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हुकुम सिंह का सियासी दर्द लगता है 'कैराना पलायन'

Sat, 18 Jun 2016 02:24 PM IST
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 18 Jun 2016 02:24 PM IST
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Hukum Singh's U-turn on kairana exodus

कैराना में पलायन हो रहा है या नहीं और इसकी वजह क्या है, इसको लेकर पिछले कई दिन से दिल्ली के मीडिया का गला बैठा जा रहा है। अब बात पलायन से आगे बढ़कर 'यात्राओं' तक आ गई है। सपा के अतुल प्रधान और भाजपा के संगीत सोम की तरफ से इस मसले को लेकर यात्रा की बात कही गई लेकिन वो प्रशासन की सजगता की वजह से (या शायद मनमाफिक भीड़ ने आई हो) नहीं हो पाई।

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खैर, सवाल ये है कि अचानक हुकम सिंह को ये सब याद क्यों आया? इसके लिए हुकुम सिंह और कैराना की राजनीति को जानना पड़ेगा। अगर कैराना के नाम के साथ किसी राजनेता का नाम लगातार पिछले चालीस साल से लिया जा सकता है तो वो हुकम सिंह है। हां तो फिर 1974 से लगातार राजनीति मे सक्रिय और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता को 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' की याद क्यों आई?
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दरअसल हुकुम सिंह की कोशिश को मैं उनकी पीड़ा के तौर पर देखता हूं। हुकुम सिंह 1974 से राजनीति में और 1996 से भाजपा में हैं, बीजेपी में आने के बाद वो लगातार वेस्ट यूपी में भाजपा का चेहरा रहे हैं। वो राजनाथ सिंह और कल्याण सिंह की सरकारों में मंत्री रहे। भाजपा सत्ता से बाहर हुई तो वो भाजपा विधानमंडल के उपनेता रहे। कहते हैं कि सत्ता का एक नशा होता है, इसके पाकर कोई बहके ना बहके, हाथ से जाती दिखे तो जरूर बहकता है। कुछ ऐसा ही हुकम सिंह के साथ होता लग रहा है।
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2013 से पहले मुजफ्फरनगर क्षेत्र में भाजपा हाईकमान के पास एक ही मोतबर चेहरा था और वो थे हुकुम सिंह। 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली में दंगे हुए। हुकुम सिंह इसमें एक वर्ग के लिए सक्रिय भी रहे और उन पर इसमें केस भी दर्ज हुआ लेकिन दंगों से भाजपा के तीन नेता 'हीरो' बनकर उभरे। संजीव बालियान, सुरेश राणा और संगीत सोम (संगीत और सुरेश को प्रधानमंत्री के मंच पर भी बुलाया गया था)। ये तीन नेता सामने आए और हुकुम सिंह पीछे छूट गए। दरअसल यहां इन तीनों नेताओं के बारे में थोड़ा सा जान लेना भी जरूरी है कि हुकुम सिंह के मुकाबले ये कहां ठहरते हैं।

संगीत सोम राजपूत नेता के तौर पर 2009 में सपा के टिकट से मुजफ्फरनगर से लोकसभा का चुनाव लड़े, लेकिन वो मुकाबले में भी नहीं आ सके। इसके बाद वो 2012 में सरधना से भाजपा से विधायक बने। वहीं सुरेश राणा भी 2012 में थानाभवन (शामली) से विधायक बने, सुरेश इस चुनाव से पहले भाजपा में भी कोई बहुत मशहूर चेहरा नहीं थे। बात संजीव बालियान की करें तो वो नितिन गडकरी (जब वो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे) की मुजफ्फरनगर रैली के संयोजक बन पहली बार लोगों के सामने आए। इससे पहले संजीव नाम के किसी नेता को इस शहर के लोग नहीं जानते थे। पहला झटका हुकुम सिंह को लोकसभा के बाद लगा, 2014 लोकसभा चुनाव के बाद हुकुम सिंह के सीनियर होते हुए संजीव बालियान को मंत्री बनाया गया। संजीव बालियान तेजी से उभरे और आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का चेहरा हैं। संगीत सोम और सुरेश राणा अपनी तरह से हर मुद्दे को उछाल कर, बढ़ाकर सुर्खियां पा लेते हैं। इस सब में किसी ने याद नहीं किया तो हुकुम सिंह को।

ऐसे में चार दशक से ज्यादा से राजनीति कर रहे हुकुम सिंह खुद को हाशिये पर महसूस करने लगे। पश्चिम के हर मुद्दे पर संजीव सामने होते हैं, अवाम के बीच भी संजीव की ही पहचान बनती जा रही है। ऐसे में भाजपा के कई दूसरे नेताओं की तरह इस दिग्गज को भी हाशिया कचोट रहा है। कैराना का मामला उठाकर वो सुर्खियां पाना चाहते हैं। 74 साल के हुकुम सिंह शायद इसके लिए बहुत तैयार भी नही थे, इसीलिए वो अपनी बात से जल्दी ही पलट भी गए। वहीं उनकी की हुई मेहनत पर जब संगीत सोम ने (यात्रा करके) फसल काटनी चाही तो वो ही विरोध में आ गए।


इससे साफ है कि वो इस मुद्दे को अपने लिए फायदे का सौदा समझ कर उठा रहे थे, लेकिन ये उनको कोई फायदा पहुंचाता नजर नहीं आ रहा। हां, संजीव बालियान या संगीत सोम ही इस मामले से कोई लाभ ले जाएं तो चौंकिएगा मत। अब कैराना मामले में हुकुम सिंह की 'असफलता' और उनकी उम्र को देखते हुए लगता है कि वो अब अपनी पार्टी में और ज्यादा हाशिये पर ना चले जाएं क्योंकि उनका मुद्दा पार्टी के लिए फायदे का सौदा साबित ही नहीं हुआ तो पार्टी ही उनका ध्यान क्यों रखेगी।


(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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