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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Important to know: Shiva-Parvati's marriage took place with the help of sage; Learn from the pages of culture

जानना जरूरी है: ऋषि के सहयोग से हुआ शिव-पार्वती का विवाह; संस्कृति के पन्नाें से जानें

Sun, 02 Jun 2024 05:39 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 02 Jun 2024 05:39 AM IST
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सार
भगवान शिव अगस्त्य मुनि का दुख समझ रहे थे। उन्होंने अगस्त्य को रोककर कहा, ‘महर्षि! आप कष्ट उठाकर विवाह में सम्मिलित होने आए हैं। इसलिए मैं आपको वचन देता हूं कि आप पर्वत के दक्षिणी छोर से भी विवाह का पूरा अनुष्ठान देख पाएंगे। इतना ही नहीं, भविष्य में जब कभी आप मेरा और देवी पार्वती का स्मरण करेंगे, तो हम आपके समक्ष प्रकट हो जाएंगे।’
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Important to know: Shiva-Parvati's marriage took place with the help of sage; Learn from the pages of culture
Lord Shiva and Parvati sculpture painting on wall - फोटो : Freepic

विस्तार

हिमवान और मैना की पुत्री पार्वती बड़ी हुईं, तो उन्होंने भगवान शिव से विवाह करने का प्रण कर लिया। माता-पिता ने बहुत समझाया कि शिव योगी हैं, लेकिन पार्वती ने हठ नहीं छोड़ा। आखिर पुत्री की खुशी के लिए हिमवान ने विवाह के लिए सहमति प्रदान कर दी। परंतु शिव को पाना सरल नहीं था। इसलिए पार्वती ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप आरंभ कर दिया। आखिर, शिव ने प्रसन्न होकर पार्वती को दर्शन दिए और उनसे विवाह करना भी स्वीकार कर लिया। उस दिव्य विवाह-समारोह में सम्मिलित होने के लिए हिमालय के उच्च शिखर पर स्थित स्वर्ग और पृथ्वी पर रहने वाले अनेक ऋषि-मुनि, देवी-देवता, यक्ष, नाग, किन्नर, गंधर्व, आदि एकत्र होने लगे।



विवाह पर्वत-शिखर के उत्तरी छोर पर होना था। नियत समय पर विवाह-स्थल पर इतने लोग जमा हो गए कि उनके संयुक्त आध्यात्मिक भार से पर्वत हिलने लगा। फिर भी अतिथियों का आगमन नहीं थमा। एक समय आया, जब पर्वत एक ओर से झुकने लगा। ऋषि-मुनि एवं देवता घबराकर महादेव शिव की शरण में पहुंचे और उनसे सहायता मांगने लगे। देवताओं ने भगवान शिव से कहा, ‘महादेव! अतिथियों के आध्यात्मिक भार से हिमालय का उत्तरी छोर नीचे की ओर झुक रहा है। अब आप ही कुछ कीजिए, अन्यथा यह पर्वत पलट जाएगा और धरती पर प्रलय आ जाएगी।’ शिव बोले, ‘हिमालय के दक्षिणी छोर पर उत्तरी छोर के बराबर आध्यात्मिक भार हो जाए, तो पर्वत फिर से स्थिर हो जाएगा।’‘परंतु हम सबके बराबर का आध्यात्मिक भार आएगा कहां से?’ देवताओं ने पूछा। ‘चिंता न करें,’ शिव ने मुस्कराते हुए कहा। ‘इस समस्या का निवारण करने महर्षि अगस्त्य आने ही वाले हैं।’


देवता और ऋषि-गण सोचने लगे कि अकेले अगस्त्य के आने से पर्वत कैसे संतुलित होगा। इसी बीच, उन्होंने देखा कि सामने से छोटे कद के गोल-मटोल महर्षि अगस्त्य धीमी गति से चले आ रहे थे। अगस्त्य के निकट पहुंचते ही शिव बोले, ‘महर्षि, मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। हमें आपसे सहायता चाहिए।’ ‘आदेश कीजिए, प्रभु!’ अगस्त्य ने हाथ जोड़कर कहा। ‘असंख्य ऋषि-मुनि, देवतागण हिमालय के उत्तरी छोर पर एकत्र हो गए हैं। इन सबके आध्यात्मिक भार के कारण हिमालय का उत्तरी छोर नीचे झुक रहा है। अब आप ही पर्वत को संतुलित कर सकते हैं।’ ‘वह कैसे?’ अगस्त्य को आश्चर्य हुआ। शिव मुस्कराए और बोले, ‘महर्षि आपका आध्यात्मिक ज्ञान, यहां उपस्थित सबके संयुक्त आध्यात्मिक ज्ञान के बराबर है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि आप हिमालय के दक्षिणी छोर पर चले जाएं, ताकि पर्वत स्थिर हो जाए और विवाह निर्विघ्न संपन्न हो सके।’

अगस्त्य दुविधा में पड़ गए। वह बोले, ‘प्रभु, मैं तो विवाह में भाग लेने आया हूं। दक्षिणी छोर पर चला गया, तो इस दिव्य समारोह से वंचित रह जाऊंगा।’ शिव ने फिर कहा, ‘महर्षि, यदि आप भी उत्तरी छोर पर ही उपस्थित रहेंगे, तो आज पर्वत निश्चित रूप से पलट जाएगा। यदि ऐसा हो गया, तो विवाह होना तो दूर की बात है, प्रलय आ जाएगी! इसलिए आपका दक्षिणी छोर पर जाना बहुत आवश्यक है।’ महादेव ने स्वयं अगस्त्य से जाने को कह दिया, तो बेचारे महर्षि क्या करते! उन्होंने निराश होकर शिव के सामने हाथ जोड़े और ‘जैसी प्रभु की आज्ञा’ कहकर हिमालय के दक्षिणी छोर की ओर चल पड़े।

भगवान शिव अगस्त्य मुनि का दुख समझ रहे थे। उन्होंने अगस्त्य को रोककर कहा, ‘महर्षि! आप कष्ट उठाकर विवाह में सम्मिलित होने आए हैं। इसलिए मैं आपको वचन देता हूं कि आप पर्वत के दक्षिणी छोर से भी विवाह का पूरा अनुष्ठान देख पाएंगे। इतना ही नहीं, भविष्य में जब कभी आप मेरा और देवी पार्वती का स्मरण करेंगे, तो हम आपके समक्ष प्रकट हो जाएंगे।’
यह सुनकर महर्षि अगस्त्य का उदास मुखमंडल फिर से खिल उठा। वह प्रसन्न मुद्रा में हिमालय पर्वत के दक्षिणी छोर पर चले गए। उनके दक्षिणी छोर पर जाते ही पर्वत, दक्षिण की ओर झुकते-झुकते आखिरकार फिर से संतुलित हो गया। विवाह संपन्न हो जाने तक अगस्त्य ने अपने स्थान पर ही रहकर शिव के वरदानस्वरूप मिली दिव्य-दृष्टि से विवाह-समारोह का आनंद लिया। इस तरह, अगस्त्य मुनि के आध्यात्मिक सहयोग के बाद ही भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह संपन्न हो पाया।

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