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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   If we drive to end of universe Our concepts of time distance and existence pale in comparison to vast space

अगर कार से ब्रह्मांड के छोर तक चलें: समय, दूरी और अस्तित्व की हमारी धारणाएं अंतरिक्ष की विशालता के सामने छोटी

Sun, 25 Oct 2026 05:40 AM IST
ज्योति भास्कर रैंडल मुनरो, कार्टूनिस्ट व लेखक, द न्यूयॉर्क टाइम्स
रैंडल मुनरो, कार्टूनिस्ट व लेखक, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 25 Oct 2026 05:40 AM IST
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सार
ब्रह्मांड के छोर तक पहुंचने में कितना समय लगेगा, यह ऐसा सवाल है, जो अंतरिक्ष विज्ञानियों की जिज्ञासा को लंबे समय से चुनौती देता रहा है। कल्पना कीजिए कि आप अपनी कार से ब्रह्मांड के अंतिम बिंदु तक पहुंचने की यात्रा पर निकलते हैं और कार एक लीटर पेट्रोल में करीब 20 किलोमीटर चलती है। इस हिसाब से ब्रह्मांड के छोर तक पहुंचने के लिए आपको इतने पेट्रोल की जरूरत पड़ेगी कि उसकी कुल मात्रा पृथ्वी के सभी महासागरों में मौजूद पानी की मात्रा से भी 16 हजार गुना अधिक होगी।
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If we drive to end of universe Our concepts of time distance and existence pale in comparison to vast space
अगर कार से ब्रह्मांड के छोर तक चलें - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

विशाल ब्रह्मांड की सीमाओं के पार क्या है, ऐसे सवाल सदियों से मनुष्य की जिज्ञासा को चुनौती देते रहे हैं। पृथ्वी से बाहर चंद्रमा तक पहुंचने और मंगल पर जीवन की संभावनाएं तलाशने की कोशिशों के बीच यदि कोई यह पूछे कि ब्रह्मांड के छोर तक कार से पहुंचने में कितना समय लगेगा, तो पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि यह कोई व्यावहारिक सवाल नहीं है। लेकिन, इस सवाल का जवाब ब्रह्मांड की विशालता, समय की अनंतता और मानव जीवन की सीमाओं को समझने का एक दिलचस्प जरिया बन सकता है।



जरा कल्पना कीजिए कि आपने एक कार में सफर शुरू किया है और आपका गंतव्य है दृश्य ब्रह्मांड का सबसे दूर का छोर। रास्ते में न कोई ट्रैफिक जाम है, न सड़क खराब होने की चिंता और न ही गति सीमा तोड़ने का डर। इसके बावजूद, मंजिल इतनी दूर है कि वहां तक पहुंचने में लगने वाला समय ब्रह्मांड की मौजूदा उम्र से करोड़ों गुना ज्यादा हो सकता है। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, दृश्य ब्रह्मांड का छोर पृथ्वी से लगभग 46 अरब प्रकाश वर्ष दूर है। प्रकाश एक वर्ष में करीब 5.88 लाख करोड़ मील की दूरी तय करता है। इस हिसाब से यह दूरी करीब 270,000,000,000,000,000,000,000 मील बैठती है।


यदि कोई कार लगातार 65 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलती रहे, तो इस दूरी को तय करने में लगभग 48 करोड़ अरब वर्ष लगेंगे। यह अवधि ब्रह्मांड की करीब 13.8 अरब वर्ष की वर्तमान उम्र से लगभग 3.5 करोड़ गुना अधिक है। जाहिर है, यह कोई ऐसी यात्रा नहीं होगी, जिसे एक जीवन में पूरा किया जा सके। बल्कि यह समय की उस विशालता का एहसास कराती है, जिसकी कल्पना करना भी सोच से परे है। इस यात्रा की कठिनाइयां केवल दूरी और समय तक सीमित नहीं होंगी। सड़क पर गाड़ी चलाना भी जोखिम भरा होगा। कल्पना कीजिए कि अंतरिक्ष में एक विशाल राजमार्ग बना दिया गया हो और आप कार लेकर निकल पड़े हों। इस सफर में अधिकांश चालक सौरमंडल के भीतर क्षुद्रग्रहों की पट्टी से आगे पहुंचने से पहले ही दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। ऐसे में, स्वचालित कार या लेन से भटकने पर चेतावनी देने वाली तकनीक काम आ सकती है। हालांकि, इतनी लंबी यात्रा में उसकी उपयोगिता भी सीमित ही होगी।

ईंधन का हिसाब लगाएं, तो स्थिति और दिलचस्प हो जाती है। यदि आपकी कार एक लीटर पेट्रोल में तकरीबन 20 किलोमीटर चलती है, तो ब्रह्मांड के दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए आपको इतने पेट्रोल की जरूरत पड़ेगी कि उसकी मात्रा पृथ्वी के सभी महासागरों के पानी से भी करीब 16 हजार गुना अधिक होगी। इंजन के रखरखाव की चिंता भी कम नहीं होगी। हर 3,000 मील पर इंजन ऑयल बदलने की पुरानी सलाह को आधुनिक वाहनों के मामले में जरूरी नहीं माना जाता, फिर भी ब्रह्मांड के छोर तक की यात्रा में करीब 30 क्विंटिलियन (शंख) बार इंजन ऑयल बदलने की जरूरत पड़ेगी। सफर में खाने-पीने की जरूरत पूरी करने के लिए करीब 10 पद्म टन नाश्ता चाहिए होगा। अंतरिक्ष में जगह-जगह विश्राम केंद्र हों, तभी इस यात्रा की कल्पना आसान लग सकती है।

इतनी लंबी यात्रा में समय बिताना भी एक बड़ी समस्या होगी। शुरुआत में शायद तारों, ग्रहों और आकाशगंगाओं के नजारे मन को लुभाएं, पर अरबों वर्ष गुजरने के बाद दृश्य बदलने लगेंगे। अधिकांश तारे अपनी ऊर्जा समाप्त कर बुझ चुके होंगे और अंतरिक्ष पहले से कहीं अधिक अंधकारमय हो जाएगा। तारों के जीवन और उनके भविष्य की कल्पना इस यात्रा को विज्ञान की दृष्टि से रोचक बनाती है। मसलन, केप्लर-1606 जैसे किसी तारे तक पहुंचने की कल्पना की जा सकती है, जो पृथ्वी से लगभग 2,800 प्रकाश वर्ष दूर बताया गया है। यदि कार से वहां पहुंचने में करीब 30 अरब वर्ष लग जाएं, तो तब तक वह ठंडा हो चुका होगा। हालांकि, ऐसे दूरगामी समय में किसी तारे और उसके ग्रहों की वास्तविक स्थिति का अनुमान लगाना कई वैज्ञानिक अनिश्चितताओं से जुड़ा है। जब देखने के लिए तारे और ग्रह भी नहीं बचेंगे, तब मनोरंजन कैसे होगा? दुनिया की सभी ऑडियोबुक्स, फिल्मों और पॉडकास्ट को भी अपने साथ ले जाएं, तो वे भी इस यात्रा का बहुत छोटा हिस्सा ही भर पाएंगे।

ब्रिटिश मानवविज्ञानी रॉबिन डनबर ने यह विचार दिया था कि एक औसत व्यक्ति लगभग 150 लोगों के साथ स्थायी सामाजिक संबंध बनाए रख सकता है। वहीं, अब तक पृथ्वी पर जन्म लेने वाले मनुष्यों की कुल संख्या 100 अरब से अधिक आंकी जाती है। यदि उन सभी के जीवन को वास्तविक समय में दर्ज किया जाए, तो इस यात्रा के दौरान उन्हें देखने में भी अत्यंत लंबा समय लगेगा। कल्पना कीजिए कि हर मनुष्य के जीवन की पूरी कहानी एक वृत्तचित्र के रूप में उपलब्ध है और उसके परिचितों के नजरिये से उस पर अलग-अलग टिप्पणियां भी मौजूद हैं। सभी जीवन-कथाओं को इस तरह देखना और फिर उन्हें बार-बार दोहराना भी यात्रा के समय का एक छोटा हिस्सा ही भर पाएगा। इस तरह ब्रह्मांड की विशालता को समझाने के लिए मानवीय जीवन की कहानियां भी एक दिलचस्प पैमाना बन जाती हैं। लेकिन, इस यात्रा की सबसे विचारोत्तेजक बात इसके अंत में सामने आती है। मान लीजिए कि आप किसी तरह ब्रह्मांड के छोर तक पहुंच भी गए, तो क्या वहां से लौटकर पृथ्वी पर आ सकेंगे? वापसी में भी उतना ही समय लगेगा। तब तक पृथ्वी वैसी नहीं रहेगी, जैसी आज है। सूर्य का वर्तमान जीवनकाल समाप्त हो चुका होगा और पृथ्वी पर परिस्थितियां भी बदल चुकी होंगी। इतने लंबे समय बाद ब्रह्मांड में तारों के अवशेष और ब्लैक होल जैसे पिंड ही प्रमुख रूप से बचे रह सकते हैं। ऐसे में, वापस घर लौटने का विचार भी अर्थहीन लगने लगेगा।

फिर भी, इस पूरी कल्पना के पीछे सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य यह है कि दृश्य ब्रह्मांड का छोर वास्तविक ब्रह्मांड का अंत नहीं है। दृश्य ब्रह्मांड उस क्षेत्र को कहते हैं, जहां से प्रकाश को ब्रह्मांड की उम्र के भीतर हम तक पहुंचने का अवसर मिला है। इससे परे भी अंतरिक्ष फैला हो सकता है, पर वहां से आने वाला प्रकाश अभी तक हम तक नहीं पहुंचा है। ब्रह्मांड कितना बड़ा है, उसकी कोई सीमा है या वह अनंत तक फैला हुआ है, इन सवालों के जवाब अभी हमारे पास नहीं हैं। विज्ञान ने ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को लगातार विस्तार दिया है, पर हर नए उत्तर के साथ कुछ नए सवाल भी खड़े हुए हैं।

ब्रह्मांड के छोर तक कार से पहुंचने की कल्पना भले ही हास्य और अतिशयोक्ति से भरी हो, लेकिन यह एक गंभीर सच की ओर ध्यान खींचती है। मनुष्य की रोजमर्रा की जिंदगी में हजारों मील की दूरी भी बड़ी लगती है, जबकि ब्रह्मांड के पैमाने पर वह लगभग नगण्य है। समय, दूरी और अस्तित्व की हमारी सामान्य धारणाएं अंतरिक्ष की विशालता के सामने छोटी पड़ जाती हैं। विज्ञान की खूबसूरती भी यही है कि वह असंभव लगने वाले सवालों को पूछने और उनके जवाब खोजने के लिए प्रेरित करता है। ब्रह्मांड के छोर तक पहुंचना संभव हो या नहीं, लेकिन उसकी विशालता को समझने की कोशिश अपने आप में एक रोमांचक यात्रा है।

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