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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : ये अर्थव्यवस्था की सूरत बदल रही हैं, नए ढंग से परिभाषित हो रहे हैं उद्योग
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अपनी आर्थिक यात्रा में भारत एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां इसके समावेशी और टिकाऊ विकास को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं की शक्ति का उपयोग करने की क्षमता है। आबादी में 48 फीसदी की हिस्सेदारी के बावजूद भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महिलाओं का योगदान मात्र 18 फीसदी है, जो आर्थिक भागीदारी में लैंगिक खाई को रेखांकित करता है। हालांकि, महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यमों का उदय इस अंतर को पाटने, ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने और देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का एक प्रभावशाली अवसर प्रदान करता है।
महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यम, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के शक्तिशाली इंजन साबित हुए हैं। ये न केवल रोजगार के अवसर पैदा करते हैं, बल्कि क्षेत्रीय संसाधनों और कौशल का उपयोग करके स्थानीय आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, उद्यम पंजीकरण पोर्टल की रिपोर्ट है कि अनौपचारिक सूक्ष्म उद्यमों सहित एमएसएमई 20.39 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं, जिसमें महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश भर में महिला उद्यमी बाधाओं को तोड़ रही हैं और उद्योगों को नए ढंग से परिभाषित कर रही हैं। सांगली में रहने वाली एक इंजीनियरिंग स्नातक युवती ने बैंक से चार लाख रुपये का ऋण लेकर फ्लेवर्ड पॉपकॉर्न व्यवसाय शुरू किया और लगभग 20 श्रमिकों के लिए रोजगार सृजित किए हैं। आज उसका टर्नओवर 40 लाख रुपये तक पहुंच गया है।
मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट के अध्ययन से पता चलता है कि भारत में महिला समानता को बढ़ावा देने से 2025 के अंत तक अर्थव्यवस्था में 770 अरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है। महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यम इसके प्रमुख चालक हो सकते हैं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां वे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित कर सकते हैं, बुनियादी ढांचे में सुधार कर सकते हैं और सामाजिक पूंजी को बढ़ा सकते हैं। महिला उद्यमियों में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उन्हें कई ऐसी व्यवस्थागत अड़चनों का सामना करना पड़ता है, जो उनके विकास को बाधित करती हैं। वित्तीय उपेक्षा बहुत गंभीर है, क्योंकि दुनिया भर में 65 फीसदी महिलाओं की औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच नहीं है। भारत में यह स्थिति लालफीताशाही और सरकारी सहायता योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी के कारण और भी बदतर हो गई है। इसके अलावा, उद्योगों में 88 फीसदी महिलाएं असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिससे उनके सामने नौकरी की असुरक्षा तो रहती ही है, सामाजिक लाभों से भी वे वंचित रहती हैं।
इसके अतिरिक्त, महिलाओं के बीच उद्यमशीलता सीमित है। भारत में केवल 10 फीसदी स्टार्ट-अप महिलाओं द्वारा स्थापित किए गए हैं, जिसका मुख्य कारण ऋण तक सीमित पहुंच, अपर्याप्त मार्गदर्शन और औपचारिक वित्तपोषण विकल्पों की कमी है। ये चुनौतियां सामूहिक रूप से महिला उद्यमियों की प्रगति और अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को बाधित करती हैं। महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के महत्व को समझते हुए केंद्र सरकार ने कई पहल और नीतियां शुरू की हैं। पिछले कुछ वर्षों में, जेंडर बजट में लगातार वृद्धि देखी गई है, जो वित्त वर्ष 2025-26 में 4.49 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो कुल केंद्रीय बजट का 8.86 फीसदी है, हालांकि 100 फीसदी महिला-केंद्रित योजनाएं स्थिर हो गई हैं, जो कार्यान्वयन अंतराल को उजागर करती हैं। मुद्रा योजना जैसी प्रमुख पहलों ने किफायती ऋण प्रदान करके महिला उद्यमियों को सशक्त बनाया है। हालांकि, मुद्रा योजना के तहत मौजूदा ऋण राशि अक्सर स्थायी व्यवसाय शुरू करने के लिए अपर्याप्त होती है, जिसके लिए उच्च आवंटन और सुव्यवस्थित प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। महिला उद्यमियों के लिए अवसरों का परिदृश्य बहुत व्यापक है, जिसमें वित्तीय समावेशन से लेकर डिजिटल एकीकरण और नीतिगत सुधार तक के क्षेत्र शामिल हैं। केंद्रीय बजट 2025-26 ने एक नई ऋण योजना शुरू की है, जिसके तहत पांच साल में पांच लाख महिला उद्यमियों को दो करोड़ रुपये का ऋण दिया जाएगा। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक महिलाओं को उद्यमिता के क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करना है।
इसके अलावा, जीईएम और ओएनडीसी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को एकीकृत करने से महिलाओं के स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए बाजार पहुंच में काफी सुधार हो सकता है। डिजिटल साक्षरता और डिजिटल भुगतान में प्रशिक्षण बढ़ाने से परिचालन को सुव्यवस्थित, नकदी पर निर्भरता में कमी, वित्तीय पारदर्शिता को बढ़ावा दिया जा सकता है और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। परामर्श और कौशल विकास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संरचना संबंधी कार्यक्रम महत्वपूर्ण व्यावसायिक अंतर्दृष्टि, अनुपालन ज्ञान और प्रबंधन कौशल प्रदान कर सकते हैं। महिला उद्यमिता मंच और पीएम विश्वकर्मा योजना जैसी पहल पारंपरिक शिल्प और क्षेत्रों में महिलाओं का समर्थन करने के लिए तैयार की गई हैं, जिससे स्थायी विकास हो सकता है।
नीतिगत सुधार, जैसे कि वंचित क्षेत्रों में महिला उद्यमियों के लिए एक अलग कर छूट व्यवस्था करना तथा स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म वित्त संस्थानों को मजबूत करना, वित्तीय समावेशन व आर्थिक सशक्तीकरण को और अधिक बढ़ावा दे सकता है, जिससे अधिक समावेशी आर्थिक परिदृश्य का निर्माण हो सकता है। भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यमों की पूरी क्षमता का लाभ उठाने के लिए, मौजूदा चुनौतियों का समाधान करना और सहयोगी वातावरण बनाना अनिवार्य है। इसमें महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं को अधिक संसाधन आवंटित करके प्रत्यक्ष वित्तपोषण बढ़ाना और उनका प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना शामिल है। महिला उद्यमियों पर प्रशासनिक बोझ को कम करने के लिए अनुपालन, लाइसेंस और कर दाखिल करने पर स्पष्ट मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण है। महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यम न केवल आर्थिक विकास के उपकरण हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्प्रेरक भी हैं। महिला उद्यमियों को सशक्त बनाने का यही वक्त है, क्योंकि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो अर्थव्यवस्थाएं समृद्ध होती हैं।