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अर्थव्यवस्था: आंकड़ों को दिशासूचक की तरह लेने की जरूरत, अब भी सामने खड़ी हैं चुनौतियां

Tue, 05 Mar 2024 07:26 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 05 Mar 2024 07:26 AM IST
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सार
विभिन्न सर्वे बताते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था चमत्कारिक ढंग से आगे बढ़ रही है, जो अच्छी बात भी है। लेकिन आंकड़ों को दिशासूचक की तरह लेने की जरूरत है, क्योंकि सामने खड़ी चुनौतियां उन वास्तविकताओं की तरह हैं, जिन्हें हम नजर अंदाज नहीं कर सकते।
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Indian economy gdp growth data needs to be taken as guide, because challenges cannot ignore
Representative Image - फोटो : iStock

विस्तार

एक पुरानी कहावत है कि आमतौर पर लोग उस बात पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं, जिसे वे सच मानना चाहते हैं। हरेक कुछ महीनों में भारत की सार्वजनिक बहस में यही सच सामने आता है। अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में आंकड़े सामने आते ही बयानबाजी शुरू हो जाती है। बेहद ध्रुवीकृत राजनीतिक अखाड़े में समर्थक वाह-वाह करते हुए और शक्की अविश्वास में बहस करते हुए पाए जाते हैं। रह गए संशयवादी, तो वे संशय ही करते रहते हैं।



हाल ही में देश और दुनिया को बताया गया कि इस वर्ष अर्थव्यवस्था पांच जनवरी को पूर्वानुमानित 7.3 फीसदी नहीं, बल्कि 7.6 फीसदी की दर से विकास करेगी। उत्कृष्ट प्रदर्शन ने सबको हैरान कर दिया। दिसंबर, 2023 तक रिजर्व बैंक के पेशेवर पूर्वानुमान सर्वे ने वित्त वर्ष 2023–24 के लिए वास्तविक जीडीपी 6.0–6.9 फीसदी के दायरे में रहने की उच्चतम संभावना जताई थी। विकास दर मेंं यह वृद्धि पिछले वर्षों और तिमाहियों के आंकड़ों में संशोधन के बाद हुई है, जिसके तहत वर्ष 2022–23 की जीडीपी विकास दर कम रही और मौजूदा वर्ष की पहली तिमाही के आंकड़ों में यह ऊपर दिखी। इसमें यह खुलासा भी किया गया कि अक्तूबर और दिसंबर, 2023 के बीच अर्थव्यवस्था 8.4 फीसदी की दर से बढ़ी। जीडीपी की 8.4 फीसदी दर पर बहुत ज्यादा उत्साह पैदा हुआ, जबकि इस अवधि के लिए सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) 6.5 फीसदी था। कम जीवीए को सब्सिडी पर कम खर्च और करों में वृद्धि के रूप में विश्लेषित किया जाता है। जीवीए में करों को जोड़कर और उसमें से सब्सिडी घटाने पर जीडीपी का आंकड़ा निकाला जाता है। दिलचस्प बात यह है कि तीन तिमाहियों में जीवीए क्रमिक रूप से 8.2 फीसदी से घटकर 6.5 फीसदी हो गया है।


अर्थव्यवस्था की स्थिति पर बहसें अक्सर आंकड़ों की बारीकियों में खो जाती हैं। स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से ज्यादा और पूर्वानुमानों से बेहतर प्रदर्शन किया है। यह बुनियादी संरचनाओं पर खर्च और जीएसटी एवं प्रत्यक्ष करों के आंकड़ों से भी स्पष्ट होता है। जीडीपी के अनुमान से विनिर्माण  एवं निर्माण के क्षेत्र में भी मजबूत वृद्धि का पता चलता है। आय में वृद्धि और शेयर सूचकांकों की शानदार उछाल से इसकी पुष्टि होती है। यह सब स्वीकारते हुए भी कहना होगा कि सब कुछ ठीक नहीं है। ये अनुमान विकास की रफ्तार और गति में मंदी का भी संकेत देते हैं। वर्ष के अंत में 7.6 फीसदी का अनुमान बताता है कि चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर छह फीसदी के आस-पास होगी। सामाजिक व्यवस्था के अन्य तत्वों की तरह आर्थिक विकास भी औसत के नियम से नियंत्रित होता है। क्या यह गिरावट है, सांख्यिकीय प्रभाव है या कोई संरचनात्मक मुद्दा है, जिसे विकास को बनाए रखने के लिए संबोधित किया जाना चाहिए?

आंकड़े बताते हैं कि विकास की इस गति में हर क्षेत्र शामिल नहीं है। भले ही जीडीपी 7.6 फीसदी की दर से विकास कर रहा हो, पर तथ्य यह है कि निजी खपत मुश्किल से तीन फीसदी की दर से बढ़ रही है, जो चिंता का विषय होना चाहिए। खपत के आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि जीडीपी में खपत का योगदान 55.6 फीसदी होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि खपत में गिरावट एक मौसमी मुद्दा है या खर्च करने की क्षमता में बुनियादी गिरावट है।

हालांकि पीड़ा को कम करने और खपत बढ़ाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप किया गया है। लेकिन 81 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज, 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य सेवा, 16 करोड़ से ज्यादा लोगों को ग्रामीण रोजगार के अलावा धन हस्तांतरण, घर एवं उपभोग्य सामग्रियों के प्रावधान जैसे कल्याणकारी कार्यक्रमों के आक्रामक विस्तार के बावजूद खपत घट रही है। इसका असर कम लागत वाली वस्तुओं की बिक्री एवं उपभोक्ता वस्तुओं तथा टिकाऊ निर्माताओं की कमाई पर दिख रहा है। दरअसल, अंतरिम बजट के पहले उद्योग मंडलों ने कल्याणकारी लाभों के विस्तार की बात की थी।

जीडीपी के अनुमानों में अन्य चिंताजनक आंकड़े भारत के दो सबसे बड़े नियोक्ताओं से संबंधित हैं। पहला सेवा क्षेत्र, जो बड़ी संख्या में नए रोजगार पैदा करता है और दूसरा कृषि, जो संपूर्ण कार्यबल के 45 फीसदी से ज्यादा कार्यबल को रोजगार देती है। कृषि में तीसरी तिमाही में संकुचन दिखाई दिया और वर्ष के अंत में उसकी वृद्धि दर 0.7 फीसदी हो सकती है। सेवा क्षेत्र भी पिछड़ गया है और दोहरे अंक की वृद्धि के ऐतिहासिक स्तर से काफी नीचे रुका हुआ है।

कुछ अन्य मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। देश की जनसांख्यिकी से पता चलता है कि युवा कार्यबल अब ज्यादातर उत्तर के सबसे आबादी वाले राज्यों में रहते हैं, जबकि विकास, रोजगार, आय और खपत का झुकाव भारत के दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों की ओर है। 60 हजार नौकरियों के लिए 48 लाख युवा आवेदन देते हैं, राज्यों में अक्सर पेपर लीक के मामले सामने आते हैं, इंजीनियरिंग एवं मैनेजमेंट कॉलेजों में कैंपस प्लेसमेंट में भारी गिरावट आई है। इन सबके मद्देनजर मूल्यांकन और सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है।

इसके अलावा, दुनिया भर के निगम जेनरेटिव एआई और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने वाले सिस्टम में करीब 200 अरब डॉलर का निवेश कर रहे हैं। वित्तीय क्षेत्र और आईटी सेवाएं भारत के शिक्षित युवाओं के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से हैं। वर्ष 2023 में दुनिया भर के बैंकों ने 60 हजार से ज्यादा नौकरियां खत्म कर दीं। पिछले हफ्ते नैसकॉम के चेयरमैन ने जेनरेटिव एआई द्वारा बीपीओ कर्मियों की जगह लेने के जोखिमों पर चिंता जताई। चिप निर्माता कंपनी एनवीडिया के प्रमुख जेन्सेन हुआंग ने घोषणा की कि एआई कोडिंग को खत्म कर देगा। पश्चिम में प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाने से भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न होता है।

आर्थिक विकास एवं नीति के लिए संदर्भ महत्वपूर्ण होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था जो हम जानते हैं और जो हम जानते हुए भी आंख मूंद कर बैठे हैं, के बीच झूल रही है। आंकड़ों को दिशासूचक की तरह लिया जाना चाहिए। आर्थिक विकास की गति, चुनौतियां, बाधाएं इत्यादि सब पर बहस होनी चाहिए। याद रखें, चुनौतियों का दबाव जितना ज्यादा होगा, अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उतना ही निखरता जाएगा।

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