फ्री सेक्स: भारतीय संस्कृति की यौन स्वतंत्रता पश्चिम से कितनी अलग है?
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इन दिनों सोशल मीडिया पर फ्री सेक्स पर जबरदस्त बहस चल रही है। वामपंथी और प्रगतिशील इस शब्द की तमाम दार्शनिक और समाजशास्त्रीय व्याख्याएं कर रहे हैं। आप समझ सकते हैं हिन्दुस्तान में अगर किसी चीज के आगे फ्री लग जाए तो उसका क्या हश्र होता है। वही इस शब्दावली के साथ हुआ। अपनी फेसबुक पोस्ट पर ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव एसोसिएशन की कविता कृष्णन ने कहा है कि फ्री सेक्स का मतलब सिर्फ सहमति से बनाया सेक्स है। चाहे वह किसी दूसरे के साथ किया जाए या फिर अपने पति के साथ। उन्होंने कहा कि जबरन किया गया सेक्स तो रेप है। कविता कृष्णन ने कहा कि मैं और मेरी मां ने भी फेसबुक पर यही कहा है।
ऐसी आजादी से डरने की जरुरत नहीं। यह बात मायने नहीं रखती कि सहमति से सेक्स शादी के बाद पति से हो रहा है या शादी से पहले या फिर बाद में किसी और से। इसमें किसी तरह की जोर-जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। अब इस विचार पर बेशक बहस हो सकती है किससे सेक्स करें किससे न करें। हमारे देश का कानून काफी हद तक व्यस्क स्त्री-पुरुष को स्वेच्छा और आपसी सहमित से सेक्स की इजाजत देता है। कोई भी सभ्य समाज इससे इंकार तो नहीं कर सकता सेक्स जबरदस्ती नहीं होना चाहिए चाहे वह स्त्री अपनी पत्नी हो या कोई वेश्या। लेकिन पहली नजर में लगता है कि अपना ये तर्क रखने के लिए कविता कृष्णन ने गलत शब्दावली का इस्तेमाल किया। इसलिए कहा जा रहा है कि फ्री सेक्स एक जाहिल मानसिकता से जुड़ी शब्दावली है।
दुनिया के इतिहास में 1917 की रूसी क्रान्ति 20वीं सदी की एक अहम घटना थी। अक्टूबर क्रान्ति के नतीजे में अस्थायी सरकार हटा कर बोल्सेविक सरकार बनी। फ्री सेक्स की परिकल्पना पहली बार तभी सामने आई हालांकि इसे फ्री सेक्स के बजाए फ्री लव का नाम दिया गया। रूस में कम्युनिस्ट सरकार से पहले जारशाही में औरतों पर जुल्मो सितम की इंतहा थी। जारशाही में वेश्या का पेशा करने वाली महिलाओं को पीला कार्ड जारी किया जाता था। यह येले कार्ड महिलाओं के शोषण का प्रतीक था। जारशाही अफसर किसी भी महिला से नागरिक कार्ड छीन कर उसे पीला कार्ड जारी कर देते और उसे जीवन भर के लिए वेश्यावृति में ढकेल देते।
क्रान्ति ने पहली बार पीले कार्ड की व्यवस्था खत्म की। लेकिन क्रान्ति ने जिस आजादी का जन्म दिया था उस अनेक युवा कम्युनिस्टों ने फ्री लव का नाम भी शामिल कर दिया। ध्यान रहे उन्होंने भी इसके लिए फ्री सेक्स जैसी घटिया और सस्ती शब्दावली नहीं चुनी। उनका सिर्फ यह तर्क था कि स्त्री को भी मर्द की तरह सेक्स का बराबर का अधिकार मिले। स्त्री को भी अपना सेक्स पार्टनर चुनने का हक हो। उसके पास सेक्स से इंकार करने का अधिकार हो। यह एक तरह का बंधन रहित प्रेम था। उनका तर्क था कि व्यभिचार को खत्म करने का यही एकमात्र उपाय है यौन-सम्बन्धी तमाम प्रतिबन्धों को ख़त्म कर देना। लेकिन आपको यह जान कर हैरत होगी कि लेनिन के नेतृत्व वाली क्रान्तिकारी सोवियत सत्ता ने ऐसे बन्धनरहित प्रेम के विचार का जबरदस्त विरोध किया। इसके बजाए इस सरकार ने युवाओं के स्वास्थ्य, उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर जोर दिया। उन्होंने युवाओं के बौद्धिक विकास और शोधपरक अध्ययन को प्राथमिकता दी। उन्होंने प्रेम क आजादी दी लेकिन बंधनहीन और उनमुक्त प्रेम की नहीं। लेकिन बाद में कम्युनिज्म की विरासत संभालने वाले फ्री सेक्स के कान्सेप्ट को ले उड़े। और आज नतीजा सामने है।
भारतीय परम्परा में सेक्स के लिए एक सम्यक शब्द दिया गया-सम्भोग। इसमें एक यौन स्वतंत्रता का बोध है। सम यानी समान भोग। जो स्त्री पुरुष को रति के अधिकारों की रक्षा करता है। और यह शब्द भी हवा में नहीं आया। प्राचीन भारतीय समाज सही अर्थो में दैहिक आजादी का पक्षधर था। इसका जिक्र महाभारत में साफ तौर पर मिलता है। पाण्डु संतान उत्पन्न करने में असमर्थ थे। उन्होंने अपनी पत्नी कुंती से कहा कि संतान प्राप्ति के लिए वह ऋषि के पास जाए। कुंती ने इसका विरोध किया। तब पाण्डू ने इस कर्म में सदाचारिता की व्याख्या की। उन्होंने कहा-प्राचीन काल में स्त्रियां पूर्ण रूप से स्वतंत्र थीं। लैंगिक स्वतंत्रता ही मान्य था। इसमें कोई बुराई नहीं थी कि स्त्रियां कौमार्य काल में अपने विवाह से पूर्व पति के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों से समागम करे। वे केवल ऋतु काल में ही अपने पतियों की होती थीं अन्य समय वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र होती थीं।
प्राचीन काल का ये नियम पहली बार श्वेतकेतु ने तोड़ा। उन्होंने देखा कि पिता की उपस्थित में ही माता अन्य पुरुषों के साथ जाती थीं। पिता विरोध नहीं कर सके। तब उन्होंने विवाह का नया नियम बनाया जिसमें पत्नी सदा पति की ही रहेगी। फिर भी वह प्राचीन नियम बड़े ऋषियों और उत्तर कुरू की नारियों द्वारा आदर से देखा गया।मुझे लगता है पाण्डु यहां उसी प्राचीन युग की बात कर रहे हैं जिसकी सामाजिक व्यवस्था सारी दुनिया में तकरीबन एक समान थी। वह यूरोपीयन समाज हों या अरब संस्कृति। तकरीबन सभी समाजशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि आदिम युग यानी मनुष्य की जीवन यात्रा का शुरूआती युग यौन स्वेच्छाचारिता का युग था। परिवार पर पहली जो किताब लिखी गई वह थी-मदर राइट। रहस्यवादी बाखोफेन की इस किताब को क्लासिक समाज विज्ञान की बाइबिल माना जाता है।
बाखोफेन की स्थापना थी कि आदिम युग यौन स्वेच्छाचारिता का युग था। इसे उन्होंने हैटेरज्म नाम दिया। उन्होंने कहा कि इस स्वच्छंदता के कारण यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है था कि अमुक इंसान का पिता कौन है। इसलिए वंश केवल मां के नाम से चलता था। इसीलिए उस युग में स्त्रियों का बहुत आदर और सम्मान था। इतना सम्मान जो फिर किसी युग में औरतों को नहीं मिला।लेकिन इस आदिम युग यौन स्वेच्छाचारिता के युग को भी आप फ्री सेक्स युग नहीं कह सकते। अगर आप समाज विज्ञान की किताबें गौर से पढ़े तो पाएंगे कि आदिम युग में भी ऐसा नहीं था कि स्त्री पुरूष उन्मुक्त ढंग से यौन संबंध बना सकें।
जैसा कि जर्मन समाजशास्त्री व मार्क्सवादी विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स कहते हैं कि स्त्री पुरुष संबंधों पर कबीले की नजर रहती थी। वे कहते हैं ऐसे लोग मूर्ख हैं जो इन आदिम समाज को एक विराट वेश्यालय की तरह देखते हैं। इस युग के अपने नियम कानून थे जो स्त्री पुरुष संबंधों को मर्यादित रखते थे। तो आप देखिए समाज सभ्य हो या आदिम। किसी दौर में मुक्त यौन संबंधों को मान्यता नहीं दी। खुद लेनिन भी इस विचार के विरोधी थे। जबरन यौन संबंध एक मनोविकृत है। जिसका समर्थन शायद ही कोई भलामानस करे। फिर ऐसी विवेकशून्य बहस से क्या फायदा जो आपको बेवजह इंडिया गेट पर नंगा कर दे। जरा सोचिएगा।
(लेखक अमर उजाला, शिमला के संपादक हैं।)