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जानना जरूरी है: इंद्र को कैसे मिली ब्रह्महत्या से मुक्ति... महर्षि अगस्त्य के अपमान से जुड़ी है पौराणिक कथा

Sun, 13 Jul 2025 07:42 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 13 Jul 2025 07:42 AM IST
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सार
राजा नहुष काम व अहंकार से ग्रसित हो गए। उन्होंने शची को पाने के लिए महर्षि अगस् त्य का अपमान कर दिया। वह राज्य से बेदखल हो गए। इसके बाद देवताओं ने ब्रह्महत्या के चार भाग कर इंद्र को मुक्त कराया।
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Indian mythology How Indra got rid from sin of killing brahman tale related to insult of Maharishi Agastya
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

स्वर्गलोक का अधिपति बन जाने के उपरांत राजा नहुष काम और अहंकार से ग्रस्त हो गए। एक दिन उनके मन में पूर्व इंद्र की पत्नी शची को पाने का कलुषित विचार उत्पन्न हो गया। नहुष ने देवगुरु बृहस्पति को इंद्राणी को अपने राजमहल में आमंत्रित करने का आदेश दिया। बृहस्पति ने शची को नहुष का आदेश सुनाया, तो शची ने कहा, ‘मैं पराई स्त्री हूं, इसलिए वह मुझे प्राप्त करने का अधिकारी ही नहीं है। यदि वह मुझे पाना ही चाहता है, तो उस अज्ञानी से कहिए कि जो वाहन बनाने योग्य न हो, ऐसे वाहन पर बैठकर यहां आएगा, तभी मुझे प्राप्त कर सकता है।’



नहुष काम से मोहित थे। उन्होंने शची की शर्त स्वीकार कर ली। फिर कुछ विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि वह जिस पालकी में बैठकर शची के पास जाएंगे, उसे सप्तर्षि उठाएंगे! फिर नहुष ने सप्तर्षियों को पालकी उठाने के काम पर लगा दिया। उन ऋषियों में महर्षि अगस्त्य भी शामिल थे। अगस्त्य अन्य ऋषियों से तनिक धीमी गति से चल रहे थे, तो नहुष ने पालकी में से अगस्त्य को लात मारी और बोले, ‘सर्प की तरह शीघ्र चलो।’ अगस्त्य का भारी अपमान हुआ। उन्होंने नहुष को सर्प बनकर धरती पर गिरने का शाप दे डाला। इस तरह, सत्कार्यों के प्रताप से इंद्र-पद को प्राप्त करने वाले राजा नहुष, काम और अहंकार के चलते स्वर्ग से गिरकर तिर्यग्योनि में चले गए। नहुष के पतन के बाद देवलोक में फिर अराजकता छा गई।


शची ने कहा, ‘हम सबको वहीं जाना चाहिए, जहां हमारे स्वामी रहते हैं।’ इंद्राणी की बात सुनकर बृहस्पति, देवताओं के साथ इंद्र के पास पहुंचे, जो ब्रह्महत्या का प्रायश्चित करने के लिए जलाशय में निवास कर रहे थे।

वहां पहुंचकर देवताओं ने इंद्र को पुकारा। इंद्र बोले, ‘मैं ब्रह्महत्या के पाप से पीड़ित हूं। तपस्या करते हुए जल में निवास करता हूं।’ देवताओं ने इंद्र से अमरावती वापस चलने का आग्रह किया। तभी ब्रह्महत्या बोल उठी, ‘मैं देवराज इंद्र को अमरावती जाने से रोकती हूं।’ यह सुनकर बृहस्पति ने कहा, ‘ब्रह्महत्ये! हम तुम्हारे निवास के लिए दूसरे स्थान नियत करेंगे।’ देवताओं ने सबसे पहले पृथ्वी से कहा, ‘देवताओं की कार्य-सिद्धि के लिए इंद्र की ब्रह्महत्या का एक अंश तुम्हें ग्रहण करना चाहिए।’ देवताओं की बात सुनकर पृथ्वी भय से कांप उठी। यह देखकर बृहस्पति ने कहा, ‘तुम भय मत करो। तुम सर्वथा निष्पाप हो। जिस समय भगवान वासुदेव अवतार लेंगे, उस समय उनके चरणों के स्पर्श से यह ब्रह्महत्या का आंशिक पाप निवृत्त हो जाएगा और तुम पूर्णतः निष्पाप होकर रहोगी।’ इसके बाद देवताओं ने वृक्षों से कहा, ‘आप लोग ब्रह्महत्या का एक अंश ग्रहण करें। इंद्र के प्रसाद से तुम काटे जाने पर भी अनेक अंशों में विभक्त हो शाखा और डालियों से संपन्न हो जाओगे और सदा शुद्ध बने रहोगे।’

फिर बृहस्पति ने जल से कहा, ‘तुम भी ब्रह्महत्या का एक अंश स्वीकार करो।’ यह सुनकर जल ने कहा, ‘जो कोई भी पाप या दुष्कर्म हैं, वे हमारे संपर्क और संबंध से दूर होते हैं। हमारे द्वारा स्नान, शौच एवं हमारा पान आदि करने से संपूर्ण पापाक्रांत प्राणी पवित्र हो जाते हैं।’ बृहस्पति ने देखा कि ब्रह्महत्या का अंश स्वीकार करने में जल को संकोच हो रहा था। तब बृहस्पति ने जल से कहा, ‘मैं वरदान देता हूं कि संपूर्ण प्राणियों को जल ही पवित्र करेगा।’ इसके बाद बृहस्पति ने स्त्रियों से कहा, ‘तुम ब्रह्महत्या का शेष अंश ग्रहण करो।’ यह सुनकर स्त्रियां बोलीं, ‘भगवन! संपूर्ण स्त्रियां धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिए उत्पन्न हुई हैं। यदि नारी पापाचार करे, तो उस पाप से अनेक पक्ष (पिता, नाना तथा पति के कुल) लिप्त होते हैं, ऐसी वेदों की आज्ञा है।’

स्त्रियों के मन की शंका सुनकर बृहस्पति ने स्त्रियों को आश्वासन देते हुए कहा, ‘तुम्हारे द्वारा स्वीकृत ब्रह्महत्या का यह अंश भावी पीढ़ियों के लिए तथा दूसरों के लिए भी शुभ फल देने वाला होगा। तुम सबको इच्छानुसार काम-सुख प्राप्त होगा।’ इस प्रकार देवताओं ने ब्रह्महत्या के चार भाग कर दिए। इससे इंद्र का पाप नष्ट हो गया। फिर देवताओं और ऋषियों ने देवपुरी में शची सहित इंद्र का पुनः अभिषेक किया। देवराज इंद्र, संपूर्ण देवताओं, महानुभावों, मुनीश्वरों तथा सिद्धगणों के साथ पुनः लोकपाल-पद पर प्रतिष्ठित हो गए।

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