वोट चोरी से रामलीला मैदान तक, विपक्ष की पूरी रणनीति क्या है?
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विस्तार
पहले दिल्ली में मार्च, फिर मॉक संसद और अब रामलीला मैदान में विपक्षी दलों के जमावड़े के जरिये कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ विरोध की एक लहर पैदा करने और 'मोदी बनाम सभी' का आख्यान गढ़ने की कोशिश की है। जाहिर है, इस पूरी कवायद का मकसद केवल चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराना नहीं, बल्कि विपक्ष की संयुक्त राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन करना भी है। कांग्रेस लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठा रही है।
मताधिकार से वंचित लोगों की ओर से व्यापक विरोध क्यों नहीं?
कभी ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर संदेह जताया गया, तो कभी वीवीपैट की पर्चियों के मिलान और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठे। अब एसआईआर को लेकर 'वोट चोरी' का आरोप लगाया जा रहा है। लेकिन यहां विपक्ष के लिए कुछ सवाल भी हैं। जिन राज्यों में मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने का आरोप है, वहां अब तक मताधिकार से वंचित लोगों की ओर से व्यापक विरोध क्यों दिखाई नहीं दिया है? यह मान भी लिया जाए कि ऐसे असंतोष को सामने आने में समय लगता है, तब भी क्या विपक्षी दलों की तरफ से प्रभावित मतदाताओं को संगठित करने की कोई ठोस पहल हुई ?
देश के चार राज्यों में हाल में हुए विधान परिषद चुनावों के नतीजों को अगर जनमत का एक नमूना माना जाए, तो मतपत्रों के जरिये हुए इन चुनावों से भी ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता, जिससे लगे कि मतदाता पूरी तरह विपक्ष के साथ खड़े हैं।
निष्पक्षता सुनिश्चित करना साझा दायित्व
यह भी ध्यान देने योग्य है कि चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाने के बावजूद कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अलग-अलग राज्यों में चुनावी सफलताएं मिली हैं। इससे यह सवाल जरूर उठता है कि यदि व्यवस्था पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है, तो विपक्ष की चुनावी सफलताओं की व्याख्या कैसे की जाए? इन अंतर्विरोधों के पीछे झांकने की जरूरत है। दरअसल, चुनावी प्रक्रिया में सुधार और उसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करना किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि सभी दलों और संस्थाओं का साझा दायित्व है।
मॉक संसद और सांकेतिक महाभियोग जैसी कवायदें राजनीतिक विरोध का एक तरीका
चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता और संवाद के जरिये भरोसा मजबूत करना चाहिए, वहीं विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने रखने चाहिए। मॉक संसद और सांकेतिक महाभियोग जैसी कवायदें राजनीतिक विरोध का एक तरीका हो सकती हैं, लेकिन उन्हें तथ्यों और सुधार की स्पष्ट रूपरेखा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। आखिरकार, चुनावी लोकतंत्र की मजबूती केवल निष्पक्ष मतदान से नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में सभी पक्षों के भरोसे से सुनिश्चित होती है।