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बिना चुनाव लड़े प्रधानमंत्री!
पूरन सरमा
Updated Sun, 03 Nov 2013 03:19 PM IST
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हम सब मानते हैं कि हमारे देश में लोकतंत्र है तथा प्रधानमंत्री का चुनाव जनप्रतिनिधि करते हैं। परंतु वह बिना चुनाव लड़े और जनप्रतिनिधियों के समर्थन के ही प्रधानमंत्री बन गए हैं।
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उनकी पार्टी ने भी उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया है। देश असमंजस में है। लेकिन देश के असमंजस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
वह प्रधानमंत्री की तरह व्यवहार करने लगे हैं। उनकी चाल-ढाल में राजसी तेज दिखने लगा है। उनके मुख से फरमान जारी करने जैसी आवाजें आने लगी हैं।
कुछ दिनों पहले तक उनकी नजर में आदमी और पिल्ले में कोई फर्क नहीं था। बल्कि लगता था कि वह पिल्ले के दर्द से कहीं ज्यादा दुखी और परेशान हैं। पहले उनका चेहरा सौम्य था। लेकिन पता नहीं, कौन-सी ताकत ने उनके जबड़े को और अधिक मजबूती प्रदान कर दी है। उनके व्यवहार में इन दिनों जो बदलाव आया है, उससे तमाम पार्टियां हैरान हैं।
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मौजूदा प्रधानमंत्री भी उनके हावभाव से हतप्रभ हैं। वह मौजूदा प्रधानमंत्री को तो कुछ समझते ही नहीं। उनको लगता है कि उनके भाषण से मोहित होकर लोग उनको प्रधानमंत्री चुन लेंगे और सत्ता संभालते ही वह देश की कायापलट कर देंगे।
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जो आदमी अपने राज्य को बदल सकता है, उसे देश को बदलने में भला कितनी देर लगेगी। न जाने कब से वह खुद को विकास पुरुष बताते आ रहे हैं।
अपनी इस पहचान के साथ वह अपनी ही पार्टी के लौह पुरुष को कब का पीछे छोड़ चुके हैं। वह जिस स्टेट को बिलांग करते हैं, वह देश का आदर्श स्टेट माना जाने लगा है। उन्होंने चुनाव में हैट्रिक लगाई है। ऐसे में वह पार्टी के अटल स्तंभ बनते जा रहे हैं।
पार्टी अध्यक्ष के पास अपनी पार्टी को चुनाव जिताने के लिए केवल उनका ही डरावना चेहरा ही मुनासिब लगता है। उनको लगता है कि उनके सत्ता संभालते ही सारी चीजें व्यवस्थित होती चली जाएंगी। मानो अब कोई समस्या नहीं। बस बटन दबाया और समस्या खत्म। यह बहुत बड़ी बात है।
हालांकि मैं तो उन्हें साधारण इंसान ही मानता हूं। बल्कि उनकी पार्टी के कुछ लोग भी मौका मिलने पर उन्हें टंगड़ी मारने में पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन जिसे पूरा देश इतना बड़ा नेता मान चुका है, उसके पीछे हटने का सवाल ही कहां उठता है।
वह प्रधानमंत्री न होकर भी प्रधानमंत्री हैं। पहले मैं भी उन्हें साधारण इंसान समझता था, लेकिन अब समझ चुका हूं कि वह असाधारण हैं।