खबरें विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र से आ रही हैं।

एचटीबीटी कॉटन पर सरकारी प्रतिबंध के बावजूद कपास उत्पादक किसान 25 प्रतिशत भू-भाग पर बुआई कर चुके हैं। किसानों को सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं कि इस कपास में कीटनाशकों का छिड़काव कम होने से लागत में कमी और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में वृद्धि होगी। कपास की खेती कीटों और पीली मक्खी के प्रकोप से प्रभावित है।

कई बार कीटनाशकों का छिड़काव करना होता है, जो खर्चीला भी है और विषैला भी। इससे किसानों की जिंदगी तो खतरे में पड़ती ही है, चार-पांच बार कीटनाशकों के इस्तेमाल से अनाज और सब्जियों में इसका बचा अवशेष बड़ी मात्रा में उपस्थित रहता है।

संसद में मंत्री स्वीकार चुके हैं कि कीटनाशकों पर छिड़काव करते समय 5,114 किसानों की मृत्यु हो चुकी है। इन्हीं खतरों को देखते हुए केंद्र सरकार राज्यों को निर्देश भी दे चुकी है कि प्रतिबंधित बीजों और दवाओं का इस्तेमाल न हो।

लेकिन पिछले दिनों जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) द्वारा जीएम सरसों की किस्म 'डी.एम.एच-II' के जैव विविधता और कृषि परिस्थिति पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर एक रिपोर्ट सौंपी गई है। संकेतों के मुताबिक, सरकार का रुख नरम है। ऐसे ही संकेत नीति आयोग से आ रहे हैं।

इस मुद्दों पर प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने स्पष्ट किया है कि जीएम फसलों के प्रयोग से पहले भूमि परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए। इन बीजों का एक बड़ा नुकसान यह भी है कि ये गैर-जीएम फसलों को भी वृहत स्तर पर संक्रमित करने की क्षमता रखते हैं।

पर किसान सिर्फ उत्पादन के प्रलोभन में फंसकर उत्साहित हो जाते हैं। संसद की कृषि मामलों की स्थायी समिति ने अपनी 73वीं रिपोर्ट में बताया है कि बीटी कपास की व्यावसायिक खेती से कपास उत्पादकों की माली हालत सुधरने के बजाय बिगड़ गई।

संतोषजनक है देश की जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति ने एचटीबिटी पर अभी तक इसे अपनी स्वीकृति प्रदान नहीं है। इन बीजों और कीटनाशकों को भारत में प्रचलित करने का कार्य अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो ने किया है, जिस पर कई देश प्रतिबंध भी लगा चुके हैं।

पर भारत में अपने स्थानीय साझेदार के साथ यह व्यापार बढ़़ाने में कामयाब रही है। हालांकि बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गुजरात की सरकार अपना रुख पहले ही स्पष्ट कर विरोध जता चुकी है।

भारत में कृषि चूंकि राज्य का विषय है, इसीलिए राज्य सरकारों की सहमति के बगैर कोई फैसला व्यावहारिक रूप नहीं ले सकेगा। अधिकतर राजनीतिक दल भी इन प्रयोगों का विरोध कर चुके हैं। आशा है, संसद के आगामी सत्र में कृषि से जुड़े इस मुद्दे का हल होगा। (लेखक पूर्व सांसद हैं।)

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