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अंतरराष्ट्रीय मंच: संयुक्त राष्ट्र के अस्सी साल... अपना पुराना सम्मान हासिल करने के लिए जूझ रही वैश्विक संस्था

Sat, 01 Nov 2025 05:09 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Sat, 01 Nov 2025 05:09 AM IST
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सार
जो संस्था कभी ‘वैश्विक विश्वास का मंदिर’ थी, वह आज विखंडित दुनिया में अपना पुराना सम्मान हासिल करने के लिए जूझ रही है।
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International Forum 80 years of United Nations global organization struggling to regain its prestige
संयुक्त राष्ट्र महासभा 80 वां सत्र - फोटो : अमर उजाला, ग्राफिक्स

विस्तार

जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए थे, तो इसमें युद्ध को रोकने, मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और ‘व्यापक स्वतंत्रता में’ सामाजिक प्रगति सुनिश्चित करने की एक महान आकांक्षा निहित थी। उपनिवेशवाद-विरोध, वैश्वीकरण और डिजिटल परिवर्तन ने नए शक्ति केंद्रों का निर्माण किया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की संरचना 1945 जैसी ही है। इसके पांच स्थायी सदस्यों-अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस के पास वीटो का अधिकार है, जिसने संगठन को पंगु बना दिया है।



यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष, और सूडान संकट में संयुक्त राष्ट्र निर्णायक कदम नहीं उठा सका, क्योंकि महाशक्तियों ने रास्ता रोका। संस्थापक सदस्य और शांति स्थापना में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक होने के नाते, भारत ने संयुक्त राष्ट्र को नैतिक मंच के रूप में देखा। आर्थिक मजबूती और सबसे बड़ी जनसंख्या के बावजूद, भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट नहीं मिली है, जो असंगत है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बार-बार सुधारों का आह्वान करते हुए कहा है कि वैश्विक शासन को ‘समकालीन वास्तविकताओं’ को दर्शाना चाहिए।

यदि कोई नेता बहुपक्षवाद के क्षरण का प्रतीक है, तो वह डोनाल्ड ट्रंप हैं। उन्होंने वैश्विक संस्थाओं को कमजोर किया है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका ने खुद को जलवायु समझौते से अलग कर लिया था और वित्तीय सहायता देना बंद कर किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनेस्को को दिए जाने वाले सहयोग में भी कटौती की गई। अब उनकी सरकार फिर से ‘अमेरिका-विरोधी’ संस्थाओं के सहयोग में कटौती पर जोर दे रही है, जिससे संयुक्त राष्ट्र की पहले से ही कमजोर वित्तीय स्थिति और भी खराब हो रही है। इस खालीपन ने क्षेत्रीय शक्तियों को बढ़ावा दिया है।

संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वह वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन रही पांच उभरती वास्तविकताओं से तालमेल बिठा पाता है या नहीं। पहली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर गवर्नेंस, जो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अभाव में एक नई तकनीकी हथियारों की होड़ को जन्म दे सकता है। दूसरा, जलवायु प्रवास और जल संघर्ष-बढ़ते समुद्र और सिकुड़ती नदियों के कारण सदी के मध्य तक 20 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र को सीमा पार विस्थापन के प्रबंधन के लिए संप्रभुता और मानवीय कानून को पुनः परिभाषित करना होगा। तीसरा, भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण-अमेरिका के नेतृत्व वाले गुट और चीन-रूस अक्ष के बीच बढ़ते विभाजन से समानांतर संस्थाओं के निर्माण का खतरा है। चौथा, आर्थिक असमानता को दूर करते हुए और वैश्विक दक्षिण की आवाज सुनने की जरूरत, जिसके लिए सहायता और निष्पक्ष व्यापार पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पांचवां, विश्वसनीयता और जवाबदेही बहाल करना। 

हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र महासभा में, 78 प्रतिशत नेताओं ने अपने भाषणों में ‘सुधार’ पर जोर दिया। जैसे-जैसे वैश्विक संकट बढ़ रहे हैं, मानवता के सामने दो विकल्प स्पष्ट हैं, संयुक्त राष्ट्र में सुधार करें या फिर बिना नियमों वाली दुनिया का जोखिम उठाएं। भारत के लिए, आगे का रास्ता नैतिक दृढ़ विश्वास और व्यावहारिक कूटनीति के संयोजन में निहित है, ताकि वह सुधार का नेतृत्व कर सके।

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