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हालात : क्या युद्ध ही वर्तमान का प्रासंगिक मूल्य है, फिर भी मसले तो हल होने से रहे
Thu, 26 Jun 2025 07:27 AM IST
शिव शुक्ला
नंदितेश निलय
नंदितेश निलय
Published by: शिव शुक्ला
Updated Thu, 26 Jun 2025 07:27 AM IST
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युद्ध (सांकेतिक तस्वीर)
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विस्तार
युद्ध में डूबी दुनिया को क्या याद करना चाहिए? क्लाउड लेवी स्ट्रॉस की चेतावनी कि ‘दुनिया इन्सानों के बगैर शुरू हुई थी और इन्सानों के बगैर ही खत्म होगी।’ आखिर क्यों नहीं? परमाणु बम और मिसाइलों की रेंज बताती इस दुनिया में कोई ऐसा नेतृत्व है, जिसे यकीन हो कि इस दुनिया को बचाना ही एक नेतृत्व के लिए सब कुछ होता है। और कोई नेतृत्व सिर्फ नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ही युद्ध विराम को अपने हिसाब से एक टूल न बना ले, बल्कि शांति का भी नेतृत्व करता नजर आए। क्या विश्व को एक ग्रुप ऑफ गुड लीडर्स जैसी संस्था की आवश्यकता आ पड़ी है, जो दुनिया को शांति और सद्भाव का पाठ पढ़ा सके?
आतंकवाद और घृणा से घिरते एवं फिर हिंसक होते इस समाज को कोई बर्बाद होने से बचाना क्यों नहीं चाहता? क्यों आखिर युद्ध ही सभी मसलों का हल है? और अगर है, तो फिर ये मसले हल क्यों नहीं होते? इन सबके बीच शांति क्या अप्रचलित मूल्य बन चुकी है? ऐसा लगता है, जैसे धर्म और नस्ल में दिनों-दिन बंटती जा रही इस दुनिया को सिर्फ पैसे और व्यापार से ही युद्ध से दूर किया जा सकता है, शांति के उद्बोधन और सामाजिक आचरण से नहीं। क्या शांति अपने आप में किसी नेतृत्व का ‘सेंटर ऑफ ग्रेविटी’ नहीं हो सकती?
सर्दियों से पहले शरद ऋतु आती है और आते हैं वे अच्छे लोग, जो लोगों के जीवन में खुशियों के रंग भरते हैं। और उन अच्छे लोगों में से कोई बहुत अच्छा व्यक्ति उनका लीडर बनता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि न तो समाज में एकजुटता के पत्ते भूरे होंगे और न ही आम आदमी की मुस्कान। लेकिन मिसाइलों के धमाकों में वह लीडर कहां है? यह दुनिया चंद्रमा के बाद अब मंगल ग्रह और अंतरिक्ष में मनुष्यों की विशाल छलांग की कहानी गढ़ रही है। लेकिन पृथ्वी पर विकास और जिजीविषा की छलांग सिर्फ युद्ध के संदेश लिए ड्रोन और मिसाइलों से क्यों हो रही है? क्या अब भी हमारी धरती को उन भूले-बिसरे नेताओं के पदचिह्नों की जरूरत है, जिन्हें दुनिया ने पिछले कुछ दशकों में देखा है?
मुझे तो सबसे ज्यादा महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला याद आ रहे हैं। इधर युद्ध, मिसाइल, ड्रोन हर जगह मंडरा रहे हैं, तो ग्लोबल वार्मिंग, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, आतंकवाद, निरक्षरता, महंगाई, भुखमरी का संकट भी बढ़ता जा रहा है। फिर यह दुनिया बचेगी कैसे? कौन होगा वह लीडर, जो शांति का नायक बनेगा? और क्या शांति के नेतृत्व के लिए भी आर्थिक और सामरिक शक्ति का विशाल जखीरा रखना एक ‘जरूरी योग्यता’ बन जाएगी? क्या महान सम्राट अशोक की कहानी इतिहास में हिंसा से अहिंसा के हृदय परिवर्तन की आखिरी कहानी बनकर रह जाएगी? आज हर दूसरा व्यक्ति डिजिटल वर्ल्ड में इन्फ्लुएंसर बना घूम रहा है। तो फिर वह इन्फ्लुएंस शांति और सद्भाव के लिए क्यों नहीं होता?
अगर सब कुछ एक लीडर के हाथ में होता है, तो वह अच्छा नेता कैसा होता है? अरस्तू इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि एक अच्छा नेता कोई और नहीं, बल्कि एक अनुयायी होता है और वह अनुसरण करता है लोगों की जरूरतों और इच्छाओं का, सभी के कल्याण का। आधुनिक दुनिया में ‘अनुसरण’ शब्द सिर्फ मेटा और ब्लू टिक के इर्द-गिर्द ही दिखाई देता है। अंत में, अरस्तू ने निष्कर्ष निकाला कि एक अच्छा अनुयायी ही एक अच्छा नेता बनने के योग्य होता है।
वर्तमान दुनिया में जहां हर कोई अपने लिए जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है, क्या हम ऐसे नेता पा सकते हैं, जो आंसुओं, पराजयों, संघर्षों, गरीबी, भय, अशिक्षा, संघर्ष, भूख, और युद्ध के परिणाम को समझते हुए शांति का अनुसरण करना पसंद करें? भारत ने तो अभी हाल के युद्ध में साहस और धैर्य, दोनों का अनुसरण किया। भारतीय सेना और सरकार ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब भी दिया और सिर्फ आतंकी ठिकानों पर प्रहार किया। भारत ने हमेशा शांति का अनुसरण किया और अगर युद्ध के लिए उकसाया भी गया, तो उसने भारतीय दर्शन का मूल्य नहीं खो गया। युद्ध सिर्फ उन्हीं के साथ हुआ, जो सिर्फ युद्ध की भाषा समझते हैं।
प्रारंभिक यूनानी दार्शनिक हमेशा दो सवालों के जवाब देने में रुचि रखते थे: दुनिया क्या है और एक अच्छा व्यक्ति या नेता क्या है? महान सुकरात का मानना कि अच्छाई सत्य का अंतिम रूप है और न्याय या साहस जैसे अन्य सभी मूल्य तब प्रासंगिक हैं, जब वे अच्छाई या भलाई से संबंधित हों। अंत में, वे निष्कर्ष निकालते हैं कि केवल वे ही राज्य का नेतृत्व करने के हकदार हैं, जो आम लोगों की भलाई के लिए कार्य करने की नैतिक शक्ति रखते हैं। यानी एक अच्छा नेता वह होता है, जो मूल्यों के साथ चलता है और युद्ध के बजाय शांति को चुनता है।
आजादी के समय सारे नेता आजादी के जश्न और उस शक्ति को संजोने में डूबे थे, उधर वह अहिंसा और सत्य का नायक नोआखाली की सड़कों पर भूख हड़ताल पर बैठा था। पहली बार मानवता के आदर्श को उन दंगों में उसने बुरी तरह लहूलुहान देखा था। गांधी को कुर्सी की लालसा नहीं थी और न ही चुनाव की चिंता। वह तो सिर्फ बंगाल, पंजाब और दिल्ली की गलियों में शांति और सद्भाव ढूंढ रहे थे। जरूरी है कि विश्व के अच्छे नेता हर उस स्थान पर जाएं, जहां बम और मिसाइलों से आम जनता, मासूम बच्चों, औरतों, युवाओं और वृद्धों की जान गई। वे उनके पास भी जाएं, जिन्हें युद्ध ने गरीबी और भुखमरी के बीच धकेल दिया।
इस विश्व को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है, जो बता सके कि देश की रक्षा करना देशभक्ति तो होती ही है, देशवासियों की रक्षा करना भी अच्छे नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है। भारत उस बुद्ध की शांति को बरसों से ढूंढता रहा। युद्ध अंतिम विकल्प होता है किसी नेतृत्व का और अच्छा नेता देश को युद्ध में धकेलने के पहले कई बार सोचता है। भारत ने हमेशा दया और शांति को ही चुना है। पाकिस्तान, रूस, यूक्रेन, बांग्लादेश, इस्राइल, ईरान और अमेरिका को सोचना होगा कि इस पृथ्वी को बचाना है, तो कैसे? यह ट्रेड डील से नहीं होगा। होगा तो सिर्फ इस यकीन से कि मानवता से बड़ा कुछ नहीं होता। कवि चंडीदास कहते हैं, ‘सबार उपरे मानुष सत्य, ताहार उपरे नाई’ यानी सबसे ऊपर सिर्फ मानवता का सत्य होता है, मानवता से बड़ा कुछ नहीं होता।