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उभरता भारत: उम्मीदों के पंख पर सवार, चुनौतियां आएंगी पर रोक नहीं पाएंगी
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विकसित भारत का लक्ष्य पाने के लिए तेज और निरंतर विकास जरूरी (प्रतीकात्मक)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
जैसे-जैसे 2024 खत्म हो रहा है, हम इस विश्व में उम्मीद और लचीलेपन के संकेत देख रहे हैं, जहां देशों के भीतर और विभिन्न देशों के बीच संघर्ष तथा अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं। भारतीय किशोर गुकेश डोमराजू का सबसे कम उम्र में शतरंज का विश्व चैंपियन बनना उम्मीद का संकेत था। मात्र 18 वर्ष के गुकेश ने चीन के पिछले चैंपियन डिंग लिरेन को हराया। यह बताता है कि शतरंज के खेल में भारत की स्थिति मजबूत है। फिर शीर्ष निशानेबाज मनु भाकर हैं, जिन्होंने पेरिस ओलंपिक में दो कांस्य पदक जीते। एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली वह देश की पहली खिलाड़ी बनीं। ये युवा भारतीय दर्शाते हैं कि भारत चाहे तो कुछ भी कर सकता है।
लेकिन इन असाधारण भारतीयों के जीवन, समय और देश को उन्होंने जो गौरव दिलाया, उससे परे भी एक भारत है, जहां सामान्य लोग उम्मीद, दृढ़ता और निराशा के बीच जी रहे हैं। जैसे-जैसे साल बीत रहा है, हमें उन आम भारतीयों के बारे में भी सोचना चाहिए, जो सुर्खियों में नहीं रहते, लेकिन उनकी जिंदगी भी उतनी ही मायने रखती है। हमें थोड़ा समय निकाल कर आम भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता के बारे में भी सोचना चाहिए। आम भारतीय बस यही चाहते हैं कि उनका जीवन गरिमामय हो, अच्छी आय हो और सस्ती कीमत पर स्वास्थ्य एवं शिक्षा मिले तथा गांव एवं शहर सुरक्षित हों, ताकि महिलाएं, पुरुष एवं बच्चे शांति से रहें और घूम सकें। वे स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी चाहते हैं और बिना अनावश्यक हस्तक्षेप के इच्छित काम करना चाहते हैं। ये सब विलासिता की चीजें नहीं हैं, फिर भी लाखों लोगों की पहुंच से दूर हैं।
देश की राजधानी दिल्ली को ही ले लीजिए। दो करोड़ से ज्यादा आबादी वाला यह महानगर वर्ष में कई महीनों तक भयावह वायु प्रदूषण का दंश झेलता है, जिससे शहर के लोगों के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचता है। वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारक वाहनों का धुआं है। विशेषज्ञों ने सार्वजनिक परिवहन के विस्तार का सुझाव दिया है, जो शानदार विचार है। दुनिया भर के कई शहर इसे अपना रहे हैं। सार्वजनिक परिवहन को सफल बनाने के लिए लोगों के अंतिम गंतव्य तक कनेक्टिविटी हो, ताकि महिलाओं को दिन या रात किसी भी समय घर से आते-जाते वक्त सुरक्षा का एहसास हो। लेकिन दिल्ली समेत भारत के कई शहरों में ऐसा नहीं है। मैं इस वक्त थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में हूं, जहां उत्कृष्ट सार्वजनिक परिवहन सुविधाएं हैं। एक महिला के रूप में यहां कहीं भी और कभी भी घूमना लगभग पूरी तरह सुरक्षित है। यह किसी भी राष्ट्र के लिए छोटी-सी बात लगती है, लेकिन बुनियादी बातों की मजबूती सुनिश्चित करती है।
भारत के पास बहुत ताकत है और गर्व करने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन कुछ कमियां भी हैं। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन कड़वी सच्चाई है कि यहां किसी को पेड़ से बांधकर पीट-पीटकर मार डाला जाता है। ऐसी भयावह घटनाओं को हमें इसलिए नजर अंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये हमारे साथ नहीं हो रही हैं। हमें उन बातों को भी सामान्य नहीं मानना चाहिए, जो वास्तव में बुरी हैं, चाहे वह पहले भी और अन्यत्र भी घटित हुई हों।
जब हम उस भारत का जश्न मना रहे हैं, जो हमारे दिलों को खुशियों से भर देता है, तो जैसे-जैसे वर्ष 2025 करीब आ रहा है, उम्मीद है कि हम उस दूसरे भारत को भी नहीं भूलेंगे।