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अक्साई चिन में चीन का एजेंडा

Thu, 09 Jul 2020 08:36 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Thu, 09 Jul 2020 08:36 AM IST
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india china standoff : Chinas agenda in Aksai Chin
गश्त पर निकले भारतीय सेना के जवान। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख की यात्रा की और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर मोर्चे पर तैनात जवानों का हौसला बढ़ाया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि चीन के साथ यह गतिरोध सिर्फ सैन्य झड़प ही नहीं है, बल्कि भारत इसे राजनीतिक रूप से भी गंभीरता से ले रहा है।


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इस बीच, दोनों देशों के उच्च प्रतिनिधियों के बीच बातचीत से यह सहमति बनी है कि दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे से अलग रहेंगी और एलएसी से पीछे हटेंगी। अब सवाल उठता है कि इसका क्रियान्वयन किस हद तक हो सकेगा, क्योंकि चीन 1950 के दशक से ही अपनी बड़ी महत्वाकांक्षा के लिए इस क्षेत्र पर नजर गड़ाए हुए है। इसे समझने के लिए हमें इतिहास से सबक लेना होगा।

पिछले सत्तर वर्षों से अक्साई चिन में चीन की मौजूदगी हम सबको ज्ञात है। दरअसल चीन तीन कारणों से अक्साई चिन को नियंत्रित करना चाहता है। पहला कारण है, चीन के दो दूर, मगर अशांत क्षेत्रों-काशगर (सिंकियांग) से ल्हासा (तिब्बत) के बीच सड़क संपर्क। दूसरा कार इस क्षेत्र का पानी और झीलें हैं, जो चीन को अपने नागरिकों के लिए चाहिए, क्योंकि पानी के अन्य स्रोत लोप नोर में चीनी परमाणु परीक्षण के कारण प्रदूषित हो चुके हैं।

तीसरा कारण है, यूरेनियम जैसे वहां के विशाल खनिज संसाधन, जिनका सबसे पहले रूस ने खनन किया था और अपना परमाणु बम बनाने के लिए उपयोग किया था; ऐसा तब तक हुआ, जब तक कि स्टालिन ने अपने अमेरिका विरोधी गठबंधन से जोड़ने के लिए उस क्षेत्र को माओ को सौंप नहीं दिया। इस तरह से चीनी सेना 1950 के दशक में अक्साई क्षेत्र में चली गई और तब से वहीं टिकी है, जबकि पंडित नेहरू की सरकार ने सेना को बताया था कि भारत को एकमात्र खतरा पाकिस्तान से है। वह कहते थे कि चीन को कूटनीति के जरिये संभाला जा सकता है। इस साल मई तक साउथ ब्लॉक में यही विश्वास था। केवल गलवां क्षेत्र में हालिया झड़पों ने भारतीय कूटनीति की सीमाओं के बारे में भारत सरकार को जगा दिया है।

यह स्वीकार करना यथार्थवादी होगा कि तिब्बत से दलाई लामा के पलायन और भारत में उनके निर्वासन ने चीन-भारतीय संबंधों को नाटकीय रूप से बदल दिया। हालांकि 1950 के दशक की शुरुआत में चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद भी पंडित नेहरू और उनके वफादारों ने भारत के लिए चीन के बढ़ते क्षेत्रीय खतरे को मानने से इनकार कर दिया। वास्तव में 29 अप्रैल, 1954 को भारत सरकार ने चीन के तिब्बत क्षेत्र के साथ व्यापार और तालमेल पर एक आठ-वर्षीय समझौता किया था। इस समझौते के शीर्षक ने औपचारिक रूप से घोषित किया कि तिब्बत चीन का एक हिस्सा था।

इस समझौते में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत (पंचशील) भी शामिल थे। लेकिन चीन ने अंततः इन प्रयासों को नजरअंदाज किया, हालांकि पंडित नेहरू ने चार मई, 1959 को भारतीय संसद को बताया कि भारत की चीन के प्रति नीति अपरिवर्तित है और वह संयुक्त राष्ट्र में चीन के प्रवेश का समर्थन जारी रखेगा। इसके अलावा, एक जुलाई, 1959 को नेहरू ने घोषणा की कि नई दिल्ली तिब्बती सरकार के प्रमुख के रूप में दलाई लामा को मान्यता नहीं देगी और तिब्बत चीन का हिस्सा है। लेकिन यह सब चीन के लिए पर्याप्त नहीं था, वे और अधिक क्षेत्र चाहते थे।

अक्तूबर, 1958 से जब हिमालय पर सीमा को लेकर भारत और चीन ने अलग-अलग दावे किए, तो सीमा विवाद भारत में सार्वजनिक चिंता का विषय बन गया। यह खबर आई कि चीन ने सिंझियांग को तिब्बत से जोड़ने के लिए अक्साई चिन होते हुए 180 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई है। ऐतिहासिक रूप से अक्साई चिन लद्दाख का हिस्सा है, जिसे भारत अपना मानता है। भारत का यह दावा 1913-14 में ब्रिटिश सरकार और तिब्बत सरकार के बीच हुए शिमला समझौते पर आधारित था। लेकिन चीन की माओ त्से तुंग सरकार ने भारतीय दावे वाले किसी नक्शे को मानने से इनकार कर दिया। यही मामला अब भी है और चीन एलएसी व सिक्किम में अतिक्रमण करता है।

हालांकि हमारी स्थिति अब वह नहीं है, जो 1962 में थी, लेकिन निकट अतीत के अनुभवों से सबक लेना समझदारी होगी। भारत की आजादी के बाद से हमारी सीमाओं के जिन इलाकों (पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चिन) में पाकिस्तान और चीन ने घुसपैठ की, उन इलाकों को उन्होंने खाली नहीं किया है।

अब यह मान लिया गया है कि दो देशों के बीच विवादित कोई भी इलाका, जिस पर जवानों का कब्जा नहीं है, मौका मिलते ही चीन उस पर कब्जा कर लेता है, क्योंकि वह यथास्थिति बनाए रखने का सम्मान नहीं करता है। इसके अलावा चीन की क्षेत्रीय महात्वाकांक्षाएं हममें से उन लोगों को मालूम थीं, जो चीन का अध्ययन करते थे। दुर्भाग्य से भारत का सत्ता प्रतिष्ठान बाहरी लोगों की सलाह और इतिहास से सबक लेने से इनकार करता रहा है।

चीन की वापसी की बात भारत के लोगों को अच्छी लग सकती है, खासकर जो लोग इस बात के लिए चिंतित थे कि सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाए। लेकिन गलवां घाटी के उत्तर में देपसांग के मैदानी इलाकों के जरिये काराकोरम दर्रे पर चीन की घुसपैठ से सावधान रहना होगा।

यह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रमुख परियोजना चीन- पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का मार्ग खोलता है। यदि गलवां घाटी पर चीन का नियंत्रण हो जाता है, तो देपसांग मैदान (लेह के उत्तर में) चीनी द्वारा बनाए सक्षम घाटी के मार्ग को बहुत छोटा कर देगा (उबड़-खाबड़ इलाके से होकर 1800 किलोमीटर से भी कम दूरी), जिसे चीन ने पहले हड़प लिया और फिर पाकिस्तान ने अस्थायी रूप से उसे बीजिंग को उपहार में दे दिया।

यह घाटी हालांकि रहने लायक नहीं है, लेकिन यहां ग्लेशियरों (252 से ज्यादा) का भंडार है, जिसे चीन वैश्विक वर्चस्व के लिए पानी का स्रोत मानता है। चीन को माइक्रोचिप्स और सिलिकॉन वेफर्स बनाने के लिए पानी की भारी जरूरत होती है और वह 1950 के दशक से ही लद्दाख और कश्मीर के पानी पर नजर गड़ाए हुए है।

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