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मुद्दा: अगर विविधता का उत्सव मनाना हो... तो सभी का आदर जरूरी
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विस्तार
लगभग डेढ़ दशक से अधिक समय से विदेश जाती रही हूं। कई देशों की यात्राएं की हैं। इन यात्राओं में अक्सर महसूस करती हूं कि अगर विविधता देखनी हो, तो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों से अच्छी जगह कोई नहीं है। तमाम तरह के लोग। अनेक भाषाएं बोलते। देशों से इधर-उधर की आवाजाही। अपने देश में विविधता में एकता को सेलिब्रेट करने की बात कही जाती है। इससे ज्यादा एकता क्या होगी कि सब एक ही जगह बैठे हैं, सो रहे हैं, खा-पी रहे हैं। एक ही जहाज में अपने-अपने गंतव्यों की तरफ जाने के लिए बैठे हैं। एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्करा भी रहे हैं। लाइन से आ-जा रहे हैं। जहाज के गेट पर हाथ में बोर्डिंग पास पकड़े, अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कहीं कोई लाइन तोड़ना नहीं, कोई लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद नहीं।
एक बात और भी है कि पहले अनेक देशों की महिलाएं अपने-अपने देश की वेशभूषा में नजर आती थीं। पुरुष तो तब भी शर्ट-पेंट पहनते थे। यानी कि कुछ एक देशों को छोड़कर, पूरे विश्व में पुरुषों का यही पहनावा हो चुका है, लेकिन स्त्रियां कुछ अलग नजर आती थीं। भारत में भी बहुत-सी स्त्रियां साड़ियां पहने दिखती थीं। सलवार-कुर्ता, केरल की स्कर्टनुमा पोशाक भी नजर आती थी।
लेकिन अब हवाई अड्डों या उनके बाहर भी साड़ियां पहने स्त्रियां बहुत कम नजर आती हैं। कुछ साल पहले तक साड़ी किसी आयोजन में पहनने के लिए निकाली जाती थी, लेकिन अब वह भी नहीं रहा। इसकी जगह पहले कुर्ता-सलवार ने ली थी। लेकिन इन दिनों किसी किशोरी और किसी उम्रदराज स्त्री की वेशभूषा में ज्यादा फर्क नहीं दिखता। हालांकि, इसके बारे में यह तर्क दिया जाता है कि कपड़ों का उम्र से कोई वास्ता नहीं होता। अब भारत में स्त्रियों के माथे से बिंदी भी गायब हो गई है। सिंदूर पहले ही गायब हो चुका है। जब से स्त्री के सौंदर्य को बनाने का ठेका तमाम अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य ब्रांड्स ने उठाया है, तब से स्त्री को त्वचा में बदल दिया गया है।
आपको वह विज्ञापन तो याद ही होगा-अरे उसकी त्वचा से तो उसकी उम्र का पता ही नहीं लगता। और इस उम्र को छिपाना है, तरह-तरह के ब्रांड्स का इस्तेमाल करके। यही बात कपड़ों के बारे में भी है। भारत के हवाई अड्डे हों, या अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, 99 प्रतिशत लड़कियां और स्त्रियां वेस्टर्न पहनावे में ही दिखती हैं। यहां तक कि उनके बाल बनाने का तरीका भी लगभग एक जैसा है।
पिछले दिनों इटली में जन्मे, अपने ब्रांड्स के लिए मशहूर, अरमानी का निधन हुआ है। अरमानी का एक बार लंबा साक्षात्कार पढ़ा था। उनसे पूछा गया था कि आपने जीवन में कौन-सा सबसे बड़ा ट्रेंड चलाया है। तब उन्होंने कहा था कि मैंने लड़कियों को लड़कों के कपड़े पहना दिए। आज ये कपड़े सशक्त स्त्रियों की पहचान माने जाते हैं। एक बार पिछली सदी की शुरुआत में एक सिगरेट बनाने वाली कंपनी ने भी ऐसा ही किया था। उन दिनों अमेरिका में भी स्त्रियां सिगरेट नहीं पीती थीं। इस सिगरेट निर्माता ने एक बड़े प्रोपेगैंडिस्ट की मदद से इतवार के दिन सड़क पर सिगरेट पीती स्त्रियों का जुलूस निकाला। इन्हें आजादी की मशालें कहा गया। तब से सिगरेट पीना भी सशक्त औरतों का प्रतीक मान लिया गया।
कहने का अर्थ यह कि एक तरफ हम विविधता को सेलिब्रेट करना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ अपने व्यापारिक हितों के लिए उसे नष्ट भी करते जा रहे हैं। एक बात और, जो इन हवाई अड्डों पर बहुत शिद्दत के साथ महसूस होती है, वह है, यहां काम करने वाले कर्मचारियों की उम्र। चाहे एअरहोस्टेस हों, केबिन क्रू या हवाई अड्डों पर भाग-दौड़ करते लोग, सब तीस की उम्र से भी कम नजर आते हैं। वे ऊर्जा और शक्ति से भरे दिखते हैं। सिवाय पायलेट्स और सरकारी कर्मचारियों के कोई और बड़ी उम्र का नजर ही नहीं आता।
सोचिए कि जब ये युवा कुछ उम्रदराज हो जाएंगे, तो इनका क्या होगा? क्या इन्हें नौकरियों से हटाकर इनकी जगह, इनकी आज की उम्र के लोगों को ले आया जाएगा? आखिर तब ये कहां जाएंगे? उम्र के प्रति इस तरह का रवैया बेहद नकारात्मक है। यही देखकर लगता है कि क्यों कोई उम्रदराज भी हमेशा बहुत से रसायनों का इस्तेमाल करके युवा दिखना चाहता है, क्योंकि उम्रदराज किसी को भी पसंद नहीं आते। यह भी एक तरह से विविधता को नष्ट करना है। सिर्फ युवा ही क्यों चाहिए, बाकी कोई और क्यों नहीं? आज भी अनुभव का कोई विकल्प नहीं माना जाता। विविधता का सम्मान करना हो, तो लोगों की वेशभूषा, उनकी बोली-बानी, उनकी उम्र, सभी का आदर जरूरी है।