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भारत-अमेरिका रिश्ते में निवेश, ऊर्जा नीति में एक नए अध्याय की शुरूआत

Sat, 28 Sep 2019 03:50 AM IST
मधुरेंद्र सिन्हा मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा Published by: मधुरेंद्र सिन्हा Updated Sat, 28 Sep 2019 03:50 AM IST
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Investment in India-US relationship
पेट्रोनेट एलएनजी - फोटो : a

अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में पचास हजार से भी ज्यादा भारतीयों की भीड़ में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए भारतीय कंपनी पेट्रोनेट द्वारा वहां ढाई अरब डॉलर निवेश करने पर भारी खुशी जताई। ट्रंप उन अमेरिकी राष्ट्रपतियों में नहीं हैं, जो देने में विश्वास करते हैं। वह पेशे से व्यापारी हैं और देने में कम, लेने में ज्यादा यकीन रखते हैं। चुनाव के पहले एक बड़ा विदेशी निवेश उनके लिए महत्वपूर्ण है और इसलिए उन्होंने खुशी जताई। दूसरी ओर भारत को भी अमेरिका केे ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने से काफी फायदा है। दरअसल अमेरिका के पास दुनिया में सबसे ज्यादा कच्चे तेल का सुरक्षित भंडार है, 310 अरब बैरल, जो सऊदी अरब से भी कहीं ज्यादा है। भारत को वहां निवेश करने से कहीं ज्यादा फायदा है।  वह इसका सहारा लेकर तेल बेचने वाले देशों से मोलभाव कर सकता है और अपनी शर्तें मनवा सकता है। ध्यान रहे कि चीन के बाद भारत तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है। बड़ी बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ऊर्जा का सहारा लेकर अमेरिका से अपने रिश्ते और मजबूत करने का एक ठोस जरिया ढूंढ़ा है।


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भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से आगे बढ़ने से यहां की ऊर्जा की मांग भी उतनी ही तेजी से बढ़ी है। इसने न केवल हमारा व्यापार संतुलन गड़बड़ा दिया है, बल्कि बजट घाटा भी बढ़ा दिया है। आने वाले 25 वर्षों तक ऊर्जा की हमारी मांग 4.2 प्रतिशत की दर से बढ़ती रहेगी। इससे हमारा व्यापार घाटा और बढ़ेगा।

जाहिर है कि इस पर नियंत्रण किए बगैर हम बहुत आगे नहीं बढ़ सकते हैं। और इसलिए भारत ने अमेरिका में निवेश का रास्ता चुना है। यह एक सही कदम है और ऊर्जा की हमारी बढ़ती मांग को पूरा करने में कारगर साबित होगा।

भारत ने अमेरिका से 90 लाख टन प्राकृतिक गैस (एलएनजी) प्रति वर्ष खरीदने का करार किया है। हमारे देश में गैस की खपत बढ़ती जा रही है और जल्द ही हम दुनिया में गैस आयात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश हो जाएंगे। ऊर्जा के स्रोत के रूप में गैस का इस्तेमाल सस्ता पड़ता है और भारत उस दिशा में धीरे-धीरे जा रहा है। देश कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना चाह रहा है और इसलिए बिजली से चलने वाली कारों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

दूसरी ओर सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल ने अमेरिका से 46 लाख टन कच्चे तेल के लिए करार किया है। यह कच्चा तेल नॉर्वे की कंपनी इक्विनोर तथा अल्जीरिया की कंपनी सौनाट्रैक के जरिये भारत आएगा। भारतीय कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी ने अमेरिका की कंपनी टेलुरियन इंक से जो समझौता किया है, उसके तहत उसे अगले 40 वर्ष तक 50 लाख टन एलएनजी हर साल मिलता रहेगा। पेट्रोनेट इस कंपनी में आने वाले समय में कुल 2.5 अरब डॉलर का निवेश करेगी। गैस की हमारी जरूरतों को इससे सहारा मिलेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के सबसे बड़े राज्य टेक्सास में यह कार्यक्रम इसलिए भी रखा था कि यह राज्य तेल और गैस के मामले में बहुत समृद्ध है और इस राज्य से समझौता करके वह अपनी जरूरतों का एक हिस्सा पूरा कर सकता है। ह्यूस्टन को ऊर्जा की दुनिया की राजधानी कहा जाता है। प्रधानमंत्री ने ह्यूस्टन में अमेरिका की 17 बड़ी ऊर्जा कंपनियों के सीईओ से मुलाकात की। इनमें एक्जॉनमोबिल, बीपी, शेनियर एनर्जी, डोमिनियन एनर्जी, टोटल वगैरह शामिल थीं। इनका कुल सालाना कारोबार एक खरब डॉलर से भी ज्यादा है। इन कंपनियों के अधिकारियों से मिलकर प्रधानमंत्री ने देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए दीर्घकालीन व्यापारिक संबंध बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इन कंपनियों से भारत ने टेक्नोलॉजी से लेकर पर्यावरण तक पर बातचीत की। इसमें निवेश पर भी बातचीत हुई। भारत अब तक अफ्रीका तथा इस तरह के देशों में तेल-गैस के लिए निवेश करता रहता था। ऊर्जा के क्षेत्र में भारत में इसके पहले कभी भी इतनी बड़ी पहल नहीं हुई है।

हम ज्यादातर ईरान-इराक और सऊदी अरब पर निर्भर रहते रहे हैं और जब भी पश्चिम एशिया में जंग जैसे हालात पैदा होते हैं, तो हमारे लिए चिंता पैदा हो जाती है, क्योंकि इनका सीधा असर सीधे तेल-गैस की कीमतों तथा उनकी आपूर्ति पर पड़ता है। ईरान पर कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत के लिए वहां से तेल लेना नामुमकिन हो गया है और इस वजह से सऊदी अरब तथा ओपेक देशों की चांदी हो गई है। इनके दाम बढ़ने से देश में मुद्रास्फीति बढ़ जाती है, जिसका असर आम आदमी पर पड़ता है।

दरअसल कच्चे तेल और गैस तथा ईंधन की दुनिया में नई-नई प्रौद्योगिकी आ गई है, जिसे पाना भारत के लिए जरूरी है। प्रधानमंत्री मोदी ने नई प्रौद्योगिकी में हमेशा दिलचस्पी दिखाई है और इस बार भी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के सीईओ से उनकी जानकारी ली। इस बार एक दिलचस्प बात यह समाने आई कि भारत के पास जो कोयले का भंडार है, उससे कृत्रिम गैस बनाई जा सकती है, जिससे केमिकल बनाए जा सकते हैं।

दरअसल हमारे पास जो कोयला है, वह निम्न गुणवत्ता का है और उसका बहुत इस्तेमाल नहीं हो सकता है। इस प्रौद्योगिकी से हम कोयले के इस विशाल भंडार का सही इस्तेमाल कर सकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र की ये कंपनियां दुनिया के 150 देशों में फैली हुई हैं और वे भारत में बड़ा निवेश करने में सक्षम हैं। इनका निवेश न केवल भारत की दीर्घकालीन ऊर्जा की मांग को पूरा करने में मदद करेगा, बल्कि देश में रोजगार बढ़ाने में भी। भारत ने अमेरिका में तेल-गैस के क्षेत्र में निवेश की घोषणा करके अपनी दीर्घकालीन ऊर्जा नीति में एक नया अध्याय शुरू किया है। इससे न केवल हमारी तेल-गैस की आपूर्ति सुनिश्चित होगी, बल्कि व्यापार संतुलन बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी।

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