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अंतरराष्ट्रीय संबंध: अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच भारत-ईरान के साथ ऐतिहासिक अनुबंध, भू-राजनीति में रचा गया इतिहास

Wed, 15 May 2024 05:40 AM IST
ravindar dubey रवींद्र दुबे
Updated Wed, 15 May 2024 05:40 AM IST
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सार
भारत द्वारा ईरान से चाबहार बंदरगाह के प्रबंधन के लिए किया गया दस वर्षीय अनुबंध भू-राजनीतिक दृष्टि से एक जबर्दस्त रणनीतिक कदम है। इससे न केवल चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव का मुकाबला किया जा सकता है, बल्कि पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह भी संतुलित होगा।
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India Iran Chabahar Agreement amidst Global Pressure Historical Feet
भारत-ईरान चाबहार अनुंबध भू-राजनीतिक सफलता (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

लोकसभा चुनाव के ऐन बीच में भारत द्वारा ईरान से चाबहार बंदरगाह के प्रबंधन के लिए किया गया दस वर्षीय अनुबंध को भू-राजनीतिक दृष्टि से एक जबर्दस्त रणनीतिक कदम बताया जा रहा है। भारत द्वारा किसी विदेशी या बाहरी बंदरगाह के प्रबंधन का यह पहला प्रयास है। ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित गहरे पानी का बंदरगाह चाबहार भारत के सबसे नजदीक खुले समुद्र में स्थित है, जहां भारी मालवाहक जहाज सरलतापूर्वक सुरक्षित रूप से पहुंच सकते हैं। साथ ही इस बंदरगाह में भारत, ईरान, अफगानिस्तान और यूरेशिया को आपस में जोड़ने की क्षमता है और यह चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का वैकल्पिक रास्ता मुहैया करवा सकता है।



जाहिर है, क्षेत्रीय दृष्टि से इस कदम के दूरगामी परिणाम होंगे। इससे न केवल चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव का मुकाबला किया जा सकता है, बल्कि पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह भी संतुलित होगा। चाबहार को इंटरनेशनल नार्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) से जोड़ने की भी योजना है, जिससे ईरान से होकर भारत के लिए रूस का रास्ता भी खुल जाएगा। यह बंदरगाह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और केंद्रीय एशिया के लिए भी भारत का रास्ता साफ करेगा। 


विदेश मंत्रालय के जानकार सूत्रों के अनुसार, इस दिशा में पिछले साल से ही काम चल रहा था। पिछले वर्ष अगस्त में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के बीच हुई चर्चा में चाबहार मुख्य मुद्दा था। फिर नवंबर में दोनों नेताओं की फोन पर हुई बातचीत का केंद्र बिंदु भी चाबहार बंदरगाह ही था। 

वर्ष 2018 में तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति रूहानी की भारत यात्रा में बंदरगाह के विकास में भारत की बढ़ी हुई भूमिका का मुद्दा और परवान चढ़ा। फिर विदेश मंत्री एस. जयशंकर की इसी साल जनवरी में हुई तेहरान यात्रा में बात और आगे बढ़ी। ऐसा नहीं है कि यह समझौता पहली बार हुआ है। वस्तुत: यह समझौता 2016 में मोदी की ईरान यात्रा के दौरान ही हो चुका था। मूल समझौते में चाबहार बंदरगाह के बहिश्ती टर्मिनल के ऑपरेशन ही शामिल थे, जिसका हर साल नवीनीकरण होता था। मई 2016 में भारत ने शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के विकास के लिए अफगानिस्तान और ईरान के साथ एक त्रिपक्षीय अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। अब यह दीर्घकालीन अनुबंध प्रारंभिक समझौते का स्थान लेगा। 

पिछले दो दशकों में चीन और भारत क्रमश: दुनिया की दूसरी और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में ऊपर उठ चुके हैं। व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इन दोनों एशियाई महाशक्तियों ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों-विशेष रूप से हिंद महासागर पर ध्यान केंद्रित किया है। हिंद महासागर क्षेत्र में तीन महाद्वीपों के 28 देश आते हैं, जिनमें से कुछ तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं। इस क्षेत्र में विश्व के अत्यधिक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं, जैसे दुनिया के 16.8 प्रतिशत तेल भंडार और वैश्विक प्राकृतिक गैस के 27.9 प्रतिशत भंडार।

चीन ने हिंद महासागर में अपने रणनीतिक हितों के संरक्षण के लिए ‘मोतियों की लड़ी’ (स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स)  की समुद्री रणनीति अपनाई है। बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान, मालदीव और तंजानिया जैसे तटीय दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों में बंदरगाहों की दीर्घकालीन पट्टे और उनके निर्माण में भारी निवेश उसकी इस रणनीति का एक हिस्सा है। हिंद महासागर में चीन की इस संलिप्तता के जवाब में भारत ने हिंद महासागर के देशों के साथ सहयोग, वार्ता, विकास में मदद और निवेश के लिए अपनी ‘हीरों का हार’ (नेकलेस ऑफ डायमंड्स) रणनीति बनाई है। 

वस्तुत: यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यापक 'लुक ईस्ट' योजना का हिस्सा है, जो आसियान देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने और चीन के समुद्री वर्चस्व से उपजी चिंताओं से निपटने के लिए बनाई गई है। हिंद महासागर में चीन और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा का सर्वाधिक स्पष्ट पहलू है-पाकिस्तान का चीन संचालित ग्वादर बंदरगाह और ईरान का भारत द्वारा संचालित चाबहार बंदरगाह। 

मजेदार बात यह है कि पाकिस्तान केंद्रीय एशियाई देशों को हिंद महासागर क्षेत्र में पहुंच बनाने के लिए कराची बंदरगाह का इस्तेमाल करने के लिए काफी समय से ललचा रहा है। जबकि भारत इन्हीं देशों को यह संकेत दे रहा है कि कराची की तुलना में चाबहार अधिक आकर्षक विकल्प है। कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे प्रचुर संसाधन वाले, किंतु मार्गहीन केंद्रीय एशियाई देश हिंद महासागर क्षेत्र और भारतीय बाजार तक पहुंच बनाने के लिए चाबहार बंदरगाह का उपयोग करने के लिए काफी उत्सुक हैं। यह बंदरगाह केंद्रीय एशिया में रुचि रखने वाले भारतीय व्यापारियों और निवेशकों के लिए भी काफी उपयोगी साबित होगा।

आने वाले दशकों में ग्वादर और चाबहार बंदरगाह नजर रखने लायक मुख्य क्षेत्र होंगे, क्योंकि हिंद महासागर में भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता स्पर्धा के एक बड़े इलाके को चिह्नित करेगी। प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से क्षेत्र की महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक प्रकृति के मद्देनजर हिंद महासागर में चीन, भारत और अन्य उभरते हुए देशों द्वारा रणनीतिक बढ़त हासिल करने के गंभीर वैश्विक परिणाम होंगे।

हालांकि भारत को इस सिलसिले में अंतरराष्ट्रीय दबावों का सामना करना पड़ सकता है, जैसा कि उक्त अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद अमेरिका द्वारा दी गई चेतावनी से जाहिर है। गौरतलब है कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध जारी कर रखे हैं। बहरहाल, इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) और ईरान के पोर्ट ऐंड मेरीटाइम आर्गेनाइजेशन (पीएमओ) के बीच हुआ अनुबंध भारत की रणनीतिक और भू-राजनीतिक सफलताओं में एक मील का पत्थर साबित होगा, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है। 

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