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आखिर कैसे साफ होगी गंगा

Fri, 06 Apr 2018 06:48 PM IST
शरीन जोशी
शरीन जोशी Updated Fri, 06 Apr 2018 06:48 PM IST
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How will the river Ganga be cleaned
गंगा

गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है, जिसकी एक अरब से ज्यादा लोग देवी के रूप में पूजा करते हैं। यह भारत की 47 फीसदी भूमि को सिंचाई और पचास करोड़ लोगों को भोजन प्रदान करती है। इन महत्ताओं के बावजूद यह दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है। तेज जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, औद्योगिक विकास ने घरेलू और औद्योगिक प्रदूषकों के स्तर को बढ़ा दिया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जुलाई, 2013 के आकलन के मुताबिक, पर्वत से उतरने के बाद नदी के सभी हिस्सों में शौच में पाए जाने वाले कॉलिफोर्म बैक्टिरिया का स्तर, जैविक व रासायनिक ऑक्सीजन की मांग और कैसिनोजेनिक रसायनों की शृंखला पेयजल और स्नान करने योग्य पानी की गुणवत्ता के स्वीकार्य स्तर से ज्यादा रहती है।


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वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनावी वायदों में गंगा की सफाई को मुख्य मुद्दा बनाने का प्रयास किया था। प्रधानमंत्री के पद पर बैठते ही उन्होंने तुरंत नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरुआत की, यह गंगा के प्रदूषण के प्रभावी ह्रास, संरक्षण और कायाकल्प के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ के बजट वाला एक एकीकृत संरक्षण मिशन है। इसमें आठ राज्य शामिल हैं, और 2022 तक गंगा से सटे सभी 1,632 ग्राम पंचायतों को स्वच्छता प्रणाली से जोड़ने का लक्ष्य है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा को साफ करने के लिए चलाई गई यह परियोजना नतीजे नहीं दे रही है। लेखा परीक्षक के निष्कर्ष काफी चौंकाने वाले हैं। सरकार ने अप्रैल 2015 और मार्च 2017 के बीच फ्लैगशिप कार्यक्रम के लिए निर्धारित 1.05 अरब डॉलर में से मात्र का 26 करोड़ डॉलर खर्च किया। इन सभी परियोजनाओं में समस्याओं की एक सुसंगत सूची थी-अप्रयुक्त धन, दीर्घकालीन योजना का अभाव, और ठोस कार्रवाई करने में देरी।

इस तरह समाप्त होने वाली और प्राथमिकता की कमी वाली यह कोई पहली नीति नहीं है। पहले भी प्रदूषण का मुकाबला करने के लिए कई बेहतर ढंग से वित्तपोषित कार्यक्रम चलाए गए। मगर मौजूदा नीति की तरह ही पिछले प्रयासों में से कोई भी प्रभावी नहीं रहा। इस दौर में मात्र एक सफलता, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिली, जिसने वास्तव में नदी में प्रदूषण फैलाने वाली विशिष्ट कंपनियों को प्रभावित किया।

भारत की जल नीति की खामियों को देखने के लिए उन राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक संदर्भों को करीब से देखना होगा, जिनमें नीतियां बनाई जाती हैं। भारत के चुनावी लोकतंत्र में पर्यावरणीय नीतियों को कोई जगह नहीं है। प्रदूषण शायद ही कभी चुनावी मुद्दा बना हो। रोजगार, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन ज्यादा जरूरी हैं। निर्वाचित नेताओं में बड़े प्रदूषकों या छोटी-छोटी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने का उत्साह बहुत कम है, क्योंकि वे वोट बैंक का काम करते हैं। यथास्थिति को चुनौती देने के बजाय आम राजनेता दिखावे के लिए आम तौर पर किसी बहुराष्ट्रीय संगठन के सहयोग से सफेद हाथी जैसी पर्यावरणीय परियोजना चलाने का प्रयास करता है, जिसका चुनाव से ठीक पहले उद्घाटन किया जा सके। उदाहरण के लिए, औद्योगिक समूहों में, आम तौर पर प्रचलित उपचार संयंत्रों (सीईटीपी) के निर्माण पर जोर दिया गया है। सीईटीपी को उच्च स्तर के समन्वय की आवश्यकता होती है, वे निर्माण और रखरखाव में महंगे होते हैं, वे जहरीले कीचड़ पैदा करते हैं, और वे प्रदूषक जलाने से हवा को दूषित करते हैं। ऐसे प्रयास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने के लिए भी किए जाते हैं, जबकि गंगा से जुड़ी आबादी के विशाल क्षेत्र में अब तक शौचालय की सुविधा नहीं है। एक अन्य मुद्दा है कि देश की नदियों में पानी का प्रवाह कम है। मसलन, सिंचाई एवं जल विद्युत परियोजनाओं के लिए गंगा के पानी को इतना ज्यादा डाइवर्ट कर दिया गया है कि गर्मी के महीनों में प्रवाह कम हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में सिंचाई के लिए उपयोग किए जाने वाले पानी का 75 फीसदी बेकार चला जाता है। मुफ्त में बिजली पाने वाले किसानों को जल संरक्षण के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता है। ऐसे में नदी की सफाई की बात करने का कोई मतलब नहीं है, जब एक तरफ पानी निकाला जाता है और फिर उसमें सीवेज डाला जाता है।

भारत में पर्यावरणीय कार्यक्रमों को कैसे बनाया और लागू किया जाए, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का यही वक्त है। जब उमा भारती को गंगा जीर्णोद्धार का कार्य सौंपा गया था, तो गंगा मंथन उनके शुरुआती कुछ कदमों में से एक था, जिसमें समाज के हर स्तर के लोगों से सुझाव मांगे गए थे। लेकिन बाद के वर्षों में उन सुझावों पर कोई भी काम नहीं किया गया। इस रिपोर्ट में शौचालयों के निर्माण के लिए ग्राम पंचायतों के साथ साझेदारी का उल्लेख है, पर नागरिकों की भागीदारी का कोई जिक्र नहीं है, खासकर कार्यक्रम संचालन की स्थिरता और निगरानी के लिए।
 
इस समय गंगा जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के पास है, वह अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले गंगा सफाई को लेकर दबाव में हैं। हालांकि इसका हल गडकरी पर निर्भर नहीं है। इसके वास्तविक समाधान के लिए राज्य और नागरिकों के बीच साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता है। इसे प्रोत्साहित करने के लिए आंकड़ों को ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक करना चाहिए और इन आंकड़ों का स्थानीय स्तर पर विश्लेषण होना चाहिए। इसके अलावा प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की भी जरूरत है। स्वच्छता की दिशा में चलाया गया मौजूदा अभियान निश्चित रूप से मदद करेगा, लेकिन क्या कृषि एवं औद्योगिक कचरे को नदी में जाने से रोकने के लिए भी ऐसे अन्य प्रयास चलेंगे? यह नीतियों के बीच अंतर्संबंधों पर भी नजर रखने का वक्त है, जैसे सब्सिडी, बिजली उपयोग का तरीका, औद्योगिक विकास और शहरीकरण योजना। इनके लिए रचनात्मकता, नवाचार, अनुशासन, पारदर्शिता और मजबूत नेतृत्व चाहिए। गंगा की सफाई लाखों भारतीयों पर निर्भर है, जो पोषण, बिजली और आध्यात्मिक जरूरतों के लिए इस पर निर्भर हैं।

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