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नजरिया: तीज-त्योहार और शादियों का बाजार भी देश की अर्थव्यवस्था को करता है मजबूत

Sat, 09 Dec 2023 07:40 AM IST
Prahlad Sabnani प्रहलाद सबनानी
Updated Sat, 09 Dec 2023 07:40 AM IST
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सार
भारतीय शादियों व त्योहारों में होने वाले भारी व्यय से बाजार का विकास होता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था भी सशक्त बनती है।
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huge expenditure on weddings and festivals leads market development and strengthens Indian economy
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार, पवित्र शादियों में विभिन्न आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सांसारिक संस्कार संपन्न कराने के लिए समाज के गणमान्य नागरिकों, रिश्तेदारों व परिजनों को साथ लेकर विभिन्न प्रकार के भव्य आयोजन संपन्न किए जाते हैं। इन आयोजनों में विभिन्न कार्यक्रम होते हैं एवं आजकल तो ऐसे शुभ अवसरों पर किए जा रहे भारी व्यय से देश की अर्थव्यवस्था को बल मिलता दिखाई दे रहा है।



कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के अनुसार, देश में बीते नवंबर से लेकर आगामी लगभग चार माह के दौरान 38 लाख से अधिक शादियों के आयोजन होने जा रहे हैं। इन चार माह में लगभग 4.75 लाख करोड़ की राशि व्यय होने की संभावना व्यक्त की जा रही है, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में 35 लाख शादियों पर 3.75 लाख करोड़ रुपये की राशि खर्च हुई थी। शादी के विभिन्न कार्यक्रमों में विभिन्न मदों पर होने वाले खर्च के अनुमानों के अनुसार, इस वर्ष नए कपड़े और नए आभूषण खरीदने की मद पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च होने वाली है।


इसके अलावा, मेहमानों की खातिरदारी पर 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च होने जा रही है और शादी समारोह से जुड़े कार्यक्रमों पर भी इतनी ही राशि खर्च होने जा रही है। विश्व का कोई भी देश शादियों के मौसम में इतनी भारी-भरकम राशि खर्च नहीं करता। आज तो बगैर विवाह के 'लिव इन रिलेशन' नामक रिवाज ही चल पड़ा है। विकसित देशों के युवा इस प्रकार के रिवाजों के चलते बच्चे भी पैदा नहीं कर रहे हैं और कुछ समय पश्चात ही आपस में रिश्तों को 'तलाक' का रूप दे देते हैं। यदि इस बीच किसी जोड़े को बच्चा हो भी जाता है, तो उसे 'सिंगल पेरेंट' के रिवाज के तहत केवल मां के पास ही रहना होता है। इन्हीं कारणों के चलते आज विश्व के कई देशों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिसका सीधा प्रभाव इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है।  

कुल मिलाकर देखें, तो यह सनातन संस्कृति के संस्कार ही हैं, जो भारत में आज भी कुटुंब व्यवस्था को जीवित रखे हुए हैं। अन्यथा, विकसित देशों में चूंकि संयुक्त परिवार का चलन नहीं के बराबर है अतः बुजुर्गों की देखभाल इन देशों की सरकार को 'सामाजिक लाभ' योजना के अंतर्गत करनी होती है, जिस पर होने वाला खर्च इतना अधिक हो गया है कि इन देशों की बजट व्यवस्था ही भारी दबाव में आ गई है। इसके ठीक विपरीत, भारत में विभिन्न त्योहार भी बड़े ही उत्साह से मनाए जाते हैं। इसके चलते इस वर्ष दीपावली एवं धनतेरस के त्योहारी मौसम में देश में 3.75 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हुआ है। केवल करवाचौथ के दिन 15,000 करोड़ रुपये का व्यापार संपन्न हुआ था।

देश में त्योहारी मौसम में बीते अक्तूबर में 23 लाख वाहनों की बिक्री हुई है। चार लाख चारपहिया वाहनों एवं 19 लाख दोपहिया वाहनों की बिक्री हुई है। आने वाले शादियों के मौसम में भी वाहनों की जबरदस्त बिक्री होने की संभावना है। इन वजहों से भारत में तेजी से गरीबी एवं बेरोजगारी भी कम हो रही है।

आज भारत में उच्च निवल संपत्ति वाले नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अतः समस्त मेहमानों सहित अब विदेश में जाकर शादी की रस्में संपन्न करने का प्रचलन भारत में बहुत बढ़ गया है। इसी वजह से, अपने प्रधानमंत्री को देश के नागरिकों से विदेश में जाकर शादी की रस्में पूर्ण नहीं करने की अपील करनी पड़ी, क्योंकि इससे शादी की रस्मों पर होने वाले व्यय का लाभ उस देश को मिल जाता है, जबकि भारत में ही पर्याप्त मात्रा में पर्यटन स्थल उपलब्ध हैं, जहां आसानी से शादियां विधि-विधान से संपन्न कर विवाह समारोह भी आयोजित किए जा सकते हैं। इससे शादी पर होने वाले खर्च का लाभ भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा और देश का पैसा भी देश में ही बना रहेगा।

आज भारतीय नागरिकों द्वारा सनातन संस्कृति के संस्कारों के पालन की बदौलत भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता दिखाई दे रहा है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की दर को लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक संघ ने वर्ष 2024 के लिए भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के अनुमान को बढ़ाकर 6.3 फीसदी कर दिया है।

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