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मुद्दा: क्या डिजिटल ब्लैकआउट की आशंका? इंटरनेट बाधित होने से थम सकती है अर्थव्यवस्था और आधुनिक जीवन की गति
Tue, 07 Apr 2026 08:14 AM IST
Pavan
योगेश कुमार गोयल
योगेश कुमार गोयल
Published by: Pavan
Updated Tue, 07 Apr 2026 08:14 AM IST
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क्या डिजिटल ब्लैकआउट हो सकता है
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अमर उजाला
विस्तार
इतिहास गवाह है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, उन जीवन रेखाओं पर लड़े जाते हैं, जो किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और समाज को जीवित रखती हैं। ऐसे में, ईरान-अमेरिका संघर्ष का खतरा अब केवल मिसाइलों, ड्रोनों या तेल के कुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उस अदृश्य धागे (इंटरनेट) पर है, जिसने पूरी दुनिया को ‘ग्लोबल विलेज’ बना रखा है।लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी सबमरीन केबल्स को काटने की ईरान की चेतावनी ने तकनीकी विशेषज्ञों और नीति-निर्धारकों की नींद उड़ा दी है। यदि यह ‘डिजिटल लाइफलाइन’ कटती है, तो इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण दुनिया केवल अंधेरे में ही नहीं डूबेगी, बल्कि आधुनिक सभ्यता का पूरा ढांचा चरमरा जाएगा। समुद्र की गहराइयों में बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल आधुनिक सभ्यता की नसों की तरह हैं, जिनसे डाटा, संवाद, अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रगति का संचार होता है।
विश्व का लगभग 95-97 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डाटा ट्रैफिक इन्हीं सबमरीन केबल्स के जरिये प्रवाहित होता है। हमारे दैनिक जीवन की लगभग हर डिजिटल गतिविधि (ई-मेल, वीडियो कॉल, बैंकिंग लेनदेन, क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई, रक्षा एवं कूटनीतिक संचार) इन्हीं केबल्स पर निर्भर है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एवं लाल सागर आज केवल समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि डाटा प्रवाह की धुरी के रूप में उभर चुके हैं। अनुमानतः वैश्विक इंटरनेट डाटा का 15 से 30 प्रतिशत प्रवाह इसी से होकर गुजरता है। यदि किसी सैन्य तनाव, समुद्री दुर्घटना, लंगर गिरने या जानबूझकर किए गए हमले से ये केबल्स क्षतिग्रस्त होती हैं, तो उसका प्रभाव तत्काल वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाता है। यदि कनेक्टिविटी बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियां ठहर जाएंगी, शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है और बैंकिंग सेवाएं अचानक निष्क्रिय हो जाएंगी। सबसे गंभीर प्रभाव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्लाउड सेवाओं पर पड़ेगा। आज के एआई मॉडल और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर निरंतर डाटा प्रवाह पर निर्भर हैं। जैसे ही यह प्रवाह रुकता है, ये उन्नत प्रणालियां निष्क्रिय हो जाती हैं, चाहे वह रक्षा तंत्र हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों या संचार नेटवर्क। दुनिया में गिने-चुने विशेष ‘केबल रिपेयर शिप’ ही उपलब्ध हैं। क्षतिग्रस्त केबल की पहचान और मरम्मत का काम सामान्य दिनों में भी आसान नहीं होता है। 2022 में टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट के बाद एकमात्र केबल को ठीक करने में 37 दिन लग गए थे।
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अपनी संरचना में जितनी सशक्त दिखती है, भौगोलिक रूप से उतनी ही संवेदनशील भी है। भारत का एक बड़ा डाटा ट्रैफिक पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप और अमेरिका तक जाता है। यदि होर्मुज या लाल सागर में केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो भारत में इंटरनेट स्पीड घट सकती है, नेटवर्क आउटेज हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी व्यवधान का सबसे बड़ा आघात भारत के आईटी और सेवा क्षेत्र पर पड़ेगा, जो वैश्विक ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करता है। कनेक्टिविटी बाधित होने का अर्थ है, अरबों डॉलर का संभावित नुकसान, और विश्वसनीयता पर भी आघात। हालांकि, भारत के पास कुछ वैकल्पिक मार्ग मौजूद हैं, जैसे सिंगापुर और प्रशांत महासागर के रास्ते, लेकिन ये न तो पर्याप्त हैं और न ही पूरी क्षमता को संभाल सकते हैं।
वर्तमान संकट ने साफ कर दिया है कि भविष्य की वैश्विक स्थिरता केवल भौतिक सीमाओं से नहीं, बल्कि डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा से भी निर्धारित होगी। ऐसे में, ‘डिजिटल डायवर्सिफिकेशन’ अनिवार्य हो गया है। भारत जैसे उभरते डिजिटल शक्ति केंद्र के लिए वैकल्पिक डाटा मार्गों का विकास अत्यंत आवश्यक है। विशेषकर प्रशांत महासागर के रास्ते अमेरिका से कनेक्टिविटी जैसे विकल्प संकट के समय जीवनरेखा साबित हो सकते हैं। घरेलू डाटा सेंटरों को सुदृढ़ करना, नए केबल प्रोजेक्ट्स में निवेश बढ़ाना और बहुमार्गीय कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही कूटनीतिक प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्रों को ‘डिजिटल युद्धक्षेत्र’ बनने से रोका जा सके।
यदि ईरान-अमेरिका तनाव समुद्र की गहराइयों तक पहुंचकर डिजिटल अवसंरचना को निशाना बनाता है, तो यह केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानवता के डिजिटल अस्तित्व पर आघात होगा। ऐसे में, सबमरीन केबल्स को ‘क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर’ घोषित कर युद्धकाल में भी इन्हें संरक्षित रखने हेतु सख्त वैश्विक नियम बनाने होंगे। यदि इंटरनेट की धारा बाधित होती है, तो न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि आधुनिक जीवन की गति भी थम सकती है और यही भविष्य के युद्धों का सबसे संवेदनशील मोर्चा बनता जा रहा है।