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विचार: बुनियादी ढांचा राष्ट्र द्वारा लोगों से किए गए वादों की रीढ़, जब एक पुल टूटता है तब टूटता है भरोसा

Wed, 16 Jul 2025 07:35 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 16 Jul 2025 07:35 AM IST
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सार
जब एक पुल टूटता है, जैसा कि गुजरात, महाराष्ट्र, कोलकाता और अनगिनत जगहों पर हुआ, तो यह लोगों के भरोसे को भी तोड़ता हैै। पुल ढहने या कोई सड़क धंसने के चक्र को तोड़ने के लिए भारत को बुनियादी ढांचे की उपेक्षा के प्रति शून्य-सहिष्णुता का दृष्टिकोण अपनाना होगा।
 
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Infrastructure is the backbone of the nation's promises to the people, when a bridge breaks, trust breaks
वडोदरा में पुल हादसा - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

गुजरात में वडोदरा के नजदीक नौ जुलाई को गंभीरा पुल का टूटना, जिसमें करीब 20 लोगों की मौत हो गई, भारत के आधारभूत ढांचे की उपेक्षा की दुखद गाथा का एक ताजा अध्याय है, जिसमें प्रशासनिक उदासीनता उजागर हुई, जो सुरक्षा की अपेक्षा दिखावे को प्राथमिकता देती है। ऐसे में, शोक-संवेदना व्यक्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह तीखे सवाल पूछने का वक्त है। यह दुर्घटना एक विनाशकारी पूर्वानुमान के साथ सामने आई है, जो विफलताओं की भयावह सूची में शामिल हो गई है। 2022 में गुजरात में मोरबी पुल का गिरना, 2016 में महाराष्ट्र का महाड पुल हादसा और 2016 में कोलकाता में विवेकानंद फ्लाईओवर का ढहना-ये सभी हादसे नौकरशाही की निष्क्रियता और आम लोगों के प्रति राजनीतिक उदासीनता की कड़वी यादें दिलाते हैं।



चार दशक पुराने गंभीरा पुल पर हादसे का इंतजार किया जा रहा था। स्थानीय निवासी लंबे समय से चेता रहे थे कि वाहनों के गुजरने पर गंभीरा पुल हिलता है और मोरबी हादसे के बाद भी ऐसी चेतावनी दी गई थी। मोरबी की तरह गंभीरा पुल की जर्जरता किसी से छिपी नहीं थी। स्थानीय भाजपा विधायक चैतन्य सिंह झाला की अनुशंसा पर गुजरात सरकार ने नया पुल बनाने की स्वीकृत दी। सर्वेक्षण किए गए, डिजाइन तैयार हुए, फिर भी जीर्ण-शीर्ण संरचना को खुला रखा गया और सतही मरम्मत की गई। जर्जर पुल पर यातायात की अनुमति देने का निर्णय लापरवाही को ही दर्शाता है।


हालिया घटना गंभीर सवाल खड़े करती है : गंभीरा पुल को बंद क्यों नहीं किया गया था? यही सवाल मोरबी हादसे के बाद पूछा गया था, जहां निजी ठेकेदार द्वारा किए गए घटिया रखरखाव पर कोई बंदिश नहीं थी। महाड पुल हादसे के बाद भी ऐसे ही सवाल उठे थे। इनके जवाब प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक सुविधावाद के घातक संयोजन में निहित हैं। पुल बंद करने पर व्यापार प्रभावित होता और जनता नाराज हो सकती थी-ये ऐसे विचार हैं, जो अल्पकालिक दृष्टिकोण से संचालित प्रणाली में सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

वर्ष 2023 में मुंबई के वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे की सड़क धंसने से उसमें एक बस समा गई और यात्रियों को चोटें आई थीं, जबकि 2024 में ऐसा ही हादसा दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में हुआ, जिससे कई दिनों तक यातायात बाधित रहा था। पुल ढहने जैसी ये घटनाएं रखरखाव की लापरवाही और चेतावनियों की अनदेखी को उजागर करती हैं।

भारत में बुनियादी ढांचे का संकट प्रणालीगत है। वर्ष 2017 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा कराए गए सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, देश भर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित 6,500 से ज्यादा पुल ‘क्षतिग्रस्त’ अवस्था में थे, इनमें सौ साल से भी अधिक पुराने 20 पुलों को तत्काल बंद किया गया। पिछले साल मंत्रालय की ओर से लोकसभा में बताया गया कि ‘पुलों सहित राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए दृश्य और उपकरण-आधारित आवधिक निरीक्षण, मूल्यांकन और निगरानी अनिवार्य कर दी गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न घटकों की संरचनात्मक अखंडता समय पर मरम्मत/पुनर्वास हस्तक्षेप के माध्यम से बनाए रखी जाए।’

मोरबी के झूला पुल या कोलकाता के विवेकानंद फ्लाईओवर की तरह गंभीरा पुल के बारे में भी पहले से संकट की जानकारी थी। गंभीरा पुल में होने वाला कंपन उतनी ही बड़ी चेतावनी थी, जितनी कि मुंबई की सड़कों के धंसने से पहले आईं दरारें। इसका मुख्य कारण कम लागत है। भारत का तेजी से होता शहरीकरण आधुनिक बुनियादी ढांचे की मांग करता है, लेकिन हल्के भार के लिए बने गंभीरा जैसे पुलों का पर्याप्त पुनर्निर्माण शायद ही कभी किया जाता है। मुंबई की सड़कें अक्सर पुरानी जल निकासी प्रणालियों के कारण धंस जाती हैं, जो उपेक्षा को दर्शाती हैं। घटिया निर्माण, बेतरतीब रखरखाव और भ्रष्टाचार इन त्रासदियों में योगदान देते हैं।

मोरबी के बाद की जांच में लापरवाहीपूर्ण निगरानी को दोषी ठहराया गया, फिर भी कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ। गंभीरा हादसे की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है, लेकिन आशंका है कि पहले की तरह इसकी रिपोर्ट भी दबा दी जाएगी और जिम्मेदार अधिकारी बच निकलेंगे। राज्य सरकार ने हादसे के तत्काल बाद मुआवजे का एलान कर दिया, ताकि लोगों का ध्यान प्रणालीगत सुधारों से भटक जाए और मौद्रिक मरहम-पट्टी पर चला जाए।

राहत की अपेक्षा दिखावे को प्राथमिकता देने की संस्कृति सर्वव्यापी है। मोरबी पुल की तरह गंभीरा पुल को खुला रखने से असुविधा से तो बचा गया, लेकिन इससे जीवन खतरे में पड़ गया। यह सिर्फ उपेक्षा भर नहीं है, बल्कि नैतिक पतन भी है, जो मुंबई और दिल्ली में सड़क धंसने की घटनाओं में दोहराई गई, जहां स्थानीय लोगों की चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया गया।

इस चक्र को तोड़ने के लिए भारत को बुनियादी ढांचे की उपेक्षा के प्रति शून्य-सहिष्णुता दृष्टिकोण अपनाना होगा। सक्रिय रखरखाव-नियमित निरीक्षण, पारदर्शी रिपोर्टिंग और असुरक्षित ढांचों को तत्काल बंद करने पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। रियल टाइम ब्रिज सेंसर जैसी तकनीकें, जिनका वैश्विक स्तर पर उपयोग हो रहा है, पुलों के ढहने से पहले के जोखिम के प्रति सचेत कर सकती हैं। इसके साथ ही सड़कों को धंसने से बचाने के लिए उनका नियमित ऑडिट होना चाहिए। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन दबाव की जरूरत है। नागरिकों को जवाबदेही की मांग करनी चाहिए।

मोरबी की भयावहता या मुंबई की डूबती सड़कों की तरह गंभीरा का ढहना, ऐसी दुर्घटना है, जिसे रोका जा सकता था। यह हादसा संवेदना और नकदी से कहीं अधिक और हिसाब-किताब की मांग करता है। बुनियादी ढांचा किसी राष्ट्र द्वारा अपने लोगों से किए गए वादों की रीढ़ है। जब यह टूटता है, जैसा कि गुजरात, महाराष्ट्र, कोलकाता और अनगिनत जगहों पर हुआ, तो यह लोगों के भरोसे को भी तोड़ता है। भारत जब तक इस उदासीनता से निजात नहीं पाता, तब तक ऐसे संकट आते रहेंगे और इसके पीड़ितों को उपेक्षा की कीमत चुकानी पड़ेगी। अगर हम विकसित भारत बनना चाहते हैं, तो इसमें बदलाव लाना होगा।

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