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अपराधियों से मुक्त चुनाव की दशा

awadhesh kumarअवधेश कुमार Updated Tue, 03 Dec 2019 08:26 AM IST
मतदान केंद्र पर लगी लंबी लाइन
मतदान केंद्र पर लगी लंबी लाइन - फोटो : PTI
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भारतीय चुनाव को निष्पक्ष बनाने के लिए न्यायालय, चुनाव आयोग और कई बार सरकारें भी कदम उठाती रही हैं। उच्चतम न्यायालय ने पिछले 25 नवंबर को चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह आपराधिक रिकाॅर्ड वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने को सुविचारित आदेश पारित करे, ताकि तीन महीने के अंदर राजनीतिक दलों को आपराधिक रिकाॅर्ड वाले लोगों को टिकट देने से रोका जा सके। प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका पर विचार करने से इन्कार करते हुए यह आदेश दिया। उपाध्याय ने याचिका में चुनाव आयोग को ऐसी व्यवस्था करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था, जिससे राजनीतिक दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाए जाने से रोका जा सके। पीठ ने कहा कि हम चुनाव आयोग को निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता की 22 जनवरी, 2019 की याचिका पर तीन महीने में विचार करे और इस संबंध में विस्तृत आदेश पारित करे।
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इसके पूर्व 25 सितंबर 2018 को भी उच्चतम न्यायालय ने एक फैसला दिया था। इसमें मुख्यतः छह बिंदु थे। एक, संसद को यह सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाना चाहिए कि आपराधिक मामलों का सामना करने वाले लोग राजनीति में प्रवेश न करें। दो, चुनाव लड़ने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार को अपना आपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग को देना होगा। तीन, सभी राजनीतिक दलों को ऐसे उम्मीदवारों की सूची और विस्तृत जानकारी अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करनी होगी। चार, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को निर्वाचन आयोग को एक फॉर्म भर कर देना होगा, जिसमें उनका आपराधिक रिकॉर्ड और आपराधिक इतिहास बड़े-बड़े अक्षरों में दर्ज होगा। पांच, उम्मीदवार अपने आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में राजनीतिक दलों को पूरी सूचना दें। छह, सभी राजनीतिक दलों से जुड़े उम्मीदवारों के रिकॉर्ड का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से गहन प्रचार किया जाना चाहिए। उम्मीदवार के फॉर्म भरने के बाद बाद कम से कम तीन बार ऐसा करना चाहिए।

न्यायालय ने इस पर फैसला देते समय कुछ गंभीर टिप्पणियां की थीं। मसलन, दागी नेताओं के चुनाव लड़ने पर उच्चतम न्यायालय रोक नहीं लगा सकता। जिन लोगों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं, विधायिका में उनके प्रवेश और कानून बनाने में उनकी भागीदारी रोकने के लिए कानून बनाने की जरूरत है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का अपराधीकरण चिंतित करने वाला है। भ्रष्टाचार और राजनीति का अपराधीकरण भारतीय लोकतंत्र की नींव को खोखला कर रहा है। संसद को इस महामारी से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

हालांकि चुनाव को अपराधियों से मुक्त करने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं और उनका असर भी हुआ है। लेकिन संसद में औसत 33 प्रतिशत सांसदों के शपथ पत्र में गंभीर अपराधों का विवरण हो, तो पहली नजर में चिंता पैदा होती है। चुनाव आयोग ने डेढ़ दशक पहले सरकार को सुझाव भेजा था कि तीन वर्ष या उससे ज्यादा सजा वाले मामले में यदि आरोप पत्र दाखिल हो जाए, तो वैसे व्यक्ति को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाए। इसे किसी सरकार ने स्वीकार नहीं किया। जुलाई 2013 में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया कि दो वर्ष की सजा होने पर सदस्य की सदस्यता उसी दिन रद्द हो जाएगी तथा अगले छह वर्षों तक वह चुनाव नहीं लड़ पाएगा। इसका असर हुआ है। देखना है चुनाव आयोग अब क्या कदम उठाता है।
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