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Indian Economy : कर्ज घटाने में ऐसे सफल हुआ भारत, क्या कोविड का मुकाबला करने के लिए उठाए गए कदमों का कमाल?

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सार
Indian Economy : डब्ल्यूईओ के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 के प्राथमिक और राजकोषीय घाटे के क्रमशः 4.5 प्रतिशत और 9.9 प्रतिशत के अनुमान से तुलना करने पर इसके लिए एक तीव्र समायोजन की आवश्यकता होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि विकास दर जितनी अधिक होगी और ब्याज दर जितनी कम होगी, समायोजन की आवश्यकता उतनी ही कम होगी।
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Indian Economy: succeeded reducing debt is it result of Covid 19 combat
indian economy - फोटो : istock

विस्तार

Indian Economy : कोविड का मुकाबला करने के लिए उठाए गए कदमों और कम वृद्धि तथा उच्च ब्याज दरों के कारण वर्ष 2020 में भारत का राजकीय ऋण अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच गया था। कुछ लोगों का तर्क था कि कम ब्याज दरों के दौर में ज्यादा कर्ज बहुत चिंताजनक नहीं है। पर इसके भी प्रमाण दिखे हैं कि ज्यादा राजकीय कर्ज का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है। इस पृष्ठभूमि में हम भारत में राजकीय कर्ज और राजकोषीय घाटे का विश्लेषण करते हैं, तो कुछ सवाल उठते हैं। जैसे कि भारत में कर्ज के ऊंचे स्तर की लागत क्या है? 



क्या कोई सुनहरी तस्वीर दिखाई देती है? आगे क्या होने वाला है? हम भारत और अन्य देशों में कर्ज 'वृद्धि, स्थिरीकरण और कमी' के दौर में तथा उसके बाद व्यापक आर्थिक परिणामों का विश्लेषण करते हैं और जानना चाहते हैं कि वृद्धि और कमी के पिछले अनुभव, विभिन्न नीति विकल्पों एवं महामारी के दौरान और बाद की रिकवरी के बारे में क्या बताती है। भारत में कोविड प्रेरित कर्ज अतीत की तुलना में तो ज्यादा था ही,  औसत उभरते बाजार की अर्थव्यवस्था के कर्ज से भी बड़ा था। कर्ज में वृद्धि के कारण भी अलग थे। 


सरकारी खर्च में वृद्धि और विकास में गिरावट, दोनों ने औसत उभरती अर्थव्यवस्था की तुलना में आनुपातिक रूप से बड़ी भूमिका निभाई, बावजूद इसके कि उच्च मुद्रास्फीति ने भारत में कर्ज कम करने में बड़ी भूमिका निभाई। राजकीय ऋण के उच्च स्तर के बावजूद भारत के लिए कुछ उम्मीदें हैं। जैसे, राजकीय ऋण में विदेशियों का हिस्सा कम है। फिर जहां दुनिया भर में कर्ज में वृद्धि के बाद डिफॉल्ट की घटनाएं हुई हैं, भारत में अब तक ऐसी कोई घटना नहीं हुई है। साथ ही लंबी अवधि की वास्तविक दरें भारत में औसत उभरती अर्थव्यवस्था की तुलना में कम बनी हुई हैं। 

अत्यधिक उच्च ब्याज भुगतान के कारण परित्यक्त संसाधन, जो कोविड के दौरान कुल राजस्व का लगभग 30 प्रतिशत था, भारत में सामान्य उभरती अर्थव्यवस्था की तुलना में तीन गुना अधिक था। ब्याज भुगतान पर उच्च व्यय, कोविड जैसे नकारात्मक झटकों की स्थिति में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सामाजिक खर्च के साथ प्रतिचक्रीय राजकोषीय नीतियों के लिए उपलब्ध संसाधनों को कम करता है, जहां भारत का सार्वजनिक खर्च अपने समकक्षों से काफी नीचे है। 

हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि व्यापार चक्र में उतार-चढ़ाव भारत में समकक्षों की तुलना में ऋण में अंतर के एक हिस्से की पुष्टि करता है, उच्च ऋण के कारण प्रतिचक्रीय राजकोषीय नीति की सीमाओं की पुष्टि करता है। सरल गणना से पता चलता है कि भारत के ब्याज भुगतान को उभरती अर्थव्यवस्था से औसत दस प्रतिशत तक कम करने से लगभग 60 से 80 खरब रुपये के संसाधन जारी होंगे, जो भारत के कोविड पूर्व सामान्य सरकारी शिक्षा खर्च के बराबर और इसके स्वास्थ्य खर्च का लगभग तीन गुना है। 

भारत में उच्च सार्वजनिक ऋण की एक और वजह उधार की लागत पर पड़ने वाला इसका प्रभाव है। हालांकि भारत में वास्तविक दरें कम और औसत उभरती अर्थव्यवस्था के बराबर हैं, पर हम पाते हैं कि समय के साथ उनमें वृद्धि हुई है, और औसत उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत में उधार लेने की लागत ज्यादा है। जैसे, औसतन सकल घरेलू उत्पाद में ऋण में एक प्रतिशत पॉइंट की वृद्धि भारत में लंबी अवधि की उधार लागत में 0.19 प्रतिशत पॉइंट की वृद्धि करती है, जबकि औसत उभरती अर्थव्यवस्था में मात्र 0.01 प्रतिशत पॉइंट की वृद्धि होती है। 

सार्वजनिक ऋण रेटिंग एजेंसियों का आकलन भी बताता है कि भारत का ऋण और घाटा समान दर वाली समकक्ष अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी अधिक है। वर्ष 1913 से भारत में राजकीय कर्ज में नौ बार वृद्धि हुई, पांच बार कमी हुई और छह बार कर्ज स्थिर रहा। भारत में कर्ज वृद्धि आमतौर पर स्थिरीकरण में तब्दील हो गई, जबकि औसत उभरती अर्थव्यवस्था में, 75 प्रतिशत कर्ज वृद्धि कटौती में खत्म होती है। यानी भारत बिना किसी डिफॉल्ट के उच्च स्तर का कर्ज झेलने में सक्षम है। हमने यह भी पाया कि कर्ज कटौती की तुलना में कर्ज में वृद्धि खराब व्यापक आर्थिक परिणामों से जुड़ी है। 

भारत कितना कर्ज कम कर सकता है, इसका उत्तर पाने का एक तरीका ब्याज भुगतान और अतिरिक्त बजटीय संसाधनों को देखना है, जो कम राजकीय उधार से उत्पन्न हो सकते हैं। जैसे, ब्याज भुगतान को 22 प्रतिशत तक (अभी उभरती अर्थव्यवस्था के औसत 10 प्रतिशत से बहुत अधिक) प्राप्त करने के लिए ऋण अनुपात को 70 प्रतिशत तक कम करने की जरूरत होगी। इसका संभावित रास्ता क्या है और वहां पहुंचने में कितना समय लगेगा? विकास दर जितनी अधिक होगी और उधार लेने की लागत जितनी कम होगी, राजकोषीय समायोजन की आवश्यकता उतनी ही कम होगी। 

दिखावे की कवायद से पता चलता है कि अगर हम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक की धारणाओं के अनुरूप वास्तविक जीडीपी विकास दर के लिए स्थिर मूल्य सात प्रतिशत और वास्तविक दर दो प्रतिशत मान लें,  तो अगले 10 वर्षों में ऋण अनुपात को 70 प्रतिशत तक कम करने के लिए (और ब्याज भुगतान के राजस्व का 22 प्रतिशत) प्रत्येक वर्ष सामान्य सरकारी प्राथमिक और राजकोषीय घाटा क्रमशः जीडीपी के 1.7 प्रतिशत और 5.9 प्रतिशत से कम करने की जरूरत होगी। 

डब्ल्यूईओ के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 के प्राथमिक और राजकोषीय घाटे के क्रमशः 4.5 प्रतिशत और 9.9 प्रतिशत के अनुमान से तुलना करने पर इसके लिए एक तीव्र समायोजन की आवश्यकता होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि विकास दर जितनी अधिक होगी और ब्याज दर जितनी कम होगी, समायोजन की आवश्यकता उतनी ही कम होगी। उदाहरण के लिए, नौ प्रतिशत की वृद्धि दर या शून्य प्रतिशत की वास्तविक दर जीडीपी के 1.7 प्रतिशत के बजाय तीन प्रतिशत से अधिक के प्राथमिक घाटे के लिए ज्यादा गुंजाइश खोल देगी, फिर भी उतने ही ऋण की कमी सुनिश्चित होगी। वास्तव में, उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साक्ष्य बताते हैं कि मंदी के बाहर प्राथमिक संतुलन समेकन ऋण को कम करने में सफल हो सकता है और विकास के लिए नुकसानदेह नहीं होता। (-प्राची मिश्र एवं निखिल पटेल वाशिंगटन डीसी में आईएमएफ से संबद्ध हैं।)

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