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अंतरराष्ट्रीय राजनीति: बांग्लादेश में चुनाव हुए भी तो क्या? वहां की स्थिति में किसी बड़े सुधार की गुंजाइश नहीं

Sat, 09 Aug 2025 06:57 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Sat, 09 Aug 2025 06:57 AM IST
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सार
पिछले एक वर्ष में यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के शासन में बांग्लादेश में जिस तरह से कट्टरपंथी ताकतें हावी हुई हैं और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें आती रही हैं, उससे नहीं लगता कि चुनाव के बाद भी वहां की स्थिति में कोई बड़ा सुधार होने वाला है।
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International Politics Even if elections held in Bangladesh no scope for major improvement in situation
UNGA में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

बांग्लादेश में अगले साल 12 फरवरी को चुनाव होने की संभावना है। हालांकि, इसकी घोषणा करते हुए अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने चेतावनी दी है 'देश के अंदर और बाहर एक खास समूह विभिन्न विध्वंसक प्रयासों से राष्ट्र की लोकतांत्रिक प्रगति को बाधित करने' में लगा हुआ है। यह चेतावनी पांच अगस्त को दी गई, जब हिंसक प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना सरकार के तख्तापलट का एक साल पूरा हुआ था। यहां 'खास समूह' से मतलब हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग से है। देश की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी अवामी लीग को चुनाव से प्रतिबंधित और बाहर कर दिया गया है। इसके नेता और कार्यकर्ता या तो जेल में हैं या फरार हैं। बांग्लादेश के रिकॉर्ड को देखते हुए यह मानने के लिए बहुत कल्पना करने की जरूरत नहीं है कि उसके लिए विदेश का मतलब भारत है, जो एक बार फिर चुनावी मुद्दा होगा, खासकर जब से निर्वासित हसीना की मेजबानी कर रहा है। हसीना हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों की हत्या और विभिन्न 'मानवाधिकार उल्लंघन' के मामले में वांछित हैं और ढाका उन्हें प्रत्यार्पित करने की मांग कर रहा है।



लेकिन चार अगस्त को बांग्लादेशी नागरिकों के नाम लिखे खुले पत्र में शेख हसीना ने तर्क दिया कि देश छोड़ने से पहले वह उनसे अलग नहीं थीं और उन्होंने 2024 की घटनाओं को 'तख्तापलट' बताया। यह उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान के खिलाफ हुए हमले की याद दिलाता है, जिनकी पचास साल पहले इसी महीने (15 अगस्त, 1975) को हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद उन्हें पहली बार भारत में (1975-81) निर्वासित रहना पड़ा था। उन्होंने लिखा, 'विपरीत दावों के बावजूद मैंने प्रधानमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों से कभी मुंह नहीं मोड़ा। मुझे आप पर विश्वास है। मुझे बांग्लादेश पर भरोसा है और मुझे यकीन है कि हमारे सबसे अच्छे दिन अभी आने बाकी हैं।'


विश्लेषकों का मानना है कि बीते बारह महीनों से अवामी लीग के सैकड़ों समर्थकों को बिना सुनवाई के हिरासत में रखा गया है। बांग्लादेश को केवल हसीना के नजरिये से न देखते हुए, अब उन लोगों को भी सजा मिलनी चाहिए, जिन्होंने अपने विरोधियों पर मुकदमा चलाया या उन्हें 2014, 2019 और 2024 में हुए तीन संसदीय चुनावों का बहिष्कार करने के लिए मजबूर किया। कुछ अपवादों को छोड़कर, बांग्लादेश में राजनीतिक गतिशीलता इसी तरह काम करती है।

यूनुस का मामला कम ही जाना-पहचाना है। उन्होंने 2007 में एक राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की थी, जब हसीना और उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, दो बार प्रधानमंत्री रहीं बेगम खालिदा जिया, दोनों ही सत्ता से बाहर थीं। दोनों में से किसी के पास उन्हें पसंद करने का कोई कारण नहीं है। 15 साल तक सत्ता में रहते हुए, हसीना ने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री और ग्रामीण बैंकिंग एवं दूरसंचार नेटवर्क प्रमुख यूनुस पर मुकदमा चलाया और उन्हें कुछ समय के लिए जेल भी भेजा।

यूनुस की चुनावी घोषणा 'जुलाई चार्टर' के साथ आई है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और 'राष्ट्रीय सुलह' के प्रयासों से जुड़े कानूनी विशेषज्ञों के बीच हफ्तों तक चली बहस के बाद तैयार यह घोषणापत्र 'न्याय, भ्रष्टाचार मुक्त बांग्लादेश' की मांग करता है और यह सुनिश्चित करता है कि 'फासीवाद वापस न आए। मीडिया रिपोर्टों में इसे 'एक व्यापक राजनीतिक घोषणापत्र' बताया गया है, जो चुनावी विमर्श को दिशा देने के लिए बनाया गया है।

इसमें उन लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई है, जो हसीना के कार्यकाल के दौरान किए गए अपराधों के आरोपी हैं। इसमें पिछले साल के विरोध प्रदर्शनों में मारे गए लोगों की पहचान करने, उनमें शामिल लोगों को सुरक्षा देने और देश के 1972 के संविधान में उनकी भूमिका को मान्यता देने की मांग की गई है, जिसे यूनुस ने सार्वजनिक रूप से 'दफनाने' का आह्वान किया था।

सत्ता में आने पर यूनुस ने जातीय नागोरिक पार्टी (राष्ट्रीय नागरिकों की पार्टी) के गठन में मदद की, जिसे आलोचक 'किंग्स पार्टी' कहते हैं। इसमें वे छात्र शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया और यूनुस के आसपास घेरा बना लिया, लेकिन असल में इसके पीछे इस्लामवादियों की राजनीतिक ताकत है, जो बहुत तेजी से उभरे हैं।

यूनुस के वादे के बावजूद चुनाव को लेकर कई महीनों से अनिश्चितता बनी हुई थी, क्योंकि उनके समर्थकों और इस्लामवादियों के बीच खींचतान चल रही थी। युनूस के समर्थक एक तरफ थे, तो इस्लामवादियों और वामपंथी व दक्षिणपंथी स्थापित पार्टियां, जिनमें बीएनपी भी शामिल थी, दूसरी तरफ थीं। पहला समूह अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए समय, तो दूसरा समूह जल्द चुनाव चाहता था। चूंकि सेना भी जल्द चुनाव चाहती थी, इसलिए अंततः यूनुस को झुकना पड़ा। इस चार्टर में इस्लामवादियों की दो अहम मांगें शामिल नहीं हैं महिलाओं के लिए मौजूदा सीटों के आरक्षण की गारंटी को खत्म करना और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर उच्च सदन की स्थापना करना, जिससे इस्लामवादियों और अन्य समूहों को संसदीय वैधता मिल सकती थी, जिनमें से ज्यादातर ने मुक्ति संग्राम का विरोध किया था।

इस्लामवादियों की मांगों के बावजूद, जो चाहते थे कि बांग्लादेश का इतिहास 1947 से खोजा जाए, जब विभाजित बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना था, जुलाई चार्टर' 1971 की स्वतंत्रता घोषणा से शुरू होकर बांग्लादेश की मुक्ति, लोकतंत्र और संप्रभुता के संघर्ष के ऐतिहासिक घटनाक्रम का पता लगाता है। इन दोनों से भारत और इस क्षेत्र को राहत मिलेगी, जो कट्टरपंथियों के पुनरुत्थान से पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।

जैसी कि संभावना थी, चुनाव की घोषणा हो चुकी है और सुधारों की घोषणा तो हुई, मगर उन्हें भविष्य पर छोड़ दिया गया है। इसी बीच राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष उभरकर सामने आ गए हैं। मुक्ति संग्राम की विरासत और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान को बरकरार रखने के लिए पांच अगस्त को एक नागरिक मंच 'मोंचो 71' लॉन्च किया गया, जिसका कहना है कि वह 'इतिहास पुनर्लेखन के प्रयासों' का विरोध करेगा। उल्लेखनीय है कि इस्लामवादी इससे अलग हो गए। इसकी पूरी संभावना है कि चुनाव से पहले और उसके बाद भी बांग्लादेश राजनीति, विचारधाराओं और 'विदेशी हस्तक्षेप' का रणक्षेत्र बना रहेगा।

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