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आर्थिकी: सहकारी क्षेत्र में सुधार से होगा तेज विकास, गरीब, किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त बनेंगे
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भारत की अर्थव्यवस्था में 'सहकारिता से विकास' का मंत्र असरदार (सांकेतिक फोटो)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
विकास को गति देने के लिए केंद्र सरकार ने सहकारिता मंत्रालय का गठन किया है और अब ‘सहकार से समृद्धि’ की परिकल्पना के साकार होने की उम्मीद भी की जा रही है। हमारे देश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत पिछली सदी में हुई एवं तब से आज तक सहकारी क्षेत्र में लाखों समितियों की स्थापना हुई है। कुछ अत्यधिक सफल रही हैं, जैसे अमूल डेयरी, परंतु ऐसी सफलता की कहानियां बहुत कम ही रही हैं। सहकारिता आंदोलन को जिस तरह सफल होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। देश की अर्थव्यवस्था को यदि पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है, तो सहकारिता आंदोलन को भी सफल बनाना ही होगा।
देश में करीब एक लाख महिला सहकारी साख समितियां हैं। मछली पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मछली सहकारी साख समितियां भी स्थापित की गई हैं, इनकी संख्या कुछ कम है। देश में बुनकर सहकारी साख समितियां भी गठित की गई हैं, इनकी संख्या भी लगभग 35,000 है। इसके अतिरिक्त हाउसिंग सहकारी समितियां भी कार्यरत हैं। विभिन क्षेत्रों में कार्यरत उक्त सहकारी समितियों के अतिरिक्त सहकारी बैंक भी हैं।
सहकारी क्षेत्र के बैंकों में पेशेवर प्रबंधन का अभाव रहा है एवं ये बैंक पूंजी बाजार से पूंजी जुटा पाने में भी सफल नहीं रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा नए सहकारिता मंत्रालय के गठन के बाद सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने में कसावट आएगी एवं इन संस्थानों का प्रबंधन भी पेशेवर बन जाएगा, जिसके चलते इन संस्थानों की कार्य प्रणाली में भी निश्चित ही सुधार होगा। ग्रामीण इलाकों में कार्य कर रहे बैंकों को अब नए व्यवसाय मॉडल खड़े करने होंगे। अब केवल कृषि व्यवसाय आधारित ऋण प्रदान करने वाली योजनाओं से काम चलने वाला नहीं है। अतः देश के सभी भागों में डेयरी उद्योग को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है।
गाय एवं भैंस को चिकित्सा सुविधाएं एवं उनके लिए चारे की व्यवस्था करना, आदि समस्याओं का हल भी खोजा जाना चाहिए। साथ ही, ग्रामीण इलाकों में किसानों की आय को दोगुना करने के लिए सहकारी क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना करनी होगी। इससे खाद्य सामग्री की बर्बादी को भी रोका जा सकेगा। एक अनुमान के अनुसार, देश में प्रति वर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत फल एवं सब्जियों का उत्पादन उचित रख-रखाव के अभाव में बर्बाद हो जाता है।
देश में व्यापार एवं निर्माण कार्यों को आसान बनाने के उद्देश्य से ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के क्षेत्र में जो कार्य किए जा रहे हैं, उसे सहकारी संस्थानों पर भी लागू किया जाना चाहिए, ताकि इस क्षेत्र में भी काम करना आसान हो सके। सहकारी संस्थानों को पूंजी की कमी नहीं हो, इस हेतु भी प्रयास किए जाने चाहिए। सहकारी क्षेत्र के संस्थान भी पूंजी बाजार से पूंजी जुटा सकें, ऐसी व्यवस्था की जा सकती है। विभिन्न राज्यों के सहकारी क्षेत्र में लागू कानून बहुत पुराने हैं। अब, आज के समय के अनुसार इन कानूनों में परिवर्तन करने का समय आ गया है।
'सहकारिता से विकास' का मंत्र पूरे भारत में सफलतापूर्वक लागू होने से गरीब, किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त हो जाएंगे।