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मुद्दा: सिर्फ योजना बनाने से कुछ नहीं होगा शिक्षक-सुविधाएं बढ़ें, तो स्कूल आएं बच्चे
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संवाद
विस्तार
उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों को चलाने के लिए दो तरह की अघोषित नीतियां हैं। पहली नीति के तहत स्मार्ट क्लास चल रही हैं, इंटरनेट व टेक्नोलॉजी का खूब इस्तेमाल हो रहा है। दूसरी ओर स्कूल हैं, बच्चे भी हैं, पर पढ़ाने वाले ही नहीं हैं। बिना शिक्षक के स्कूल दूरस्थ और अति पिछड़े इलाकों में ही नहीं, बल्कि राजधानी में बेसिक शिक्षा निदेशालय की चमचमाती इमारत के चार-छह किलोमीटर के दायरे में भी मिल जाएंगे। राजधानी लखनऊ में ही ऐसे कई स्कूल हैं, जहां की इमारत छहाऊ है या जहां बिजली की ही पुख्ता व्यवस्था नहीं है।
यों तो बदहाल स्कूलों के कायाकल्प के लिए शिक्षा विभाग ऑपरेशन कायाकल्प समेत कई योजनाएं चला रहा है। कहीं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) से, तो कहीं सरकारी योजनाओं से संसाधनों को पूरा करने की कवायद चल रही है। 18 हजार से अधिक स्कूलों में स्मार्ट क्लास, आईसीटी लैब, दीक्षा एप आदि अत्याधुनिक संसाधनों से पढ़ाई शुरू कराई जा रही है, तो लर्निंग बाई डुइंग कार्यक्रम से उनका कौशल विकास किया जा रहा है, लेकिन ये तस्वीर का एकतरफा रुख है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में विषमता की इस खाई को पाटे बिना इन विद्यालयों को चलाने का लक्ष्य पूरा नहीं होगा।
प्राथमिक स्कूलों का हाल ऐसे समझिए कि बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों में सात साल से शिक्षकों की भर्ती ही नहीं हुई है। 2018 में दो बार शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन निकाला गया। भर्ती होते-होते तीन साल गुजर गए। 2021 के बाद कोई भर्ती ही नहीं की गई, अदालतों के कई बार टोका-टाकी के बावजूद। हर साल पांच से छह हजार शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं। कुछ शिक्षकों का असामयिक निधन हो जाता है। हास्यस्पद बात यह है कि इसके बाद भी विभाग की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि विद्यालयों में शिक्षकों की कोई कमी नहीं है, जबकि विभागीय सूत्रों के अनुसार ही प्रदेश के 600 से अधिक विद्यालयों में शिक्षक नहीं हैं। यहां जुगाड़ से काम चलाया जा रहा है यानी आसपास के शिक्षकों को अटैच करके या फिर शिक्षामित्र व अनुदेशक की तैनाती के जरिये।
स्थानांतरण या समायोजन की दोषपूर्ण नीतियों के कारण शहरी क्षेत्र के करीब 19 फीसदी स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है। 12 फीसदी स्कूल शिक्षामित्रों के भरोसे हैं और ये भी शिक्षकविहीन विद्यालयों की श्रेणी में आते हैं। 50 बच्चों से कम संख्या वाले करीब 27 हजार स्कूलों पर बंदी का खतरा रहा है। इन्हें बंद करने की कोशिश भी हो चुकी है, लेकिन विरोध के कारण फैसला टालना पड़ा।
4,000 से अधिक विद्यालय एकल शिक्षक वाले हैं। अगर कभी शिक्षक बीमार या अनुपस्थित हो गया, तो फिर बच्चों की स्कूल आने के बाद भी छुट्टी। यह विसंगति सिर्फ ग्रामीण ही नहीं, शहरी क्षेत्र में भी कई स्कूल ऐसे हैं, जहां बच्चों की संख्या 100-200 है, लेकिन शिक्षक एक ही है। उलटबांसी यह कि जहां पर बच्चे कम हैं, वहां पांच-पांच, छह-छह शिक्षक तैनात हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कई साल से शहरी क्षेत्र में शिक्षकों की तैनाती व तबादला करके नियुक्ति या तैनाती न किया जाना।
इसके लिए विभाग की ओर से फाइलें, तो कई बार चलीं, लेकिन कहीं न कहीं निजी स्कूलों के दबाव में यह कवायद अंजाम तक नहीं पहुंची। 2024 में भी इसके लिए प्रयास शुरू हुए थे, लेकिन प्रमुख सचिव के तबादले के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया है। इसकी वजह से शहरी क्षेत्र में भी सरकारी स्कूलों की स्थिति लगातार खराब हो रही है और निजी स्कूल तेजी से फलफूल रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ शिक्षकों की कमी से पढ़ाई-लिखाई चौपट है। संसाधनों का भी रोना है। प्रदेश के 70 से 80 हजार विद्यालयों में फर्नीचर न होने से खुले में क्लास लगानी पड़ती है। बारिश और ठंड की स्थिति में कैसे पढ़ाई होती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रदेश सरकार ने अब जाकर कहीं 2,000 करोड़ का भारी भरकम बजट डेस्क-बेंच आदि फर्नीचर स्कूलों को उपलब्ध कराने के लिए आवंटित किया है।
इतना ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्र के 1,400 से अधिक स्कूलों में अब भी बिजली की व्यवस्था नहीं है। कई जगह बिजली की व्यवस्था है, तो पंखे आदि की सुविधा नहीं है। ऐसे में काफी बच्चे या तो गर्मी में जूझते हुए या फिर खुले में पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करते हैं। जरूरी सुविधाएं न होने का असर विद्यालयों में बच्चों के नामांकन पर भी पड़ने लगा है। स्कूल चलो अभियान जोरदार तरीके से चलाने के बावजूद बच्चों की संख्या बढ़ने के बजाय घटने लगी है। सत्र 2023-24 में स्कूलों में दाखिल बच्चों की संख्या 1.92 करोड़ थी, सत्र 2024-25 में घटकर 1.52 करोड़ आ गई है। संख्या घटने से रोकने के लिए कक्षा एक में बच्चों के प्रवेश के लिए छह साल की निर्धारित आयु सीमा में ढील देने की विभाग को घोषणा करनी पड़ी। 60 से अधिक विद्यालय अब भी ऐसे हैं, जहां एक भी बच्चे का दाखिला नहीं हो सका है। यहां पर एक भी बच्चे का नामांकन नहीं है। इसलिए प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए अब भी बहुत काम करना बाकी है।