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Bharat Jodo Yatra: कितनी सफल होगी यह यात्रा

Mon, 19 Sep 2022 04:57 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Mon, 19 Sep 2022 04:57 AM IST
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सार
पिछले दो दशकों से कांग्रेस और माता-पुत्र की जोड़ी को अलग करके नहीं देखा गया है, और बीते कई दशकों से पार्टी अपनी मूल विचारधारा से अलग है।
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How successful will Bharat Jodo Yatra be
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा - फोटो : Twitter

विस्तार

विगत सात सितंबर से कांग्रेस की महत्वाकांक्षी 150 दिवसीय 'भारत जोड़ो यात्रा' जारी है। इस पदयात्रा का नाम भले ही 'भारत जोड़ो' है, किंतु यह संकटग्रस्त कांग्रेस में जान फूंकने और पार्टी में गांधी परिवार के नियंत्रण को फिर से मजबूत करने का प्रयास है। देश ने 'राजनीतिक यात्राओं' के लाभ देखे हैं। जहां 1990 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा निकाली गई 'राम रथयात्रा' से पार्टी कालांतर में दो से 182 लोकसभा सीटों तक पहुंच गई, वहीं 2018 में वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी ने 'प्रजा संकल्प यात्रा' निकालकर आंध्र प्रदेश में सरकार बना ली। ऐसे कई उदाहरण हैं। परंतु क्या कांग्रेस अपनी इस पदयात्रा में सफल होगी? ऐसा संभव नहीं दिखता, क्योंकि जहां अन्य राजननीतिक यात्राओं में नेताओं की विचारधारा और यात्रा के घोषित उद्देश्यों में स्पष्ट साम्य था, वहीं कांग्रेस की इस यात्रा में इसका नितांत अभाव है।



पिछले दो दशकों से कांग्रेस और माता-पुत्र की जोड़ी को अलग करके नहीं देखा गया है, और बीते कई दशकों से पार्टी अपनी मूल विचारधारा से अलग है। बौद्धिक कमी पूरी करने और स्वयं को भाजपा से अलग दिखाने के लिए वह बार-बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ उन बयानों का जिक्र करती है, जिस पर वामपंथियों का एकाधिकार रहा है। कम्युनिस्ट प्रारंभ से संघ और समानार्थी विचारसमूह के अन्य संगठनों-व्यक्तियों के राष्ट्रवादी चरित्र और सनातन संस्कृति के प्रति कटिबद्ध होने के कारण उनसे घृणा करते हैं। केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के वामपंथी शासन में विचारधारा के नाम पर दर्जनों भाजपा-संघ कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या—इसका प्रमाण है। लगभग एक ही कालखंड (1925) में संगठनात्मक जीवन शुरू करने के बाद जहां संघ समाज में विस्तार कर रहा है, वही वामपंथी केवल केरल तक सिमट गए है। 


यह विडंबना है कि जिस वामपंथ का वैचारिक अधिष्ठान विश्व में पहले ही दम तोड़ चुका है, उसकी घटिया कार्बन-कॉपी बनकर कांग्रेस देश में प्रासंगिक रहना चाहती है। कांग्रेस का घटता जनाधार उसकी इसी वैचारिक उलझन का प्रमाण है, जिसमें संघ के प्रति अपनी घृणा को मुखर रखने हेतु उसने 'जलती खाकी निक्कर' की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की, किंतु 'भारत जोड़ो यात्रा' की शुरुआत प्रख्यात आरएसएस विचारक एकनाथ रनाडे के मौलिक विचार 'विवेकानंद स्मारक शिला' (कन्याकुमारी) में श्रद्धांजलि देकर की। भारतीय सनातन परंपरा के अनुरूप इसमें कोई बुराई नहीं, किंतु जिस वामपंथी केंचुली से कांग्रेस दशकों से जकड़ी हुई है, उसमें संघ-भाजपा और अन्य वैचारिक विरोधियों के प्रति केवल 'राजनीतिक अस्पृश्यता' का दर्शन है।

वास्तव में, संघ के प्रति वामपंथी दुराग्रह का अग्रिम चरण कांग्रेस नीत संप्रग काल (2004-14) में प्रारंभ हुआ। तब गोधरा कांड को 'हादसा' और श्रीराम को 'काल्पनिक' बताकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे ने केंद्रीय गृहमंत्री रहते हुए झूठा 'हिंदू/भगवा आतंकवाद' का सिद्धांत गढ़ा, तो राहुल गांधी ने इसके माध्यम से तत्कालीन अमेरिकी राजदूत के समक्ष देश में जिहादी खतरे को गौण कर दिया। इन सबमें दिग्विजय सिंह ने, जो वर्तमान कांग्रेसी पदयात्रा के प्रबंधकों में से एक हैं—वर्ष 2008 के 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले का आरोप संघ पर लगा दिया था। यदि तब आतंकी कसाब और डेविड हेडली पकड़े नहीं जाते, तो कांग्रेस पाकिस्तान को क्लीन-चिट देकर, लश्कर-ए-ताइबा जैसे आतंकी संगठनों को देश में और भयावह हमले करने की परोक्ष स्वीकृति दे चुकी होती। 

इसी शृंखला में कांग्रेस ने 'सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011' संसद में प्रस्तुत किया, जो भाजपा के कड़े विरोध के बाद वापस लिया गया। इसका उद्देश्य हिंदुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनाना था। इस विधेयक का प्रारूप सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली असांविधानिक 'राष्ट्रीय सलाहकार परिषद' ने तैयार किया था। इसके आलेखन-समिति में तब कई चर्च-इस्लाम प्रेरित संगठनों (विदेशी वित्तपोषित एनजीओ सहित) के प्रतिनिधियों के साथ तीस्ता सीतलवाड़—जिसने झूठे-मनगढ़ंत साक्ष्यों के आधार पर 2002 के गुजरात दंगा मामले में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया था—शामिल थी। इसी समिति का हिस्सा हर्ष मंदर भी थे, जो 'नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019' के विरोध में मजहबी प्रदर्शनकारियों को हिंसा हेतु उकसा रहे थे।

कांग्रेस की मौजूदा पदयात्रा के दौरान जब राहुल केरल के एक चर्च में विवादित ईसाई पादरी पोन्नैया से मिले, तो वह राहुल के सामने हिंदू देवी-देवताओं की मर्यादा को कलंकित करते नजर आए। यह कोई पहली घटना नहीं है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के लिए ए. के. एंटनी समिति ने पार्टी की हिंदू-विरोधी छवि को मुख्य कारण माना था। इसके परिमार्जन हेतु गांधी परिवार ने चुनाव के समय हिंदू मंदिरों-मठों का दौरा करना प्रारंभ किया। कितना विचित्र है कि अपनी 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान जिस केरल स्थित हिंदू शिवगिरी मठ में राहुल गए थे, उसी केरल में उनके युवा कार्यकर्ता पांच वर्ष पहले 'सेक्यूलरवाद' को सत्यापित करने के लिए हिंदुत्व का मजाक उड़ा रहे थे।

विरोधाभास देखिए कि जो राहुल गांधी वामपंथी मानसिकता के अनुरूप भारत को 'राष्ट्र’ नहीं, बल्कि ‘राज्यों का संघ' कहते हैं और वर्ष 2016 के जेएनयू प्रकरण में नारा लगाने वाले गिरोह का हिस्सा रहे विशुद्ध कम्युनिस्ट कन्हैया कुमार को अपनी पार्टी कांग्रेस का हिस्सा बना चुके हैं, वही राहुल गांधी आज 'भारत जोड़ो' नाम से यात्रा निकाल रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में क्या कांग्रेस का पुनर्जीवन संभव है? वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जिस वामपंथी चिंतन ने कांग्रेस को इस हाल में पहुंचाया है, उससे मुक्त होने की इच्छाशक्ति पार्टी नेतृत्व में नहीं है। 

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