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भूख, रैंकिंग विवाद और आंकड़ों में खामियां : डाटा संग्रह की बदतर व्यवस्था और जीडीपी में वृद्धि का लक्ष्य

Thu, 03 Nov 2022 02:40 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Thu, 03 Nov 2022 02:40 AM IST
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सार
भारत स्वाभाविक ही खुद को सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बताते हुए गर्व महसूस करता है। महीने में औसतन 1.4 करोड़ रुपये के जीएसटी संग्रह को हमारी आर्थिक ताकत का उदाहरण बताया जाता है। पर क्या इससे सारा कुछ पता चलता है?
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Hunger, ranking controversy and data flaws: poor data collection system and GDP growth target
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : iStock

विस्तार

हमेशा ग्लोबल रैंकिंग का दोतरफा प्रभाव होता है। या तो उससे खुश हुआ जाता है, उस पर मुहर लगाई जाती है,या उसे खारिज किया जाता है। पिछले महीने ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी हुआ। कुल 121 देशों के इस इंडेक्स में भारत 107वें नंबर पर है। इसके जारी होते ही राजनीतिक क्षोभ उमड़ पड़ा, क्योंकि इसमें युद्ध जर्जर यूक्रेन 36वें और हिंसाग्रस्त श्रीलंका तो 64वें पायदान पर हैं ही, हमारे पड़ोसी देशों में से नेपाल 81वें, बांग्लादेश 84वें और पाकिस्तान 99वें पायदान पर हैं। भारत उन देशों से भी पीछे है, जो भारत से अनाज लेते हैं! 



शीर्षक से लेकर कार्य प्रणाली संरचना तक इस इंडेक्स पर कई सवाल उठते हैं। इसके चार में से तीन मानक बच्चों के स्वास्थ्य पर फोकस करते हैं। बेशक नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़े कुपोषण और उसके असर के बारे में बताते हैं। पर बच्चों में पोषण की स्थिति के आधार पर पूरी आबादी के पोषण के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। और जहां तक इस इंडेक्स के चौथे मानक अल्पपोषण के अनुपात का सवाल है, तो 1.4 अरब की आबादी वाले देश में मात्र 3,000 लोगों से बात कर आंकड़ा तैयार किया गया। 


ऐसे में, आश्चर्य नहीं कि सरकार ने इस रैंकिंग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 'इसमें भूख की माप गलत सूचनाओं के आधार पर की गई है।' ग्लोबल रैंकिंग जारी करने वाली संस्थाओं और भारत के बीच विवाद का यह पहला उदाहरण नहीं है, न ही आखिरी होने वाला है। मौजूदा विवाद का कारण सांख्यिकीय आंकड़ों की कमी और अपर्याप्त डाटा संग्रह है, जिसने केंद्र और राज्य सरकारों को क्षुब्ध किया है। रैंकिंग्स के बारे में जनता की प्रतिक्रिया इस पर निर्भर करती है कि उसे तथ्य की कितनी जानकारी है, कितनी नहीं है, और जिसके बारे में जानकारी नहीं है, उस बारे में भी वह कितना जानती है। 

विडंबना यह है कि अपने यहां बदतर डाटा संग्रह और व्यवस्थागत अक्षमता ने त्रुटिपूर्ण रैंकिंग के वैज्ञानिक अध्ययन की कोशिश को भी, ताकि इसके जवाब में सही तथ्य रखे जाएं, मुश्किल बना दिया है। प्रबंधन गुरु पीटर ड्रकर की मशहूर उक्ति है, 'जिसे मापा जाता है, उसमें सुधार आता है।' भारत अपनी शासन नीति और अर्थनीति में डाटा संग्रह लागू करने वाले शुरुआती देशों में से था। इसके बावजूद करीब सात दशक बाद देश में आंकड़ों का परिदृश्य गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है। भारत इकलौती बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो अपने नागरिकों की आय के बारे में जानने के लिए उपभोग को आधार बनाती है। 

वर्ष 2021 में राज्यों का कुल जीएसडीपी देश की जीडीपी से अधिक था। ऐसे में, सवाल है कि देश में क्या मापा जाता है और क्या नहीं। यह भी कि यह कैसे और कब होता है। भूख का ही मुद्दा लीजिए। भारत फिलहाल खाद्य सुरक्षा के दो कार्यक्रम चलाता है- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सब्सिडाइज्ड अनाज योजना और पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत दिया जाने वाला मुफ्त राशन। कुल 80 करोड़ लोगों यानी आबादी के 75 प्रतिशत को इनका लाभ मिलता है। क्या लोग दोनों योजनाओं का लाभ उठाते हैं? 

इन दोनों योजनाओं के तहत जो अनाज दिए जाते हैं, क्या किसी भी स्तर पर उसे मापा जाता है? क्या लाभार्थियों का सर्वेक्षण हुआ है? ठोस आंकड़े ही देश-दुनिया को पोषण और कुपोषण के बारे में बता पाएंगे। हालांकि तब भी रैंकिंग के विवादास्पद होने की आशंका रहेगी। भारत स्वाभाविक ही खुद को सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बताते हुए गर्व महसूस करता है। महीने में औसतन 1.4 करोड़ रुपये के जीएसटी संग्रह को हमारी आर्थिक ताकत का उदाहरण बताया जाता है। पर क्या इससे सारा कुछ पता चलता है? 

जीएसटी के आंकड़ों का अगर विश्लेषण किया जाए, तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन और उपभोग का, वस्तुओं और सेवाओं में संबंधों और अलगाव का, एमएसएमई क्षेत्र के प्रदर्शन का पता चल सकता है। पर यह विश्लेषण होना अभी बाकी है। बेरोजगारी पर चिंतित होने के बजाय रोजगार सृजन हमारे राजनेताओं की गर्वोक्ति का कारण बनता है। केंद्र और राज्य सरकारें बुनियादी ढांचे पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करती हैं। निश्चित तौर पर ये इसका आकलन करने में समर्थ हैं कि कितना रोजगार सृजन हुआ। 

केंद्र, राज्य, नगरपालिकाओं और दूसरे स्थानीय निकायों में रोजगार के लिए पद सृजित किए जाते हैं। ऐसे में, हर साल संसद को क्यों नहीं सूचित किया जाता कि कितने पद सृजित किए गए, कितने पद खाली हैं और कितने लोगों को रोजगार मिला? अपने यहां कार्यबल का बड़ा हिस्सा अस्थायी कामगारों या स्वरोजगार वालों का है। इनकी गणना के लिए नियमित सर्वेक्षण जरूरी है। आखिरी बार एनएसएस-रोजगार-बेरोजगारी का सर्वे 2011-12 में हुआ था। हालांकि हमारे यहां आवधिक श्रम बल सर्वे होता है। 

यह सर्वे कब होता है, क्या इसमें ग्रामीण आबादी को शामिल किया जाता है, और यह अर्थव्यवस्था के बारे में क्या बताता है? दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था अगर रोजगार का स्पष्ट आंकड़ा देने में लड़खड़ाती है, तो यह गंभीर मामला है। मानव विकास संकेतकों के मामले में डाटा संग्रह में दरार और अक्षमता कहीं ज्यादा दिखती है, और राज्यों के मामले में यह दरार ज्यादा स्पष्ट और दयनीय है। जैसे कि 10 राज्यों में कुल 25 फीसदी बच्चों का जन्म दर्ज ही नहीं होता। राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 11 फीसदी है। 

जहां तक मृत्यु का मामला है, गृह मंत्रालय के मुताबिक, 86 फीसदी मृत्यु दर्ज होती है, हेल्थ सर्वे के अनुसार, 71 प्रतिशत मृत्यु दर्ज की जाती है, जबकि जनसंख्या के रिकॉर्ड ( एमसीसीडी, 2020) के मुताबिक, सिर्फ 54.6 फीसदी मृत्यु का चिकित्सीय प्रमाणन होता है! कोरोना महामारी स्वास्थ्य सेवा के मोर्चे पर राज्यों के लिए चेतावनी होनी चाहिए थी। पर क्या हम जानते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कितने नए डॉक्टरों की भर्ती हुई है? कितने नए अस्पताल बने हैं? महामारी में बच्चे और शिक्षक दो साल तक स्कूल नहीं जा सके। क्या हम जानते हैं कि तमाम राज्यों के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के कितने पद खाली हैं? जाहिर है,  डाटा संग्रह के भू-दृश्य को पुनर्गठित करने की जरूरत है, ताकि इसका बेहतर विश्लेषण किया जा सके कि विभिन्न मोर्चे पर यह देश कहां खड़ा है, और कहां पहुंचना चाहता है।

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