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जानना जरूरी है: दुष्यंत ने शकुंतला को क्यों ठुकराया, दोनों के पुत्र भरत के नाम से इस भूखंड का नाम भारत हुआ
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दुष्यंत ने शकुंतला को क्यों ठुकराया
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अमर उजाला
विस्तार
विश्वामित्र और मेनका से एक कन्या का जन्म हुआ। इंद्र के आदेश पर मेनका उस कन्या को महर्षि कण्व के आश्रम में छोड़कर देवलोक चली गईं। तब शकुंत पक्षियों ने उस कन्या की रक्षा की, इसलिए उसका नाम शकुंतला पड़ा। जंगल से गुजरते हुए कण्व ने कन्या को देखा, तो वह उसे अपने आश्रम ले आए और पुत्री की तरह उसका पालन-पोषण किया। कुछ समय बाद पुरुवंश में दुष्यंत नाम के एक प्रतापी राजा हुए।
एक बार दुष्यंत वन में आखेट के लिए गए। संयोग से उसी वन में कण्व का आश्रम था, इसलिए दुष्यंत महर्षि के दर्शन करने आश्रम पहुंच गए। कण्व उस समय आश्रम में नहीं थे। दुष्यंत की दृष्टि शकुंतला पर पड़ी। दुष्यंत ने शकुंतला से उनका परिचय मांगा और कण्व से मिलने की इच्छा व्यक्त की। शकुंतला ने दुष्यंत को अपने जन्म की कथा सुनाई और कहा कि महर्षि कण्व अभी कहीं गए हुए हैं। दुष्यंत ने शकुंतला के अनुपम सौंदर्य और मधुर स्वभाव पर मोहित होकर उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। शकुंतला ने पहले तो राजा को ऋषि कण्व की प्रतीक्षा करने के लिए कहा, किंतु फिर दोनों ने सहमति से गंधर्व विवाह कर लिया। शकुंतला के साथ समागम के बाद दुष्यंत उन्हें अपने महल में बुलाने का वचन देकर चए गए।
कुछ देर बाद कण्व लौटे, तो शकुंतला ने उन्हें सारी बात बताई। उसे सुनकर कण्व ने भविष्यवाणी कर दी कि दुष्यंत धर्मात्मा और श्रेष्ठ पुरुष हैं। इसलिए शकुंतला के गर्भ से पैदा होने वाला बालक महाबली होगा और इस पृथ्वी का उपभोग करेगा। शकुंतला, राजा दुष्यंत की प्रतीक्षा करती रहीं किंतु दुष्यंत नहीं आए। धीरे-धीरे समय बीतता गया। फिर एक दिन शकुंतला ने एक सुंदर और तेजस्वी बालक को जन्म दिया। तब भी दुष्यंत नहीं आए। शकुंतला के पुत्र केे दांत सफेद और नुकीले थे। शरीर गठा हुआ और ऊंचा कद था। उसके हाथों में चक्र के चिह्न अंकित थे तथा वह चौड़े मस्तक वाला था।
छह वर्ष की अवस्था में देवताओं-सा दिखने वाला बालक सिंहों, व्याघ्रों, वराहों आदि को आश्रम में खींच लाता और वृक्ष से बांध दिया करता था। एक दिन एक राक्षस कण्व के आश्रम में घुस आया, तो बालक ने उसे दोनों हाथों से पकड़कर इतनी जोर से दबाया कि उसके प्राण निकल गए।
बालक के भय से राक्षसों ने कण्व के आश्रम में जाना ही छोड़ दिया। चूंकि वह सभी जीवों का दमन कर देता था, इसलिए कण्व ने उसका नाम ‘सर्वदमन’ रख दिया। शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करके सर्वदमन बारह वर्ष का हो गया। फिर भी दुष्यंत को शकुंतला की याद नहीं आई।
एक दिन कण्व ने शकुंतला से कहा, ‘सर्वदमन का राजकुमार पद पर अभिषेक होना चाहिए। दुष्यंत अब तक नहीं आए, इसलिए तुम इसे साथ लेकर उनके पास जाओ।’
शकुंतला शीघ्र ही अपने पुत्र को लेकर राजा दुष्यंत के दरबार में पहुंच गईं। दोनों ने राजा को प्रणाम किया। दुष्यंत ने शकुंतला से पूछा, ‘तुम कौन हो? यहां क्यों आई हो?’
शकुंतला ने राजा दुष्यंत को कण्व के आश्रम में उनकी भेंट और विवाह की बात याद दिलाई, किंतु राजा ने उन्हें पहचानने से मना कर दिया। दुखी शकुंतला लौटने ही वाली थीं कि आकाशवाणी हुई, ‘दुष्यंत! शकुंतला तुम्हारी धर्मपत्नी हैं और यह बालक तुम्हारा पुत्र है। तुम इसका पालन-पोषण करोगे, इसलिए यह बालक ‘भरत’ नाम से विख्यात होगा।’ इसके बाद आकाश से पुष्प-वर्षा होने लगी।
यह देख दुष्यंत ने कहा, ‘मैंने तुम्हें पहचान लिया था, किंतु मैं तुम्हें यों ही स्वीकार कर लेता, तो लोग सोचते कि मैंने काम के वश में होकर तुम्हारे पुत्र को सिंहासन पर बैठाने का निश्चय किया है।’ फिर दुष्यंत ने शकुंतला को पत्नी के रूप में स्वीकार कर पुत्र भरत को युवराज घोषित कर दिया। भरत के नाम से इस भूखंड का नाम भारत हुआ और कौरव वंश भी भरत वंश कहलाया।