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विश्लेषण: कुछ लोग खुश हैं, लेकिन अब भी आर्थिक वृद्धि के लाभ से वंचित है बड़ी आबादी

Sun, 07 Jan 2024 06:48 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 07 Jan 2024 06:48 AM IST
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सार
पिछले दिनों मैंने कई लेख पढ़े कि हर आदमी खुश है, क्योंकि देश में अभूतपूर्व आर्थिक विकास हुआ है। मैं नहीं कहता कि आर्थिक वृद्धि नहीं हुई है, पर यह वृद्धि अभूतपूर्व नहीं है और इसका लाभ भी बड़ी आबादी को नहीं मिल पाया है।
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India economic growth and claims of happiness among people but majority of population not able to get benefit
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

वर्ष 2024 का पहला कॉलम होने के कारण सबसे पहले मैं नए साल की शुभकामनाएं व्यक्त करता हूं। खुशी दरअसल विभिन्न चीजों का मिश्रण है। इस देश के अलग-अलग हिस्सों को मिलाकर लगभग 142 करोड़ लोग रहते हैं और मेरी चिंता यह है कि इनमें से कितने लोग सुखी हैं और कितने लोग सुखी नहीं हैं। पिछले दिनों मैंने कई लेख पढ़े, जो सरकार के इस दावे को मजबूती प्रदान करती थी कि हर आदमी खुश है। उन लेखकों का दावा है कि लोग खुश इसलिए हैं, क्योंकि देश में अभूतपूर्व आर्थिक विकास हुआ है, जिसका लाभ हर क्षेत्र के लोगों को मिल रहा है। मैं यह नहीं कहता कि आर्थिक वृद्धि नहीं हुई है, लेकिन निश्चित तौर पर यह वृद्धि अभूतपूर्व नहीं है।



आर्थिक वृद्धि का सुनहरा दौर तो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में 2005 से 2008 की तीन वर्षों की वह अवधि में था, जब अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर क्रमश: 9.5, 9.6  और 9.3 फीसदी सालाना थी। जबकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री काल के पिछले नौ वर्षों में औसत वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत रही है। अगर मौजूदा वित्त वर्ष में 6.5  फीसदी की अनुमानित वृद्धि दर को भी इसमें जोड़ लें, तो औसत वृद्धि दर 5.8 प्रतिशत होगी। यह वृद्धि दर न तो अभूतपूर्व है और न ही शानदार। यह संतोषजनक वृद्धि दर है, लेकिन न तो सुदूरप्रसारी है और न ही पर्याप्त।


खुशहाल लोग
सरकार की आर्थिक नीति प्रत्यक्ष करों को कम रखने, अप्रत्यक्ष करों को ज्यादा व दबाव भरा बनाए रखने तथा वर्चस्ववादी उपायों का मिला-जुला स्वरूप है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह और हवाई अड्डे जैसे ढांचागत क्षेत्रों में पूंजी निवेश ज्यादा है, जबकि शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा में आवंटन कम है, और महिला विकास जैसे कुछ क्षेत्रों में सब्सिडी की सुविधा है। ऐसे में, संतोषजनक वृद्धि दर ने समाज के कुछ क्षेत्रों को खुश किया है। मैं इन संतुष्ट क्षेत्रों के बारे में बता सकता हूं। ये हैं :  बड़े और मध्यम आकार के कॉरपोरेट्स,  मोटी आय वाले लोग, बैंकर्स, शेयर बाजार के निवेशक, व्यापारी और दलाल, नीलामी की वस्तुएं खरीदने वाले, सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स, बड़े व्यापारी और जज, चार्टर्ड अकाउंटेंट, डॉक्टर तथा वकील, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, धनी किसान और साहूकार।

स्याह पक्ष
इस तस्वीर का स्याह पक्ष यह है कि इसमें कई क्षेत्रों के लोग पीछे छूट गए हैं-कुछ क्षेत्रों के लोग तो गिनती में ही नहीं हैं-और ऐसे तमाम क्षेत्रों को मिला दिया जाए, तो यह बहुत बड़ी आबादी है। इनमें वे 82 करोड़ भारतीय हैं, जिन्हें हर महीने प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम मुफ्त राशन मिलता है। मुफ्त राशन योजना कोई गर्व की चीज नहीं है, जिससे देश की आर्थिक उन्नति या समृद्धि मापी जा सके। मुफ्त राशन योजना दरअसल दूर-दूर तक व्याप्त कुपोषण और कुछ जगहों पर जनता में व्याप्त भूख के बारे में ही बताती है। देश के आधे परिवार चावल या गेहूं खरीद सकने में समर्थ क्यों नहीं हैं? इसका जवाब है कम आय या बेरोजगारी।

सरकार के पास इन दो ज्वलंत मुद्दों का हल निकालने की कोई नीति नहीं है। परिवारों की कम आय का हल निकालने के लिए मनरेगा जैसी एक योजना है। लेकिन इस योजना के प्रति इस सरकार की उपेक्षा बिल्कुल शुरुआत से ही स्पष्ट है। अप्रैल, 2022 से सरकार ने मनरेगा में पंजीकृत कामगारों की सूची से 7.6 करोड़ नाम हटा दिए हैं। मानो यही काफी न हो, पंजीकृत कामगारों में से भी एक तिहाई (यानी 8.9 करोड़) और कुल सक्रिय कामगारों का आठवां हिस्सा ( यानी 1.8 करोड़) आधार केंद्रित भुगतान व्यवस्था लागू होने के कारण मनरेगा के तहत काम करने में असमर्थ हैं। मनरेगा की मदद छिन जाने से इतने सारे परिवारों के इतने लोग किस तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं?  इन लोगों के लिए जीवन यापन बेहद कठिन है, लिहाजा खुशहाल तो ये कतई नहीं हैं।

रोजगार और मुद्रास्फीति के बगैर
देश में एक और बड़ी आबादी खुश नहीं है। ये वे लोग हैं, जिनके पास कोई रोजगार नहीं है। सरकार अब रोजगार सृजन की बात नहीं करती। उसका मानना है कि स्व रोजगार में हो रही वृद्धि की बात कहकर वह लोगों को भुलावा दे सकती है। जिस देश में बच्चे सात से आठ साल तक स्कूलों में, और वह भी बगैर किसी कौशल प्रशिक्षण के गुजारते हैं,  उस देश में स्वरोजगार का एक अर्थ बेरोजगारी भी है। जो स्त्री-पुरुष स्वरोजगार में हैं भी, उनकी आय या मजदूरी नौकरी कर रहे लोगों के वेतन की तुलना में कुल मुद्रास्फीति से कम है। यही नहीं, स्वरोजगार में अन्य कोई सुविधा या सामाजिक सुरक्षा भी नहीं है। हमारे यहां युवा बेरोजगारी की दर 10 फीसदी है, जबकि 25 वर्ष तक की आयु वाले स्नातकों में बेरोजगारी की दर 42 प्रतिशत है। ये लोग खुश तो नहीं ही होंगे।

नाखुश लोगों का एक और वर्ग है। ये लोग मुद्रास्फीति के मारे हुए हैं। इस श्रेणी में शीर्ष के उन 10 फीसदी लोगों को छोड़कर, जिनके पास देश की कुल संपत्ति का 60 फीसदी है और जो राष्ट्रीय आय का 57 प्रतिशत कमाते हैं, देश की पूरी आबादी है। वर्ष 2022  में औसत मुद्रास्फीति 6.7 प्रतिशत थी। वर्ष 2023 में साल के चार महीने तक मुद्रास्फीति ने दो से छह फीसदी की ऊपरी सीमा का अतिक्रमण किया। नवंबर, 2023  में मुद्रास्फीति 5.5 प्रतिशत थी। फिलहाल खाद्य मुद्रास्फीति 7.7 फीसदी है। रिजर्व बैंक ने दिसंबर, 2023 के अपने मासिक बुलेटिन में कहा, ‘मुद्रास्फीति लक्ष्य की तुलना में ऊंची रहेगी।’

मुद्रास्फीति के कारण उपभोग और घरेलू बचत में कमी आई है, जबकि परिवारों द्वारा लिया जाने वाला कर्ज बढ़ा है। सरकार ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की अपनी जिम्मेदारी त्याग दी है और यह दायित्व उसने रिजर्व बैंक के मत्थे मढ़ दिया है। गरीबों पर से महंगाई का बोझ हटाने के लिए अप्रत्यक्ष करों में कमी करना भी प्रतिकूल कदम होगा, क्योंकि मुझे संदेह है कि इससे लक्षित राजकोषीय घाटे तक पहुंचने में मदद मिलेगी। मोदी सरकार के दौर में जो सामान्य आर्थिक वृद्धि दर हासिल हुई है, उसका लाभ  भी देश की बड़ी आबादी को नहीं मिल पाया है, क्योंकि मुद्रास्फीति और बेरोजगारी का हल निकालने में सरकार विफल साबित हुई है।

इसके अलावा सरकार की नीति भी ‘अमीरों की, अमीरों द्वारा और अमीरों के लिए’ है। यह नीति भी अमीरों में संपत्ति के केंद्रीकरण तथा एकाधिकार नहीं, तो अल्पाधिकार को तो प्रोत्साहित करती ही है। मेरा मानना है कि नए साल में कुछ लोग खुश रहेंगे, लेकिन देश की बड़ी आबादी नाखुश ही रहेगी।

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