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तो नरेंद्र मोदी भी उसी राह पर चल रहे

Sun, 21 Aug 2016 05:23 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 21 Aug 2016 05:23 PM IST
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If Narendra Modi too on old path
तवलीन सिंह

लाल किले के प्राचीर से अपने भाषण में इस बार प्रधानमंत्री ने एक ऐसी बात कही, जिसे सुनने के बाद मुझे लगा कि वह अपनी ही पुरानी बातें भूल गए हैं। नरेंद्र मोदी कभी कहा करते थे सरकार को बिजनेस नहीं करना चाहिए। मेरे जैसे लोगों को उनकी यह बात अच्छी लगती थी, क्योंकि अरसे से राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर लिखते हुए मुझे समझ में आया कि सरकारी अधिकारियों ने समाजवाद के नाम पर अगर व्यापार न किया होता, तो आज भारत एक समृद्ध देश होता। आज भी भारत की गिनती गरीब देशों में होती है, तो इसलिए कि 1947 में जिस प्रधानमंत्री के हाथ में हमने देश की बागडोर सौंपी थी, वह मानते थे कि गरीबी हटाने का एक ही रास्ता है कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में रहे।

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पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बड़े-बड़े सरकारी कारखानों में देश का धन तो निवेश किया ही, निजी उद्योगों को बंद करने का भी काम किया। इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं, तब उन्होंने लाइसेंस-कोटा राज के जरिये इस काम को और आगे बढ़ाया। उस दौर में निजी कारखाने अगर कोटे से अधिक उत्पादन करते थे, तो उन्हें जुर्माना भरना पड़ता था। इन आर्थिक नीतियों से न गरीबी हटी, न संपन्नता आई। सो, बहुत उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी के आने से सरकारी उद्योगों का निजीकरण शुरू होगा। लेकिन जब उन्होंने इस बार लाल किले के प्राचीर से घोषित किया कि वह सरकारी उद्योगों को मुनाफे में लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो मुझे मायूसी हुई। एयर इंडिया के बारे में उन्होंने कहा के पिछले वर्ष इस कंपनी ने मुनाफा दिखाया है। प्रधानमंत्री क्या भूल गए हैं कि पिछले कई वर्षों से इस सरकारी कंपनी का घाटा 40,000 करोड़ रुपयों से ज्यादा है? एक वर्ष अगर मुनाफा दिखा भी, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
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पिछली सरकार जिस आर्थिक रास्ते पर चल रही थी, मोदी सरकार उसी का अनुकरण कर रही है। अनुमान है कि 2004 से 2016 के बीच सरकारी उद्योगों में 55,000 करोड़ रुपये निवेश हुए हैं। इसके बावजूद इन उद्योगों का घाटा 34,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। ऐसा क्यों होने दे रहे हैं मोदी? यह सवाल जब मैंने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उठाया, तो पता चला कि प्रधानमंत्री और आला अधिकारी वामपंथी राजनेताओं की बातों में आ गए हैं। ये लोग बड़ी चतुराई से देश का भला करने की बातें करते हैं, लेकिन इस बहाने अपना भला करते हैं।
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अब अशोक होटल को ही ले लीजिए। इस समूह के तमाम होटल घाटे में चलते हैं, जबकि निजी होटल खूब मुनाफा कमाते हैं। ऐसे में, मोदी सरकार अपने होटलों को बेचने की कोशिश क्यों नहीं कर रही? इसलिए कि सरकारी होटलों में सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं को हर तरह का लाभ मिलता है। हम इस तरह कब तक जनता के पैसे को बर्बाद होने देंगे? कब तक ऐसी समाजवादी नीतियां बर्दाश्त की जाएंगी, जिसमें जनता के लिए आवास तक उपलब्ध नहीं कराया जा सका है, लेकिन जनप्रतिनिधियों के लिए लुटियंस की दिल्ली में और दूसरे राज्यों की राजधानियों में भी महलनुमा कोठियां उपलब्ध कराई जाती हैं? जबकि अदालत कह चुकी है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी कोठियां मुहैया कराना असंविधानिक है। बहुत उम्मीदें थी नरेंद्र मोदी से कि वह इन गलत परंपराओं को बंद कर देंगे, और जनता का पैसा उनमें निवेश करने का काम करेंगे, जिनसे जनता को लाभ हो। लेकिन अब उम्मीदों की जगह वही पुरानी मायूसी ले रही है।

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