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ब्याज दर : रिजर्व बैंक का संकेत सकारात्मक, लेकिन अभी जश्न मनाने का समय नहीं

Pinaki Chakraborty पिनाकी चक्रवर्ती
Updated Thu, 12 Jun 2025 07:27 AM IST
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सार
ब्याज दरों में समायोजन रिजर्व बैंक द्वारा की जाने वाली एक नियमित नीतिगत कवायद है। अगर मुद्रास्फीति अधिक है, तो ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं और इसका उल्टा भी सच है। फिलहाल, ब्याज दरों में कटौती पर जश्न मनाने से ज्यादा जरूरी है कि इसके बेहतर इस्तेमाल से आर्थिक प्रबंधन के उद्देश्य पूरे किए जाएं।
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Interest rate: RBI signal is positive, but it is not the time to celebrate
आरबीआई (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

विस्तार

भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति की घोषणा में ब्याज दर में 50 आधार अंकों की कटौती की है, जिससे वित्तीय बाजार को सकारात्मक संकेत मिला है। उम्मीद है कि इस नीति परिवर्तन से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और खपत बढ़ेगी। अन्य बातों के अलावा, दर में कटौती का मतलब है कि नए निवेश सहित व्यवसायों के लिए फंड की लागत कम होगी।


घर खरीदने वाले लोगों के लिए आवासीय ऋण सस्ता हो सकता है और कर्ज लेकर कार खरीदना भी कम महंगा पड़ेगा। खुदरा व्यापार और बड़े निवेशों के लिए ब्याज दरों में यह कटौती किस तरह फायदेमंद होगी, इसका पता तब चलेगा, जब बैंकों द्वारा ऋण दरों में कटौती की जाएगी।


रेपो दर में कटौती और ऋण पर इसका प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करता है। यदि हाल ही में ब्याज दरों में कटौती के कारण अच्छी गुणवत्ता वाले ऋण की मांग बढ़ती है, तो इससे निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था को मदद मिलेगी। हालांकि, मुद्दा इससे कहीं ज्यादा जटिल है। ऐसी जटिलताओं पर चर्चा करने से पहले, आइए जानते हैं कि ब्याज दरों में कटौती की वजह क्या थी।

इस मौद्रिक नीति की घोषणा ऐसे समय में की गई है, जब मुख्य मुद्रास्फीति में स्थिरता के कुछ संकेत मिल रहे हैं। जैसे-जैसे मुद्रास्फीति कम होती है, ऋण दरों में कटौती के लिए नीतिगत लचीलापन बढ़ता है। मुद्रास्फीति की स्थिरता इस दर कटौती के प्रमुख कारणों में से एक है। राजकोषीय स्थिरता भी एक प्रमुख कारक है। वित्त वर्ष 2024-25 की अंतिम तिमाही की जीडीपी वृद्धि दर में वृद्धि से भी रिजर्व बैंक को काफी राहत मिली होगी।

ऐसे समय में, जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं ने दुनिया भर में नकारात्मक भावना पैदा की है, रिजर्व बैंक का यह कदम संभवतः अल्पावधि से मध्यम अवधि में भारत में उच्च घरेलू निवेश के लिए भावनाओं में सुधार लाने के उद्देश्य से भी उठाया गया है। आगे स्थिर मुद्रास्फीति, ऋण विकास में वृद्धि और राजकोषीय घाटे की स्थिरता को एक स्थायी स्तर पर सुनिश्चित करने के लिए व्यापक आर्थिक प्रबंधन की आवश्यकता है। इस परिवर्तन के वांछित परिणाम पाने में राजकोषीय मौद्रिक समन्वय एक महत्वपूर्ण कारक होगा।

ब्याज दरों में कटौती के इस फैसले को रिजर्व बैंक द्वारा सरकार को रिजर्व (अधिशेष) राशि हस्तांतरित करने के साथ भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। रिजर्व बैंक अधिशेष वह राशि है, जो प्रत्येक वर्ष केंद्रीय बैंक द्वारा सरकार को हस्तांतरित की जाती है। यह राशि केंद्रीय बैंक द्वारा अपने सभी खर्चों को पूरा करने के बाद बची हुई राशि होती है। वर्ष 2024-25 के लिए हस्तांतरणीय अधिशेष राशि को केंद्रीय बोर्ड द्वारा अनुमोदित संशोधित आर्थिक पूंजीगत फ्रेमवर्क (ईसीएफ) के आधार पर तय किया गया है। रिजर्व बैंक की आय के प्रमुख स्रोत हैं-सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज की वसूली से आय, तरलता प्रबंधन साधनों (जैसे- लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी) से निवल ब्याज आय, ऋण, विदेशी मुद्रा निवेश पर अर्जित ब्याज आदि।

रिजर्व बैंक ने हाल ही में अपने अधिशेष का एक हिस्सा सरकार को सौंपा है। यह एक नियमित प्रक्रिया है और इसमें कुछ भी असाधारण नहीं है। हालांकि, रिजर्व बैंक द्वारा अधिशेष राशि का हस्तांतरण उम्मीद से काफी कम था। पहले यह माना जा रहा था कि रिजर्व बैंक सरकार को तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक धनराशि हस्तांतरित करेगा। लेकिन वास्तविक हस्तांतरण बहुत कम था। रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को 2.68 लाख करोड़ रुपये की राशि हस्तांतरित की। यह इस बात का संकेत है कि रिजर्व बैंक अपने खातों में पर्याप्त अधिशेष रखना चाहता है और अपनी बैलेंस शीट को मजबूत करना चाहता है।

अधिशेष राशि के कम हस्तांतरण का यह भी अर्थ है कि केंद्रीय बैंक सरकार को सरकारी व्यय के लिए अधिक धन नहीं देना चाहता है। अधिशेष के कम हस्तांतरण से सरकार पर स्वतः ही ज्यादा बजटीय बाध्यता आ जाती है। यह सरकार के लिए राजकोषीय विवेक की निरंतरता बनाए रखने की आवश्यकता का भी संकेत है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के माहौल में ब्याज दरों में कमी से विकास को बढ़ावा मिल सकता है? दुर्भाग्य से, वास्तविक दुनिया की स्थिति अधिक जटिल है और फंड की लागत केवल एक कारक है, जो निवेश के स्तर को निर्धारित करता है। यह सर्वविदित है कि कई प्रयासों के बावजूद, भारत में निवेश की दर वर्षों से सुस्त रही है।

यह भी स्पष्ट है कि कॉरपोरेट बैलेंस शीट पर दबाव है और रियल एस्टेट एवं ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र कम मांग सहित कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। परिसंपत्ति की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। उच्च परिसंपत्ति मूल्य निवेश निर्णयों के बारे में अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं और निवेश करने के निर्णय को रोक रहे हैं। इन कारकों को देखते हुए, ब्याज दरों में कटौती भले ही महत्वपूर्ण है, लेकिन यह ऋण में स्वतः वृद्धि सुनिश्चित नहीं कर सकती है।
इसके अलावा, यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि ब्याज दरों में कटौती का असर वाणिज्यिक बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है। चूंकि एनबीएफसी बैंकों से उधार लेकर और इक्विटी के जरिये अपने परिचालन को वित्तपोषित करते हैं, इसलिए ब्याज दरों में कटौती से उनके परिचालन की लागत भी कम होनी चाहिए। हालांकि, बैंक और एनबीएफसी ऋण दरों के बीच ब्याज दर के अंतर को देखते हुए, यह देखना होगा कि खुदरा ऋण की औसत लागत पर क्या प्रभाव पड़ता है।

अब नीतिगत बदलावों के बारे में कुछ बातें करते हैं। व्यापक आर्थिक प्रबंधन के लिए ब्याज दरों में समायोजन रिजर्व बैंक द्वारा की जाने वाली एक नियमित नीतिगत कवायद है। अगर मुद्रास्फीति अधिक है, तो ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं और इसका उल्टा भी सच है। निष्पक्ष रूप से कहें, तो ब्याज दरों में कटौती पर जश्न मनाने के बजाय बेहतर तरीके से इससे आर्थिक प्रबंधन का उद्देश्य पूरा करना होगा। किसी भी तरह के और सभी प्रकार के बदलाव को असाधारण नहीं माना जाना चाहिए।
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