फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   It is extremely challenging to restore peace in Manipur

चुनौती: मणिपुर में उम्मीद की कोई किरण नहीं, सोच से परे है पूर्वोत्तर के इस राज्य की स्थिति

Sun, 15 Sep 2024 06:49 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 15 Sep 2024 06:49 AM IST
विज्ञापन
सार
मणिपुर संदेह, अविश्वास और जातीय संघर्षों के जाल में उलझ गया है। वहां की स्थिति सोच से परे हो गई है। ऐसे में वहां शांति बहाल करना बेहद चुनौतीपूर्ण है।
 
loader
It is extremely challenging to restore peace in Manipur
मणिपुर हिंसा - फोटो : ANI

विस्तार

अपने पिछले कॉलम्स को जब मैं पलट कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि मैंने मणिपुर के बारे में उतना नहीं लिखा, जितना लिखना चाहिए था। मैंने मणिपुर पर आखिरी बार 30 जुलाई, 2023 को लिखा था। अब इसे 13 महीने से अधिक समय हो चुका है। यह सभी भारतीयों के साथ मेरे लिए भी शर्मनाक है कि हम सबने इसे अपनी सामूहिक चेतना के अंधेरे कुएं में फेंक दिया है।



पिछले साल जब मैंने लिखा था, तब स्थिति बहुत खराब थी। मैंने तब कहा था, यह जातीयता के खत्म होने की शुरुआत है। मैंने कहा था, "मुझे जो भी रिपोर्ट्स मिली हैं या मैंने पढ़ी हैं, उनसे यही पता चलता है कि इंफाल घाटी में व्यवहारिक रूप से कोई कुकी-जोमी नहीं है और कुकी-जोमी बहुल क्षेत्रों में कोई मैतेई नहीं है। मुख्यमंत्री और उनके मंत्री अपने गृह कार्यालयों के बाहर तो काम करते हैं, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों का दौरा नहीं करते। मैंने यह भी कहा था कि "कोई भी जातीय समूह न तो मणिपुर पुलिस पर भरोसा करता है और न ही कोई हताहतों की आधिकारिक संख्या पर विश्वास करता है।"


सवालों के घेरे में
मैंने जो भी लिखा, वह सब दुर्भाग्य से सच साबित हुआ। संसदीय लोकतंत्र में मणिपुर की दुखद स्थिति के लिए एक या उससे अधिक सत्ताधारियों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। मैं यहां सत्ता में बैठे तीन नामों की चर्चा करूंगा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  
ऐसा लगता है, उन्होंने तय कर रखा है कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह मणिपुर की यात्रा नहीं करेंगे। उनके व्यवहार से प्रतीत होता है कि 'जलने दो मणिपुर को, मैं उस धरती पर कदम नहीं रखूंगा।' 9 जून, 2024 को अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से पीएम को इटली (13-14 जून), रूस (8-9 जुलाई), ऑस्ट्रिया (10 जुलाई), पोलैंड (21-22 अगस्त), यूक्रेन (23-24 अगस्त), ब्रुनेई (3-4 सितंबर) और सिंगापुर (4-5 सितंबर) की यात्रा का समय मिल गया। 2024 के बचे हुए महीने में उन्हें अमेरिका, लाओस, सामोस, रूस, अजरबैजान और ब्राजील की यात्रा पर जाना है। समय की कमी से मणिपुर की यात्रा उन्होंने नहीं की, ऐसा नहीं है। उन्होंने इस बेचारे राज्य में न जाने का मन बना रखा है।

मणिपुर की यात्रा न करना उनकी जिद को दिखाता है। गुजरात दंगों, सीएए विरोधी प्रदर्शनों और तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हमें इसकी झलक मिली और तब भी, जब उन्होंने अपने मंत्रियों को संसद के दोनों सदनों में सभी स्थगन प्रस्तावों का विरोध करने का निर्देश दिया, चाहे वह कितना भी जरूरी मामला क्यों न हो।

गृह मंत्री अमित शाह
मणिपुर सरकार में उच्च अधिकारियों की नियुक्ति से लेकर राज्य में सुरक्षा बलों की तैनाती तक हर मामले में गृह मंत्री अमित शाह शामिल रहे हैं। वह मणिपुर की 'सरकार' हैं। उनके सामने मणिपुर में तेजी से हिंसा बढ़ी है। मणिपुर के लोग सिर्फ बंदूकों और बमों से नहीं लड़ रहे, बल्कि स्वतंत्र भारत में पहली बार एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाई में रॉकेट और हथियारबंद ड्रोन प्रयोग हुआ। बीते सप्ताह ही दो जिलों में कर्फ्यू लगाया गया। स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए। पांच जिलों में इंटरनेट बंद कर दिया गया। इंफाल की सड़कों पर पुलिस छात्रों से लड़ रही है। सुरक्षा बलों को मजबूती देने के लिए राज्य में सीआरपीएफ की दो अतिरिक्त बटालियन भेजी गई हैं, जबकि राज्य में पहले से ही 26 हजार सुरक्षा बल तैनात हैं।

मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह  
वह अपने द्वारा बनाए गए हालात में ही घिरे हैं। वह और उनके मंत्री इंफाल घाटी में नहीं घूम पा रहे हैं। कुकी-जोमी समुदाय के लोग उनसे नफरत करते हैं। मैतेई ने सोचा कि वह उनकी सुरक्षा करेंगे, लेकिन ऐसा करने में उनकी असफलता ने उन्हें पूरे मणिपुर में और मैतेई लोगों के बीच भी अलोकप्रिय बना दिया। लोगों का प्रशासन पर कोई भरोसा नहीं रहा। राज्य में शासन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। उन्हें कई महीने पहले ही इस्तीफा दे देना चाहिए था। उनका लगातार पद पर बने रहना कभी गलती न मानने वाली मोदी और शाह की हठधर्मिता को दर्शाता है।

अपनी सोच, अपनी सरकार
सही मायने में मणिपुर में दो राज्य बन गए हैं। चूड़ाचांदपुर, फेरजवाल और कांगपोकपी जिले पूरी तरह कुकी समुदाय के नियंत्रण में हैं। वहीं, तेंग्नौपाल जिले (जिसमें सीमावर्ती शहर मोरेह भी शामिल है) में कुकी-जोमी और नागा समुदाय की मिश्रित आबादी है और यह कुकी-जोमी समुदाय के नियंत्रण में है। यहां पर कुकी-जोमी अपना अलग प्रशासन चलाते हैं। कुकी-जोमी नियंत्रित क्षेत्र में कोई भी मैतई सरकारी कर्मचारी नहीं है, वे घाटी के जिलों में बसे हुए हैं। 60 सदस्यों वाले मणिपुर में 40 मैतेई विधायक हैं और कुकी-जोमी ऐसे राज्य का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं, जहां मैतेई बहुमत में हों।

वहीं, मैतेई मणिपुर की पहचान और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना चाहते हैं। इसी को लेकर दोनों समुदायों के बीच लड़ाई है। सरकार और दोनों जातीय समूहों- मैतेई एवं कुकी-जोमी के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही है। नागाओं की केंद्र और राज्य सरकारों  के खिलाफ अपनी ऐतिहासिक शिकायतें हैं और वे मैतेई बनाम कुकी-जोमी संघर्ष में उलझना नहीं चाहते हैं।

कहीं कोई रोशनी नहीं!
मणिपुर संदेह, अविश्वास और जातीय संघर्षों के जाल में उलझ गया है। ऐसे में वहां शांति बहाल करना और सरकार चलाना बेहद कठिन है। केंद्र सरकार की उदासीनता और भाजपा द्वारा संचालित राज्य सरकार की अक्षमता के कारण वहां की स्थिति सोच से परे हो गई है। भारत के प्रधानमंत्री को शायद इस बात का अहसास हो गया है कि केंद्र के एक राज्य मणिपुर की उनकी यात्रा चंद्रमा के अंधेरे हिस्से की यात्रा की तरह खतरनाक हो सकती है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed