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जानना जरूरी है: पतिव्रता से पराजित हुए इंद्र और कामदेव, सुकला के अटूट सतीत्व की रक्षा कैसे हुई?

Sun, 25 Oct 2026 05:50 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 25 Oct 2026 05:50 AM IST
सार

कामदेव ने सुकला को परास्त करने की ठानी थी, परंतु सुकला के मनोनिग्रह और सतीत्व के तेज के आगे स्वयं कामदेव और देवराज इंद्र नतमस्तक हो गए।

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Indian Mythology How Indra and Kamadeva defeated by devoted wife Sukala unwavering chastity protected
पतिव्रता से पराजित हुए इंद्र और कामदेव - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स

विस्तार

कृकल नामक वैश्य की पत्नी पतिव्रता थी। उसका नाम सुकला था। उसके अटूट सतीत्व की ख्याति देवराज इंद्र तक पहुंची, तो एक दिन इंद्र ने निश्चय किया कि वह सुकला को धर्म के मार्ग से विचलित करेंगे। उन्होंने कामदेव को बुलाकर कहा कि वह पतिव्रता सुकला को अपने प्रभाव में लाने में उनकी सहायता करे। कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ उपस्थित हुए और गर्व से बोले, ‘देवराज! मैंने अनेक देवताओं, ऋषियों और तपस्वियों को अपने बाणों से विचलित किया है। फिर एक साधारण स्त्री को वश में करना कौन-सी कठिन बात है? मैं सुकला के सतीत्व को नष्ट कर दूंगा।’

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इंद्र ने एक सुंदर और गुणवान पुरुष का रूप धारण किया और एक दूती को सुकला के पास भेजा। उस दूती ने पहले तो सुकला के सौंदर्य की प्रशंसा की, फिर उसके पति के विरुद्ध बातें करते हुए कहा कि कृकल उसे अकेला छोड़कर स्वयं तीर्थयात्रा पर गए हैं। उसने सुकला से कहा कि पति ही पत्नी की चिंता नहीं करेगा, तो उसके लिए जीवनभर प्रतीक्षा क्यों करनी? वह बोली कि युवावस्था क्षणभंगुर है और मनुष्य को समय रहते समस्त सुखों का आनंद लेना चाहिए। उसने इंद्र के रूप में उपस्थित उस पुरुष को सर्वगुणसंपन्न बताते हुए सुकला को उसे स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया।
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यह सुनकर सुकला बोली, ‘यह शरीर मल-मूत्र से भरा हुआ, नश्वर और क्षणभंगुर है। इसकी सुंदरता पर गर्व करना व्यर्थ है, क्योंकि समय के साथ यह रूप नष्ट हो जाता है। संसार में किसी का शरीर दूसरे से श्रेष्ठ नहीं है। आत्मा तो दिव्य, शुद्ध और रूपरहित है, जो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। फिर, केवल शरीर के आकर्षण के कारण मैं अपने धर्म से कैसे विमुख हो सकती हूं? इंद्रिय-सुख क्षणिक हैं और उसके समाप्त होते ही मनुष्य फिर उसी असंतोष में लौट आता है। इसलिए, मैं किसी अन्य पुरुष को स्वीकार नहीं कर सकती।’

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  • सुकला का तर्क सुनकर दूती लौट आई और उसने इंद्र को सुकला का उत्तर सुनाया। उसके ज्ञान और दृढ़ता से प्रभावित होकर इंद्र ने भी माना कि ऐसी पवित्र स्त्री को विचलित करना सरल नहीं होगा।
  • परंतु, कामदेव को अपने सामर्थ्य पर अभिमान था। वह इंद्र, रति और अपनी सहचरी क्रीड़ा के साथ सुकला को परास्त करने के लिए चल पड़ा।

उधर सत्य ने धर्म से कहा कि कामदेव का यह प्रयास उन सभी सद्गुणों को नष्ट करने का प्रयत्न है, जिनके कारण संसार में धर्म और पुण्य की स्थापना होती है। धर्म ने आश्वासन दिया कि वह सुकला की रक्षा के लिए उचित उपाय करेगा। धर्म की प्रेरणा से प्रज्ञा, पक्षी का रूप धारण कर सुकला के घर पहुंची और उसे यह शुभ समाचार सुनाया कि उसका पति सात दिनों के भीतर घर लौट आएगा। यह सुनकर सुकला बहुत प्रसन्न हुई। इसी बीच क्रीड़ा ने एक दुखी स्त्री का रूप धारण कर उससे मित्रता कर ली और उसे पुण्य-संचय के बहाने एक सुंदर वन में ले गई। वहां कामदेव इंद्र के शरीर में प्रवेश करके अपने पांच पुष्पबाण चलाने के लिए तैयार बैठा था। रति और प्रीति ने भी सुकला को मोहित करने का प्रयास किया, पर सुकला ने कहा, ‘जहां मेरे पति हैं, वहीं मेरा मन है। मेरा वास्तविक अस्तित्व अपने पति के प्रति समर्पण में है।’



अंततः इंद्र स्वयं दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित होकर सुकला के सामने आ गए। उन्होंने सुकला से उनकी प्रार्थना स्वीकार करने को कहा, लेकिन सुकला बोली, ‘मेरी रक्षा सत्य, धर्म, पुण्य और ज्ञान करते हैं। इंद्रिय-संयम और मनोनिग्रह मेरे कवच हैं। स्वयं इंद्र और कामदेव भी मुझे मेरे धर्म से विचलित नहीं कर सकते।’

सुकला ने उन्हें चेतावनी भी दी कि यदि उसके निषेध के बाद भी वे सामने खड़े रहे, तो उसके सतीत्व के तेज से भस्म हो जाएंगे। आखिर सुकला के शाप के भय से इंद्र, कामदेव तथा उनके साथी वहां से चले गए।

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