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विपक्ष को खत्म करने की दिशा में
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नवाज एवं जरदारी
पाकिस्तान क्या एक दलीय शासन की तरफ बढ़ रहा है? घटनाएं यहां बड़ी तेजी से बदल रही हैं। सरसरी नजर डालें, तो साफ दिखता है कि बड़ी पार्टियों के नेताओं को या तो सलाखों के पीछे डाल दिया गया है, या उन्हें नजरबंद किया गया है या उनकी गिरफ्तारी की तैयारी दिखती है। जियाउल हक द्वारा थोपे गए मार्शल लॉ के अंधेरे दिनों के बाद पाकिस्तान के राजनीतिक क्षितिज पर दो बड़ी पार्टियां उभरीं। पहली, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और दूसरी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन)।
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तीसरी बड़ी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) है, जो इन दिनों सत्ता में है। लेकिन इसे संसद में मामूली बहुमत हासिल है। यह महज छह सीटों के बहुमत से सत्ता चला रही है। जिस तरह से घटनाएं सामने आ रही हैं, उससे ऐसी व्यवस्था बनाने के बारे में पता लगता है, जिसमें दोनों विपक्षी पार्टियों-पीपीपी और पीएमएल-एन को, धीरे-धीरे ही सही, लेकिन निश्चित रूप से सियासत से बाहर किया जा रहा है।
ऐसा मालूम होता है कि सरकार बड़ी हड़बड़ी में है। लेकिन विपक्षी नेताओं को सियासत से हटाने के लिए इस तरह की सियासी इंजीनियरिंग भारी अस्थिरता ही पैदा करेगी। जवाबदेही निष्पक्ष होनी चाहिए और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
पीएमएल-एन के नेता नवाज शरीफ पहले से ही भ्रष्टाचार के मामले में सात साल जेल की सजा काट रहे हैं। कुछ महीने पहले जब नवाज शरीफ को पार्टी का नेतृत्व करने से अयोग्य करार दिया गया, तब उनके छोटे भाई शहबाज शरीफ ने पार्टी की कमान संभाली, लेकिन वह भी फिलहाल नेशनल एकाउंटिबिलिटी ब्यूरो की हिरासत में हैं, क्योंकि उन पर भी भ्रष्टाचार का आरोप है और उनके मामले की जांच चल रही है। नवाज शरीफ अकेले पाकिस्तानी राजनेता हैं, जो तीन बार प्रधानमंत्री चुने गए। दोनों भाई फिलहाल लाहौर की कोट लखपत जेल में सलाखों के पीछे हैं। पहले माना जाता था कि नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज शरीफ पार्टी की कमान संभालेंगी, लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में जेल से जमानत पर बाहर होने के बाद से वह चुप हैं। जब तक अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में जीत नहीं जातीं, ऐसा नहीं लगता कि वह पार्टी का नेतृत्व करने के लिए सार्वजनिक रूप से सामने आएंगी।
उधर पीपीपी के मुखिया आसिफ अली जरदारी के खिलाफ अदालत में गंभीर मामले चल रहे हैं। वह और उनकी बहन फरयाल तालपुर भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में कोई यह सोच सकता है कि बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं। पर आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के ताजा मामलों में बिलावल भुट्टो का नाम भी है। यह लगभग वैसा ही है, जैसे दो प्रमुख विपक्षी दलों को सियासत से हटाने की योजना हो, ताकि कोई नेता जेल से बाहर न रहे।
पाकिस्तानी भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं, और यह दिलचस्प है कि इन दोनों राजनीतिक दलों के प्रमुखों के खिलाफ आरोप तय किए जा चुके हैं या उन्हें पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है, लेकिन सड़कों पर कोई आंदोलन नहीं है। इसका पहला कारण तो यह है कि कोई नेता ऐसा नहीं बचा है, जो पार्टी कार्यकर्ताओं को आंदोलन के लिए प्रेरित कर सके, और दूसरा कारण यह है कि इन नेताओं के लिए जनता कोई सहानुभूति महसूस नहीं कर रही। सवाल यह है कि क्या ये पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने में सक्षम होंगी।
वंशवादी राजनीति की वजह से पीटीआई को छोड़कर कोई भी पार्टी उभरने में सक्षम नहीं है। मुख्यधारा की दोनों पार्टियों-पीपीपी और पीएमएल-एन ने अपने कार्यकर्ताओं को आगे नहीं बढ़ने दिया और पार्टी को सख्ती से पारिवारिक सदस्यों के दायरे में ही रखा। पीटीआई ने कई अवसरों पर कहा कि नवाज शरीफ और आसिफ अली जरदारी का राजनीतिक जीवन पूरी तरह से खत्म हो गया है और वे फिर कभी चुनाव नहीं लड़ सकते।
सिंध विधानसभा में पहले से ही पीटीआई की पहल पर फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से गठबंधन बनाने का दबाव है, क्योंकि पीपीपी के मुख्यमंत्री को भी शीघ्र ही भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ेगा। यह एक खतरनाक स्थिति है, क्योंकि पीटीआई अपने सहयोगी दलों के साथ सिंध विधानसभा में पीपीपी सरकार को हटा सकती है। इस तरह से केंद्र, खैबर पख्तुनख्वा और पंजाब में पीटीआई की सरकार हो जाएगी।
इस नए वर्ष 2019 में पाकिस्तान में बड़े बदलाव हो सकते हैं। इसी महीने के मध्य में पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे। उन्होंने सेना और पीटीआई का खुलकर समर्थन किया, उनके कई फैसले विवादास्पद रहे और उन पर न्यायिक सक्रियता का आरोप भी लगा।
इस वर्ष सेना प्रमुख जनरल बाजवा भी अपने पद से हट जाएंगे। लेकिन सेना में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है, क्योंकि सेना हमेशा सांस्थानिक नीतियों के अनुसार चलती है, किसी जनरल के अनुसार नहीं। कभी-कभी कोई नया प्रमुख कुछ नए विचारों की तलाश करता है और हो सकता है कि नए प्रधान न्यायाधीश और नए सेना प्रमुख की प्राथमिकताएं अलग-अलग हों।
बेशक कोई कितनी भी कोशिश करे, लेकिन पाकिस्तान में एक दलीय शासन थोपना मुश्किल होगा। यह राजनीतिक विविधताओं वाला मुल्क है। पिछले 71 वर्ष के इतिहास में दशकों तक चली तानाशाही भी विभिन्न राजनीतिक पार्टियों को खत्म नहीं कर सकी और जैसे ही मार्शल लॉ हटाया गया, दर्जनों राजनीतिक पार्टियां सामने आईं। इमरान खान ने हाल ही में मीडिया को बताया कि नए सिरे से चुनाव कराने की संभावना है। इसने पूरे मुल्क को हैरान कर दिया, क्योंकि किसी भी पदासीन प्रधानमंत्री ने सरकार गठन के एक साल पूरा होने से पहले चुनाव में जाने की बात नहीं की है। क्या इमरान खान यह सोचते हैं कि मुख्य विपक्षी पार्टियों के नेताओं के संकट में होने पर वह चुनाव में दो तिहाई बहुमत हासिल कर लेंगे और केंद्रीकृत शासन करेंगे? पाक सत्ता प्रतिष्ठान चाहे जितनी भी कोशिश कर ले, एक दलीय शासन का बड़े पैमाने पर विरोध होगा।