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जलवायु परिवर्तन: बदलते मौसमी दौर में खेती, व्यापक है ऋतु चक्र में बदलाव का असर
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बारिश से फसल बर्बाद (फाइल फोटो)
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अमर उजाला
विस्तार
जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन का दुनिया भर में कृषि पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है। जलवायु में आने वाले परिवर्तन से न सिर्फ कृषिगत उत्पादन की मात्रा प्रभावित हुई है, बल्कि उसकी गुणवत्ता में भी कमी आई है। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और इससे अपनी जीविका चलाने वाले लोगों पर पड़ा है। कृषि के प्रभावित होने से दुनिया भर में अरबों परिवार खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं।
चिंताजनक बात है कि शहरीकरण में आई तेजी के कारण जहां एक तरफ कृषि भूमि का रकबा सिमटता जा रहा है, वहीं ग्लोबल वार्मिंग के कारण संपूर्ण आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त पोषण और गुणवत्ता वाले खाद्यान्न उत्पादन की धरती की क्षमता भी कम होती जा रही है। मानसून की अनियमितता और जल स्रोतों के सूखने से फसल की पैदावार प्रभावित हो रही है।
खाद्य उत्पादन में कमी होने से खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी होती है, जिससे एक बड़ा वर्ग जरूरी पोषण से वंचित हो जाता है और कुपोषण तथा भुखमरी की समस्या विकराल हो जाती है। जलवायु परिवर्तन से कृषि के साथ-साथ पशुपालन और मत्स्य पालन भी प्रभावित होता है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के कारण राष्ट्रीय आय में कमी आती है।
दरअसल, लंबे समय तक कठोर मौसम या एकाएक आने वाली प्राकृतिक आपदाएं फसलों को लील लेती हैं। इससे एक तरफ किसानों की मेहनत व्यर्थ हो जाती है, तो दूसरी तरफ खाद्य सुरक्षा का संकट गहराने लगता है। जलवायु परिवर्तन का कृषि उत्पादन में सहयोगी तत्वों की स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मिट्टी, पानी, हवा और नमी की स्थिति को स्थानीय जलवायु प्रभावित करती है। अतिवृष्टि या अनावृष्टि के कारण मृदा का क्षरण होता है, जिससे वह बंजर होने लगती है। जलस्रोतों के सूखने से फसलों का उत्पादन तो प्रभावित होता ही है, कृषि-मित्र कीटों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है।
अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण 2050 तक वैश्विक खाद्य पैदावार में 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। जलवायु परिवर्तन और कृषि संबंधी गतिविधियां आपस में जुड़ी हुई हैं। जलवायु परिवर्तन खेतों को नष्ट कर देता है। अतः बड़ी संख्या में किसान परिवार खेती छोड़ नए काम की तलाश में पलायन करने को मजबूर होते हैं।
पशुपालन को भी जलवायु परिवर्तन प्रभावित करता है। वातावरणीय तापमान में तीव्र परिवर्तन से जानवरों का स्वास्थ्य, प्रजनन, पोषण आदि भी प्रभावित होता है, जिससे पशु-उत्पाद तथा इनकी गुणवत्ता में भी गिरावट आती है। तापमान में वृद्धि, बाढ़, ठंड और तेज हवा आदि जानवरों के स्वास्थ्य, शारीरिक वृद्धि और उत्पादकता को प्रभावित करती हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण जानवरों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है और वे अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पाते हैं। तापमान में वृद्धि से सूखे और अत्यधिक वर्षा के समय चरागाह का विकास भी प्रभावित होता है, जिससे जानवरों के पोषण में बाधा आती है। कृषि उत्पादन प्रभावित होने से भी जानवरों को खिलाए जाने वाले फसल अवशेष में कमी आ जाती है। ऐसे में कई जानवर पोषण में कमी, बीमारी से जूझते हैं, जिससे उनकी जीवन प्रत्याशा कम हो जाती है और ऐसे पशुओं को पालना किसानों के लिए फायदेमंद नहीं होता है।
जाहिर है, एक कृषि-प्रधान देश में जलवायु परिवर्तन उस राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने का काम करता है। कृषिगत उत्पादन प्रभावित होने से एक बड़ी आबादी रोजगार विहीन हो जाती है। उत्पादन कम होने से राष्ट्र के समक्ष खाद्य असुरक्षा के बादल घिर जाते हैं, जिससे गरीबी, कुपोषण और भुखमरी का संकट गहराने लगता है। मौसमी संकट से कृषि को महफूज रखने के लिए एक तरफ जहां जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाना आवश्यक है, वहीं दूसरी तरफ स्मार्ट कृषि, मृदा की गुणवत्ता का ख्याल रखने, सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर और ड्रिप पद्धति का प्रयोग करने और भोजन की बर्बादी रोकने की दिशा में भी ठोस पहल की दरकार है।