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क्या उत्तर प्रदेश में भाजपा का कल्याण होगा

Fri, 08 Jan 2016 07:12 PM IST
शीतला सिंह
शीतला सिंह Updated Fri, 08 Jan 2016 07:12 PM IST
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If kalyan singh lead bjp in UP

राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के, जो दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं, अपना 84वां जन्मदिन मनाने के लिए उत्तर प्रदेश आने को राजनीतिक समीकरणों की खोज के रूप में देखा जा रहा है। प्रश्न यही है कि भाजपा के गिरते हुए ग्राफ को बचाकर क्या वह पार्टी का राजनीतिक कल्याण करने में समर्थ होंगे। कल्याण सिंह कह रहे हैं कि भाजपा का जो निर्देश होगा,भविष्य में वही उनकी प्राथमिकता होगी। यानी पार्टी से भविष्य में अवकाश देने के लिए भले ही उन्हें राज्यपाल बनाया गया हो, पर अभी न तो वह सत्ता के मोह से मुक्त हैं, न राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए सक्रिय राजनीति में आने में उन्हें कोई बाधा है।

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उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की पहचान दो कारणों से है। एक तो वह लोधी समाज के, जिसकी गिनती पिछड़े वर्ग में की जाती है, सशक्त नेता हैं। इसी आधार पर उन्होंने भाजपा से विद्रोह कर अलग दल बनाया और मुलायम सिंह का सहयोग भी प्राप्त किया था। अंत में मुलायम सिंह को जब लगा कि कल्याण सिंह का साथ उन्हें नुकसान पहुंचाने वाला न हो जाए, तो उन्होंने उनसे किनारा कर लिया। अटल बिहारी वाजपेयी के बुलाने पर कल्याण सिंह दोबारा भाजपा में शामिल हुए, पर विद्रोही प्रवृत्ति के होने के कारण उन्हें महत्वपूर्ण पद नहीं सौंपा गया, जबकि शीर्ष नेताओं में उनकी गिनती होती है।
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क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह को ही अपना नेता बनाकर पार्टी का उद्धार करना चाहती है? कल्याण सिंह के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में लोधी 36 विधानसभाओं में प्रभावी भूमिका का निर्वाह करते हैं। उनके पक्ष में अयोध्या और राममंदिर मुद्दा भी माना जाता है। उनके मुख्यमंत्री रहते हुए ही बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, हालांकि उसके बाद के चुनाव में भाजपा के वोट बढ़ने के बजाय घट गए, क्योंकि वृहत्तर हिंदू समुदाय ने इसका समर्थन नहीं किया। उसके बाद भाजपा अकेली सत्ता में नहीं आ सकी।
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नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश से देश में सर्वाधिक 73 लोकसभा सीट जीतकर जो कीर्तिमान स्थापित किया, उसके पीछे राम मंदिर का सांप्रदायिक मुद्दा नहीं, बल्कि युवकों में बेरोजगारी, महंगाई और असंतोष जैसे मुद्दे थे। पर यह नहीं कहा जा सकता कि सत्ता में डेढ़ वर्ष रहने के बाद भी वह उत्तर प्रदेश में अपनी पुरानी शान को बचाने में कामयाब रहे, क्योंकि उपचुनाव और विधान परिषद तथा स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा की वह छवि टूटती दिखी।

ऐसे में, उत्तर प्रदेश में भाजपा अगर कल्याण सिंह के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ती है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि राम मंदिर का मुद्दा क्या अभी जीवित है। क्या यह भविष्य में किसी राजनीतिक लाभ से जुड़ सकता है, क्योंकि राम मंदिर को लेकर लोगों में भावना तो है, पर लोगों का मानना यही है कि भाजपा राजनीतिक लाभ उठाने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करती है और सत्ता में आने के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल देती है।


उत्तर प्रदेश में भाजपा नेतृत्व के सामने प्रमुख प्रश्न यही है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में नायक के रूप में आखिर किसे सामने रखा जाए। संगठन और नेतृत्व के मुद्दे पर भी भाजपा में विभाजन है। ऐसे में, सवाल यह है कि कल्याण सिंह को नेतृत्व सौंपने के मामले में क्या राज्य के पिछड़े नेताओं की सहमति होगी। सवाल यह भी पिछड़े कल्याण सिंह को नेता बनाकर क्या सवर्णों के वर्चस्व वाली भाजपा को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सचमुच लाभ मिलेगा।

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