जानना जरूरी है: वैरभाव के कारण रुक्मी ने गंवाए प्राण... भगवान कृष्ण से जुड़ी है यह प्रेरक कथा
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विस्तार
विदर्भ नरेश भीष्मक के पुत्र का नाम रुक्मी और पुत्री का नाम रुक्मिणी था। श्रीराम के साथ सीता रूप में प्रकट होने वाली भगवती लक्ष्मी ने ही श्रीकृष्ण के साथ रुक्मिणी के रूप में अवतार लिया था। रुक्मी, अपनी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ करना चाहता था; किंतु रुक्मिणी, श्रीकृष्ण को पसंद करती थीं। उन्हें पति रूप में पाने के लिए रुक्मिणी ने देवताओं की उपासना भी की। इस बीच भीष्मक ने पुत्र रुक्मी के कहने पर शिशुपाल से रुक्मिणी का विवाह निश्चित कर दिया।
रुक्मिणी ने जब यह सुना, तो उन्होंने अपने पुरोहित के पुत्र को अपना संदेश देकर द्वारकापुरी में श्रीकृष्ण और बलराम के पास भेजा। ब्राह्मण ने एकांत में बैठकर दोनों भाइयों को रुक्मिणी का संदेश सुना दिया, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित रथ पर सवार होकर विदर्भ पहुंच गए। शिशुपाल और रुक्मिणी के विवाह में सम्मिलित होने के लिए जरासंध समेत अनेक राजा विदर्भ पहुंचे थे। विवाह के दिन रुक्मिणी, सोने के आभूषणों से विभूषित हो देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए सखियों के साथ नगर से बाहर स्थित मंदिर के लिए निकलीं। संध्या का समय था। श्रीकृष्ण भी देवी मंदिर पहुंच गए। देखते ही श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को सहसा उठाकर अपने रथ पर बिठा लिया और तेजी से द्वारका की ओर चल पड़े।
- यह जानकर जरासंध आदि राजा क्रोध में भरे राजकुमार रुक्मी को साथ लेकर श्रीकृष्ण से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। उन्होंने चतुरंगिणी सेना के साथ श्रीहरि का पीछा किया।
उन्हें आता हुआ देखकर बलराम अपने रथ से कूद पड़े। उन्होंने हल और मूसल लेकर युद्ध में शत्रुओं का संहार आरंभ कर दिया। कितने ही रथों, घोड़ों, गजराजों तथा पैदल सैनिकों को हल और मूसल की मार से कुचल डाला। इस प्रकार बलराम ने क्षण-भर में हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सहित सारी सेना का सफाया कर दिया। राजाओं के पांव उखड़ गए। वे सब भयभीत होकर भागने लगे। उधर, रुक्मी क्रोध में श्रीकृष्ण के साथ युद्ध कर रहा था। उसने श्रीकृष्ण पर बाण-वर्षा आरंभ कर दी। तब गोविंद ने हंसकर लीलापूर्वक अपना शार्ङ्गधनुष हाथ में उठाया और एक ही बाण से रुक्मी के अश्व, सारथी, रथ और ध्वजा पताका को काट गिराया। रथ नष्ट हो जाने पर रुक्मी तलवार खींचकर खड़ा हो गया। श्रीकृष्ण ने बाण से उसकी तलवार को भी काट डाला। फिर उसने श्रीकृष्ण की छाती पर मुक्के से प्रहार किया। परंतु कृष्ण ने सहजता से रुक्मी को पराजित कर दिया।
फिर उन्होंने बलपूर्वक रुक्मी को अपने रथ में बांध दिया और उसका आधा सिर मूड़ कर उसे बंधन-मुक्त कर दिया। इस अपमान के घाव से रुक्मी को बड़ा क्रोध आया, किंतु वह असहाय था। लज्जा के कारण रुक्मी ने विदर्भ में पांव नहीं रखा और गांव बसाकर वहीं रहने लगा। इसके बाद श्रीकृष्ण और बलराम, रुक्मिणी को साथ लेकर द्वारका चले गए। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने शुभ लग्न में राजकुमारी रुक्मिणी के साथ विधिपूर्वक विवाह किया। विवाह के समय देवताओं ने फूलों की वर्षा की। वसुदेव, उग्रसेन, अक्रूर आदि सबने बड़े उत्साह के साथ कृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में भाग लिया।
श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के अनेक पुत्र हुए, जिनमें एक प्रद्युम्न थे। उधर, रुक्मिणी के भाई रुक्मी की एक पुत्री हुई। उसका नाम रुक्मवती था। कृष्ण और रुक्मी के झगड़े को समाप्त करने के लिए प्रद्युम्न का विवाह रुक्मवती से करना तय किया गया। फिर प्रद्युम्न और रुक्मवती का एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अनिरुद्ध था। अनिरुद्ध के विवाह में बलराम, श्रीकृष्ण और अन्य यादव भी पधारे थे। विवाह समारोह के बाद रुक्मी ने बलराम को द्यूत खेलने के लिए आमंत्रित किया। खेल में बलराम जीत गए। रुक्मी के मन से यादवों के प्रति वैर-भाव समाप्त नहीं हुआ था। उसने बलराम का अपमान करते हुए कहा कि बलराम जीत तो गए, पर वे केवल गाय चराने में कुशल हैं; उन्हें पासे खेलना नहीं आता। इस पर बलराम को इतना क्रोध आया कि उन्होंने गदा के प्रहार से रुक्मी का वध कर दिया। इस दुर्घटना के बाद अनिरुद्ध और उसकी पत्नी को साथ लेकर सब यादव द्वारका वापस चले गए। इस तरह रुक्मी ने वैर पालने का मूल्य अपने प्राण गंवाकर चुकाया।