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विचारधारा ही काफी नहीं है: रचनात्मकता अहम, लोकप्रिय नेता वैचारिक लचीलेपन को अपने करिश्मे के साथ जोड़ लेते हैं
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विचारधारा
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अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
विस्तार
भगोड़ा ‘कट्टरपंथी’ शायद कोई प्रतिनिधि उदाहरण न हो। चुनाव हारने के बाद ब्राजील के बोल्सोनारो जूनियर का मियामी पहुंचने के लिए देश की सीमा पार करना एक कहानी बयां करता है: लोगों का दिल जीतने के लिए केवल वैचारिक कट्टरता ही काफी नहीं है। लैटिन अमेरिकी वामपंथ के अमर पुरोधा लूला इसलिए सफल रहे, क्योंकि उनके पास मार्क्स से भी कुछ अधिक था: एक ऐसा करिश्मा, जो सत्ता की अधिकता के बावजूद कभी फीका नहीं पड़ा। दूसरी ओर, दक्षिणपंथी खेमा सत्ता के साथ पूरी तरह सहज हो चुका है—और उसने सत्ता की होड़ को ही ‘विकल्प’ की सबसे स्वाभाविक अभिव्यक्ति बना दिया है। फिर भी, उनका संघर्ष पहले से कहीं अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, और यह संघर्ष पहचान तथा अनुकूलन से जुड़ा है।
यह स्थिति फ्रांस में सबसे नाटकीय ढंग से सामने आ रही है, जहां एक हिंसक विरोध-प्रदर्शन ने छात्रों की चिंताओं और देश की जनसांख्यिकीय विस्फोटक स्थिति को एक साथ ला खड़ा किया है—जिसकी सीमाएं प्रवासियों को सबसे अधिक अनुकूल लगती हैं। जैसा कि वॉल स्ट्रीट जर्नल के एक स्तंभकार ने गौर किया, लुई वुइटन की कांच की खिड़कियां सड़क पर भड़के गुस्से के सामने राज्य की तुलना में कहीं अधिक मजबूत साबित होती हैं—जिसने हाल ही में एक खास इस्लामी रंग ले लिया है। गॉल (फ्रांस) के खंडहरों पर दो आकृतियां खड़ी हैं—एक डगमगाती हुई और दूसरी स्थिर—जो निरर्थकता और पुनरुत्थान के बीच के अंतर को दर्शाती हैं। कभी मैक्रों पूरे यूरोप में एक ऐसे नेता के रूप में उभरे थे, जो महाद्वीप में एक नया पुनर्जागरण ला सकते थे। इस मध्यमार्गी राष्ट्रपति की बौद्धिक ऊर्जा, पारंपरिक और रूढ़िवादी नेताओं के बीच एक ताजा बदलाव की तरह थी।
यूरोप के सबसे परिष्कृत मध्यमार्गी नेता की आधुनिकता एक कठोर धर्मनिरपेक्षता पर टिकी है, जो चर्च और राज्य के अलगाव को पूरी तरह से अटूट बनाती है। ईसाइयों, मुसलमानों और यहूदियों का जनसांख्यिकीय मिश्रण कुछ ऐसा है कि अब ईश्वर भी सड़कों पर उमड़ते आकर्षणों (या प्रलोभनों) से खुद को दूर नहीं रख सकते। मैक्रों संगीत कार्यक्रम में इतने मग्न थे कि उन्हें यह दिखाई ही नहीं दिया। यूरोपीय उदारवाद के इस आखिरी परिष्कृत प्रतिनिधि का अब अपमानजनक अंत दिख रहा है।
मध्यमार्गी के सामने दक्षिणपंथ के धैर्यवान ध्वजवाहक खड़े हैं, जो लंबे समय से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। इस सफर के दौरान, ‘नेशनल रैली’ की मरीन ले पेन ने दक्षिणपंथी चरमपंथ की अपनी पुरानी विरासत को पीछे छोड़ दिया है। ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ वाली रिपब्लिकन विचारधारा को बनाए रखते हुए, व्यापक स्वीकार्यता पाने की उनकी छटपटाहट ही एकमात्र कारण नहीं है, जिसने उन्हें फ्रांसीसी राष्ट्रपति भवन की दौड़ में एक स्वाभाविक दावेदार बना दिया है। जब सड़कों पर हंगामा भड़क उठा, तो वह उसे भड़काने वालों की भूमिका में नहीं थी—यह भूमिका उनके वामपंथी साथी ने निभाई थी। उन्हें समझ आ गया है कि सत्ता पाने की किसी भी गंभीर कोशिश में, कट्टरता के बजाय हालात के अनुसार खुद को ढाल लेना कहीं बेहतर गुण है।
यही बात सत्ता में बने रहने पर भी लागू होती है। अटलांटिक के उस पार, ट्रंप का फिजूलखर्ची वाला राष्ट्रपति-काल उदारवादियों की घृणा और रिपब्लिकन के समर्थकों की नाराजगी को अनदेखा कर सकता है। हो सकता है कि उन्होंने एक आत्ममुग्ध राष्ट्रपति-काल की अनैतिकताओं को सामान्य बना दिया हो। फिर भी, विचारधारा का गुलाम बनने से इन्कार करने की उनकी इसी आदत ने उनके समर्थकों को मजबूत किया है। मध्यावधि चुनावों के नतीजे उस व्यक्ति के महत्व (या बदनामी) को कम नहीं कर सकते, जिसने पूरे अमेरिका को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने ऊंचे आदर्शों वाले ‘रीगनवाद’ की जगह सहज रूढ़िवाद को अपना लिया है, और इस प्रक्रिया में राष्ट्रीय हित और निजी हित को एक-दूसरे का पर्याय बना दिया है। हो सकता है कि उदारवादी सोच रखने वालों के लिए यह बात सही न हो। पर यह अब तक उनके लिए कारगर रहा है।
जनादेश को कमजोर किए बिना सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के लिए विचारधारा का रचनात्मक पालन जरूरी है, और यही बात कट्टरपंथी शासकों में नहीं होती। शी हों या पुतिन, जो खुद को राष्ट्र के भाग्य का स्थायी विधाता मानते हैं, उनकी सत्ता का आधार डर है। विचारधारा इनके लिए अधिकतम लाभ उठाने का एक साधन है। चाहे वह वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, लूला हों या मेलोनी—इनमें से जो सबसे अधिक लोकप्रिय होते हैं, वे वैचारिक लचीलेपन को अपने करिश्मे के साथ जोड़ लेते हैं। यहां लचीलेपन का अर्थ अवसरवाद नहीं है। यह उन्हें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता देता है, ताकि वे किसी एक बड़े नारे के बहकावे में आकर, आम लोगों की आवाजों को अनसुना न कर दें।
यह हमें स्वाभाविक रूप से लोकतंत्र में सबसे टिकाऊ माने जाने वाले उस व्यक्तित्व की ओर ले जाता है, जिस पर सत्ता के जरिये निजी लाभ उठाने का एक भी आरोप नहीं लगा है। यह एक ऐसी खूबी है, जिसका दावा आज बहुत कम लोग कर सकते हैं। पश्चिमी मीडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अक्सर एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ के रूप में पेश किया जाता है। यह बात गलत तो नहीं है, लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल सांस्कृतिक और प्रशासनिक ‘अनन्यतावाद (एक ऐसी मान्यता, जिसके अनुसार केवल एक विशेष प्रणाली, समूह या मान्यताओं का समूह ही सत्य और वैध है, जबकि बाकी सभी को असत्य माना जाता है।)’ के अर्थ में किया जाता है, मानो भारत का शासन-प्रशासन उनकी सांस्कृतिक पहचान के अधीन हो।
मोदी भारत पर केवल एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी के रूप में शासन नहीं करते, जिनका हिंदुत्व साम्यवाद की तरह ही वैचारिक रूप से पूरी तरह परिभाषित है। वे कोई पारंपरिक दक्षिणपंथी भी नहीं हैं। कहा जाता है कि चुनाव प्रचार के दौरान आपके मुद्दे चाहे जो भी हों, सत्ता में आने के बाद आप मध्यमार्गी विचारधारा से ही शासन चलाते हैं। नैतिक व्यावहारिकता, सामाजिक संवेदना और एक आधुनिक सोच रखने वाले नेता का दृढ़ विश्वास—ये सब मोदी की सत्ता को परिभाषित करते हैं, और ये उनकी वैचारिक विरासत को उनके लिए कोई बोझ नहीं बनने देते। एक रचनात्मक राजनेता अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं से समझौता किए बिना अपनी विचारधारा को समय के साथ अद्यतन कर लेता है, और मोदी ने दिखाया है कि ऐसा कैसे किया जाता है। इतिहास विचारधारा की अति को दंडित करता है। जो लोग इसका उपयोग रचनात्मक उद्देश्य के लिए करते हैं, वे इतिहास में भी जीतते हैं।