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हार में जीत तलाशता ईरान: ट्रंप ने धार्मिक तानाशाही से मुक्ति का वादा किया, अब ईरानियों को लड़नी होगी अधूरी जंग

Tue, 21 Jul 2026 09:13 AM IST
SPrasannarajan प्रसन्नराजन एस प्रसन्नराजन
Updated Tue, 21 Jul 2026 09:13 AM IST
सार

हार में भी जीत का भ्रम पालने वाला ईरान सिर्फ दुनिया की शांति के लिए नहीं, अपने भविष्य के लिए भी बड़ा खतरा है। ट्रंप ने धार्मिक तानाशाही से मुक्ति का वादा किया था, पर हालात ऐसे बन रहे हैं कि ईरान की अधूरी जंग अब ईरानियों को ही लड़नी होगी।

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Iran seeking victory in defeat Trump promised liberation from religious dictatorship now Iranians alone in War
मोजतबा खामेनेई और डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

यह वही है, जो हम सबने सोचा। इस युद्ध में कोई नहीं जीता। अमेरिका और ईरान, दोनों की छवि को नुकसान पहुंचा। अमेरिका के लिए यह नुकसान प्रतीकात्मक था, जबकि ईरान को अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत जैसी कीमत चुकानी पड़ी। नैरेटिव की लड़ाई में सिर्फ एक ही विजेता था-ईरान। अमेरिका-विरोधी भावना, यहूदी-विरोधी सोच और एक सभ्यता के प्रति गलत सोच के अजीब मेल ने एक क्रूर शासन को ‘कमजोर होते हुए भी पलटवार करने वाले’ की छवि बनाने में मदद की। अमेरिका के खिलाफ हमेशा जारी रहने वाले संघर्ष की पुरानी कहानी के सहारे जीत का दावा करने वाला कोई बड़ा धर्मगुरु नहीं था। फिर भी, ईरान ने नैरेटिव की इस जीत को युद्धविराम के बाद भी लोगों को भ्रमित करने के लिए इस्तेमाल करने से खुद को नहीं रोका। ईरान ने समझौता इसलिए तोड़ा, क्योंकि वह ऐसा कर सकता था।

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अधूरे युद्ध के बाद दुनिया को देखने के अपने नजरिये से, ईरान अमेरिका को एक कमजोर या घटती हुई ताकत मानता है और उसके राष्ट्रपति को बड़ी-बड़ी बातें करने वाला धोखेबाज। ईरान का मानना है कि भले ही वह खुद नुकसान झेल चुका हो और घायल हो, फिर भी वह महाशक्ति देश को चुनौती दे सकता है। वहीं, ट्रंप ने खुद को हल्के में लेने दिया और ईरान ने दुनिया से यही संकेत लिया। दुनिया का लगभग हर नेता अमेरिकी राष्ट्रपति के अहंकार को साधने की कला में माहिर हो रहा है। वे ट्रंप के अचानक लिए गए फैसलों को समझने और उनकी समझदारी को कम आंकने का तरीका सीख रहे हैं। ईरान ने उनका मजाक उड़ाने की हिम्मत दिखाई है।
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ट्रंप के साम्राज्यवाद को सही ढंग से समझा गया है। वह एक ऐसे साम्राज्य के मुखिया हैं, जो उनके अपने अहंकार जितना ही बड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर एकमात्र संरक्षक के तौर पर ईरान का लौटना, राष्ट्रपति ट्रंप पर सीधा हमला है, जो युद्ध जीतने का दावा करते हैं। यह उस राष्ट्रपति को चुनौती देना था, जिन्होंने इस रास्ते को आजाद कराने का वादा किया था, जो अमेरिका के लिए ऊर्जा-समृद्ध भविष्य के उनके विजन का अहम हिस्सा है। ट्रंप का विजन, खुद उनके इरादों के बावजूद, बाकी दुनिया की आर्थिक जरूरतों से मेल खाता है।
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ईरान को लगता है कि इतिहास उसके साथ है, और ट्रंप से तंग आ चुकी दुनिया की भावनाएं भी। उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि वह पहले ही अपने ज्यादातर नेताओं को खो चुका है। इसने जो चीज बरकरार रखी है, वह है एक सैन्य-इस्लामिक ढांचा, जिसे चार दशकों से अधिक समय में बेहद घातक और सटीक बनाया गया है। ईरान के पास यही एकमात्र मजबूत व्यवस्था है, और यह इतनी गहराई से जमी हुई है कि कोई भी युद्ध इसके फैलाव या इसके गुमनाम नेतृत्व के ढांचे को खत्म नहीं कर सकता। अमेरिका को निराश करने वाली ईरान की उस प्रतिक्रिया ने यह दिखाया कि कैसे ‘ईश्वर के क्रांतिकारी’ के मार्गदर्शन के बिना भी किसी युद्ध को बेअसर किया जा सकता है। ऐसा लग रहा था, जैसे फारसी लोककथाओं की कोई रहस्यमयी शक्ति बहुत बड़े पैमाने पर बुराई को काबू में कर रही हो।

यह अब भी वैसा ही है। ट्रंप भले ही दावा करें कि आक्रामक ईरान के खिलाफ हमले जारी रखने के लिए अमेरिका को युद्ध की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें उस व्यवस्था की असलियत का जरा भी अंदाजा नहीं है, जिसके साथ वह समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं। ईरान में एक ऐसी सरकार है, जिसमें कोई एक सर्वोच्च अधिकारी या आवाज नहीं है। उसके सभी प्रवक्ताओं की विश्वसनीयता बस एक होलोग्राम जैसी है। ईरान ने नैरेटिव की जो लड़ाई जीती है, उससे वह शहादत को राष्ट्रीय ताकत और मलबे को स्मारक में बदल सकता है। यह बेचेहरा सरकार मानवीय जवाबदेही से मुक्त है, यहां तक कि धार्मिक वैधता का उसका दिखावा भी महज एक क्रांतिकारी मुखौटा है। उसकी यही खतरनाक आजादी न सिर्फ अमेरिकी ताकत का सामना करती है, बल्कि उसे नीचा भी दिखाती है।

लेकिन, इसका शिकार केवल अमेरिका या होर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी जान जोखिम में डालने वाले नाविक ही नहीं हैं। उन्हें तो कीमत चुकानी ही पड़ती है, साथ ही पूरे पश्चिम एशिया को भी। अमेरिकी हमले का बदला लेने के लिए आसान शिकार की तलाश कर रहा ईरान, खाड़ी क्षेत्र में पहले ही बेचैनी का माहौल बना चुका है। ईरान ने हमेशा एक साम्राज्यवादी देश के आत्मविश्वास के साथ अपनी आध्यात्मिक और सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया है। असल में और अपने रवैये में वह ऐसा ही था। उसने अपने पड़ोस के उन आतंकवादी संगठनों को हथियार और इस्लामी विचारधाराओं की आपूर्ति की, जो उन लोगों के प्रति भारी नफरत और उन्हें खत्म करने की भावना रखते थे, जिन्हें वे अपने अनुकूल नहीं मानते थे। फिर भी, हार में जीत खोजने वाला ईरान सिर्फ दुनिया की शांति के लिए ही खतरा नहीं है, अपने देश के लिए भी एक बड़ा खतरा है।

ट्रंप ने ईरानियों को धार्मिक तानाशाही से आजादी दिलाने का वादा करते हुए लड़ाई छेड़ी थी। इस तरह का नैतिक आदर्शवाद असल में पुरानी अमेरिकी सोच थी, जिसमें अपने फायदे और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का मेल होता था। और यही वे ईरानी चाहते थे, जिन्होंने सत्ता को चुनौती दी और अंततः जेलों में या कब्रगाहों में जा पहुंचे। एक लड़खड़ाती क्रांति की भूख कभी नहीं मिटती और अतीत की सभी क्रांतियों की तरह, इसे बनाए रखने के लिए भी बागी लोगों के खून की जरूरत थी। ट्रंप उम्मीद जगाने वाले एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी उनसे ऐसी उम्मीद कम ही थी।


ईरान की अधूरी लड़ाई अब ईरानियों को ही पूरी करनी होगी। ट्रंप भी अपनी बातों पर टिक नहीं सके। उन्होंने ईरानियों को ऐसा मौका ही नहीं दिया कि वे अपनी क्रांति शुरू कर पाते। असली ईरानी क्रांति के एक दशक बाद, 1989 में पूर्वी यूरोप में ‘वी द पीपल’ (हम लोग) के नारे के साथ बदलाव की लहर उठी। उस समय रीगन, थैचर और पोप जैसे प्रभावशाली लोग खुलकर आजादी के पक्ष में खड़े थे। लेकिन, जब ईरानियों को लगा कि अब उनके बदलाव का समय आ गया है, तब युद्ध के माहौल में उनके साथ कोई मजबूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं था। सिर्फ ट्रंप नजर आए, जिन्होंने अपना वादा भी जल्द ही भुला दिया। नतीजा यह हुआ कि ईरान की सत्ता ने भीतर से ही विरोध को दबा दिया।

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