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पर्यावरण: पराली से होने वाले प्रदूषण से कैसे निपटेंगे? हाय-तौबा के बाद लंबी चुप्पी... ऐसे नहीं सुलझेगी समस्या

Mon, 30 Sep 2024 06:27 AM IST
Rituparn Dave ऋतुपर्ण दवे
Updated Mon, 30 Sep 2024 06:27 AM IST
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सार
हर साल पराली पर दो महीने की और पटाखों पर हफ्ते भर की हाय-तौबा के बाद 10-11 महीनों की चुप्पी से समाधान कैसे होगा?
 
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How to deal with pollution caused by stubble
पराली में लगाई गई आग. - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने में विफल रहने पर लताड़ा है। पराली जलाने के वैकल्पिक उपकरणों का जमीनी स्तर पर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए प्रयासों की जरूरत जताने के साथ ही बेहतर अनुपालन पर बल दिया। सीएक्यूएम के अध्यक्ष को दो टूक कहा कि आपने अब तक अधिनियम के एक भी प्रावधान का अनुपालन क्यों नहीं किया? यह भी पूछा कि निदान के लिए बनीं समितियां क्या हवा में हैं?



ऐसे में पराली से होने वाले वायु प्रदूषण से कैसे निपटेंगे? आयोग तीन महीने में एक बार बैठता है। अगली बैठक तक नया संकट आ खड़ा होता है। तीन साल से अस्तित्व में आयोग कुल 82 निर्देश जारी कर सका, जो नाकाफी हैं। आयोग आकलन करे कि उसके निर्देशों से प्रदूषण कम हो रहा है या नहीं? दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कर्मचारी भी नाकाफी हैं। अन्य पांच प्रदूषण फैलाने वाले राज्यों में भी यही स्थिति है। 30 अप्रैल 2025 तक सभी जगह रिक्त पद भरें, ताकि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके।


पिछले वर्ष भी जब पराली पर सुप्रीम सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार को दो टूक कहा गया कि किसान संगठनों से बात करें, ताकि प्रदूषण घटे। 20 नवंबर, 2023 यानी दिवाली के आठ दिन बाद फिर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पंजाब सरकार को फटकारा और नासा की तबकी ताजा तस्वीरों का हवाला दिया, जिसमें उसी रात दिखे धुएं के लाल आसमान व धुंध की कालिमा साफ थी। तब भी तमाम हस्तक्षेपों के बावजूद पराली जलाने की 33,000 से अधिक घटनाएं दर्ज हुईं। शीर्ष अदालत ने 21 नवंबर, 2023 को भी आगे की सुनवाई में हरियाणा से सीखने की नसीहत दी। किसानों के साथ हमदर्दी भी दिखाई और कहा कि वे अकारण खलनायक बनते हैं, उनकी भी सुनें। पूछा कि किसान किसे नोटिस दें? मानवीय संवेदनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी नौकरशाह और माननीयों के लिए बड़ा इशारा और चेतावनी है। न्यायालय की जबरदस्त पीड़ा भी कि मास्क लगा काम कर रहे अधिकारियों से कहा जाए कि वे उसे हटाएं और लोगों की तकलीफ महसूस करें।

दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में वक्त-बेवक्त दिल्ली-एनसीआर भी आ जाता है। पटाखों पर रोक के बावजूद बीती दिवाली पूरा क्षेत्र दोहरे प्रदूषण की गिरफ्त में धुआं-धुआं हुआ। नौबत कृत्रिम बारिश तक की आई थी और सलाह-मशविरा जारी था कि ऊपर वाले ने दया कर दी। बीती दिवाली जब सारा देश दीयों की रोशनी से नहाया था, तभी सर्वोच्च न्यायालय की आस का दीपक बुझ गया। लाख प्रतिबंधों के बावजूद देर रात और दो-तीन रात बाद तक समूचे एनसीआर में प्रतिबंधित पटाखों की आवाज और उनके धुएं ने सबको धता बता दिया। हर जगह बारूदी धुएं की गंध, आसमान में आतिशबाजी के रंग बिखेरते प्रतिबंधित रसायनों के पटाखे फूटते रहे। दिवाली के बाद की सुबह दिल्ली और एनसीआर की वायु गुणवत्ता दुनिया में सबसे बदतर रही। कई क्षेत्रों में सूचकांक यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 999 तक पहुंच गया। पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान पहुंचाने वाले कारणों और उसके आसान निदानों के बेअसर उपायों पर कब गंभीरता से सोचा जाएगा? आखिर कब समझेंगे कि दिवाली के पहले और बाद भी जहरीला धुआं हरेक सांस पर भारी है।

पराली-पटाखे जलाने पर पुलिस प्रकरण स्थायी हल नहीं है। धान काटते समय पराली भी काट लेना असंभव कैसे है? हर साल पराली पर दो महीने की और पटाखों पर हफ्ते भर की हाय-तौबा के बाद 10-11 महीनों की चुप्पी से समाधान कैसे होगा? समझना होगा कि कैसे जमीन के कार्बनिक तत्व, कीमती बैक्टीरिया, फफूंद वगैरह पराली जलाने से नष्ट होते हैं। इससे पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान, तो ग्लोबल वॉर्मिंग अलग बढ़ती है। अनजाने या मजबूरन उसी खेत का कम से कम 25 प्रतिशत खाद भी नष्ट होता है। प्रति एकड़ पराली के ठूठ जलाकर कई पोषक तत्वों सहित करीब 400 किलो ग्राम फायदेमंद कार्बन, एक ग्राम मिट्टी में मौजूद 10 से 40 करोड़ बैक्टीरिया और एक से दो लाख फफूंद भी जला बैठते हैं, जो फसल के हितैषी और जबरदस्त पोषक होते हैं। विडंबना देखिए कि फसल के पोषण के लिए वही तत्व, किसान दोबारा ऊंची-ऊंची कीमतों में अलग-अलग नाम से फिर खरीदते हैं, जिसे पहले बेकार समझ जला डालते हैं।

पराली की खूबियों को भी जनस्वास्थ्य, जल-जीवन, स्वच्छता मिशन जैसे सबको समझाया जाए, ताकि किसान भी इसके सदुपयोग को समझें, कमाई भी करें और खेतों को नई उर्वरा दें। इसके लिए स्थानीय निकाय, कृषि विभाग, औद्योगिक घराने, किसानों को उन्नत मशीनें मुहैया कराएं, जो दोनों के लिए लाभकारी होगा। अलख यह हो कि पराली जलाने के लिए नहीं, किस्मत बदलने के लिए है।        

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