मैं एक प्रतिबंधित नाम
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मेरे साथ जो बीती है, उसका वर्णन करने से ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हाल क्या है। जिस दिन वाक स्वाधीनता के हक में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया, यह कहा गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोधी कानून 66-ए आईटी ऐक्ट अब निरस्त किया जाता है, ठीक उसी दिन निर्वासित को सर्वश्रेष्ठ बांग्ला फिल्म का पुरस्कार देने की खबर आई। यह फिल्म अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर है। धीरे-धीरे सम्मान समारोह का दिन आ पहुंचा। चूर्णी (इस फिल्म की निर्देशक) ने मेरे लिए एक आमंत्रण पत्र की व्यवस्था की थी, इसलिए मैं समारोह में जा पाई। विज्ञान भवन के विशाल ऑडिटोरियम में समारोह हुआ। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने फिल्म निर्देशक, निर्माता और कलाकारों को पुरस्कार दिया।
यह फिल्म सचमुच बन पाएगी, यह मैंने नहीं सोचा था। कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल के स्वनामधन्य फिल्म निर्देशक कौशिक गांगुली ने कहा था कि वह मेरी बिल्ली मीनू को लेकर एक कॉमेडी फिल्म बनाना चाहते हैं। अनुबंध पत्र पर दस्तखत करने के बाद मैंने महसूस किया कि फिल्म आगे नहीं बढ़ रही। इस पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मेरी कहानियों पर कई लोगों ने फिल्म बनाने की इच्छा जताई थी। लेकिन इस तरह के शुरुआती प्रस्ताव बाद में कोलकाता में खारिज हो जाते रहे हैं। दरअसल पश्चिम बंगाल सरकार नहीं चाहती कि कोई मेरे जीवन या कृतियों पर फिल्म बनाए। मेरे नाम पर ही उसे आपत्ति है।
दो साल पहले पश्चिम बंगाल के आकाश 8 टेलीविजन चैनल ने पूरे कोलकाता महानगर में मेरे नए मेगा सीरियल दुःसहवास का जोर-शोर से प्रचार किया था। उसकी कहानी किसी को पता नहीं थी, क्योंकि उसका प्रचार नहीं हुआ था। इसके बावजूद राज्य की मुख्यमंत्री ने वह मेगा सीरियल बंद करने के लिए टेलीविजन चैनल में पुलिस भेजे। आपत्ति की वजह क्या थी? यही कि इस मेगा सीरियल के प्रसारण से मुस्लिमों की भावनाओं को ठेस लगेगी। पर जब किसी को कहानी के बारे में पता ही नहीं है, तो फिर भावनाओं को आघात लगने का सवाल ही कहां पैदा होता है? उस सीरियल के पचास एपीसोड बनकर तैयार हो गए थे। ऐसे में आकाश-8 चैनल ने उन सभी एपीसोड की सीडी मौलवियों के एक समूह को देखने के लिए दी। उन्होंने देखने के बाद कहा कि इसमें ऐसा कुछ आपत्तिजनक नहीं है। अगले दिन वह चैनल मेगा सीरियल की शुरुआत करने के लिए प्रचार कर ही रहा था कि पुलिस के जवानों ने चैनल के ऑफिस को निशाना बनाया। पुलिस के पास मुख्यमंत्री का लिखित निर्देश था कि इस मेगा सीरियल को प्रसारित नहीं होने देना है।
जिस दिन निर्वासित को सर्वश्रेष्ठ बांग्ला फिल्म का सम्मान मिला, उसी दिन तृणमूल कांग्रेस के एक मुस्लिम सांसद ने कहा कि वह पश्चिम बंगाल में इस फिल्म का प्रसारण नहीं होने देंगे। उस सांसद की छवि अच्छी नहीं है। लेकिन ऐसे ही लोग आज यह फैसला लेने की स्थिति में हैं कि पश्चिम बंगाल में कौन रहेगा, कौन नहीं। कौन किसकी किताब पढ़ेगा, किसकी नहीं। किसकी फिल्म देखेगा, किसकी नहीं।
बहुत कोशिशों के बाद मेरे जीवन पर आखिरकार निर्वासित नाम की यह फिल्म बनी है। यह फिल्म बहुत सतर्कता से तैयार की गई है। मुझ पर केंद्रित होने के बावजूद इस फिल्म में मेरा नाम नहीं है। मेरे संघर्षों को भी इस फिल्म में चित्रित नहीं किया गया है। न ही इस फिल्म में इसका जिक्र है कि मजहब और नारी स्वाधीनता के बारे में मेरे विचार क्या हैं। इतनी सावधानी के पीछे उद्देश्य यह था कि फिल्म किसी विवाद में न पड़े। लेकिन इतना फूंक-फूंककर कदम उठाने का भी आखिर क्या फायदा हुआ! इस फिल्म को प्रतिबंधित करने की मांग तो फिर भी उठी। इस फिल्म पर प्रतिबंध की मांग इसके कंटेंट पर नहीं उठी। बल्कि इसलिए उठी कि इससे मेरा नाम जुड़ा हुआ है। यह फिल्म मेरे जीवन पर बनी है। यानी ऐसे अनेक लोग हैं, जो मेरा नाम नहीं सुनना चाहते।
कोलकाता के कई परिचित ने मुझे बताया कि निर्वासित को बेशक पुरस्कार मिला, लेकिन कोलकाता में हम इसे देख नहीं पाएंगे। आखिर वे कौन लोग हैं, जो कोलकाता में मेरी फिल्म नहीं प्रसारित होने देना चाहते? क्या मुस्लिम समुदाय को इस फिल्म पर आपत्ति है? उन्हें आपत्ति हो या न हो, इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाकर, तुष्टीकरण की नीति के तहत मुस्लिम समुदाय को बताया जाएगा कि आपकी भावनाओं को ठेस न लगे, इसलिए हमने इस फिल्म को राज्य में प्रतिबंधित किया है।
पश्चिम बंगाल ने मुझे निषिद्ध घोषित किया है। सिर्फ वहां की सरकार नहीं, तमाम राजनीतिक दल, तमाम संगठन, पूरा मीडिया मेरे विरुद्ध है। जिस बांग्ला अखबार ने मुझे दो-दो बार सम्मानित किया, मैं आज उसके पन्नों पर भी निषिद्ध हूं। दुनिया में और कहीं शायद ही कोई आदमी तमाम लोगों और संस्थाओं द्वारा इस तरह प्रतिबंधित है। इस प्रतिबंध की क्या वजह है? क्या मैं इतनी ही भयावह हूं? क्या महिलाओं के लिए समान अधिकारों की मांग भयावह है? क्या मानवाधिकार की इच्छा भयावह है? या मुझ पर इस्लाम-विरोधी का ठप्पा लगाकर जो राजनीतिक दल चुनावों में फायदा उठा रहे हैं, वे भयावह हैं?
क्या मुझे अपना नाम बदल देना चाहिए? संभव है, इससे बड़े प्रकाशक मेरी किताबें छापें, बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छपें। मेरी कहानियों पर मेगा सीरियल और फिल्में बनें। तब शायद मेरे जीवन पर बनी फिल्म को प्रतिबंधित करने की धमकी कोई नहीं देगा। लेकिन नाम बदलने पर तो मुझे मुखौटा लगाना होगा। और मैं मुखौटा ही तो नहीं लगा सकती।
बांग्लादेश में भी मैं एक निषिद्ध नाम हूं। वहां मेरा लिखा हुआ न पढ़कर भी नई पीढ़ी मुझसे घृणा करती है। यह घृणा इतनी गहरी है कि उन्हें मेरा नाम तक बर्दाश्त नहीं। मेरी जैसी लेखिका ही यह समझ सकती है कि इस तरह का सार्वजनिक प्रतिबंध उसे कितना दुखी और हताश करता है।